मऊ: उत्तर प्रदेश की सियासी तपिश यूं तो कभी कम नहीं होती, लेकिन इस बार मामला कुछ ऐसा है कि हर किसी के कान खड़े हो गए हैं। कैबिनेट मंत्री ए.के. शर्मा ने एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसने न सिर्फ मऊ की धरती पर हलचल मचा दी है, बल्कि पूरे प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। बात 2027 के विधानसभा चुनावों की है, जिनके बारे में मंत्री जी का कहना है कि वे अपने तय वक्त से 5-6 महीने पहले ही हो सकते हैं। यानी, अगर आप सोच रहे थे कि अभी तो काफी वक्त है, तो जनाब, ये ख़बर सुनकर आपकी सोच बदल सकती है!
मंगलवार देर शाम मऊ में एक स्वागत समारोह का आयोजन किया गया था। यह समारोह पूर्व विधायक विजय राजभर को प्रदेश मंत्री बनाए जाने की खुशी में रखा गया था।
माहौल गरमा-गरम था, लोग तालियां बजा रहे थे, और तभी मंच पर आए योगी सरकार के कद्दावर मंत्री ए.के.
शर्मा। अपने संबोधन में उन्होंने कार्यकर्ताओं को जोश भरते हुए कहा कि संगठन को अभी से कमर कस लेनी चाहिए।
उनका इशारा साफ था – चुनाव की तैयारी में जरा भी ढिलाई नहीं चलेगी, क्योंकि "चुनाव निर्धारित समय से पहले घोषित होने की संभावना है।" ये बात सुनकर वहां मौजूद हर किसी के चेहरे पर सवाल और हैरत के भाव थे।
अब एक कैबिनेट मंत्री इतनी बड़ी बात कह रहा है, तो जाहिर है, इसके मायने भी बड़े होंगे।
अचानक क्यों आई जल्दी चुनाव की बात?
सवाल उठना लाजमी है कि आखिर मंत्री ए.के.
शर्मा को अचानक ऐसी बात कहने की क्या जरूरत पड़ी? क्या भाजपा को अंदरूनी तौर पर कुछ ऐसे संकेत मिल रहे हैं, जिनकी भनक अभी तक आम जनता और विपक्षी दलों को नहीं लगी है? मंत्री जी ने अपने भाषण में कार्यकर्ताओं को खूब समझाया। उन्होंने कहा कि अक्सर कार्यकर्ता और पदाधिकारी लखनऊ या मंडल मुख्यालयों के चक्कर लगाते रहते हैं।
इन यात्राओं में उनका काफी समय बर्बाद हो जाता है। मंत्री का सीधा संदेश था कि "फोटो खिंचवाने से ज्यादा महत्वपूर्ण संगठन को बूथ स्तर पर मजबूत करना है।
" यह बात भाजपा के उस पुराने और आजमाए हुए नुस्खे की याद दिलाती है, जिसके दम पर पार्टी ने देश और प्रदेश में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है – 'बूथ जीता तो चुनाव जीता' वाला सिद्धांत।
ए.के.
शर्मा ने साफ-साफ चेताया कि "कार्यकर्ताओं को केवल पांच से छह महीने की तैयारी का ही अवसर मिल सकता है।" इसका मतलब है कि अगर चुनाव तय समय से पहले होते हैं, तो तैयारी के लिए लगभग आधा साल ही बचेगा।
ऐसे में, कार्यकर्ताओं को अभी से अपने-अपने इलाकों में पसीना बहाना होगा। उन्हें पन्ना प्रमुखों, बूथ अध्यक्षों और शक्ति केंद्र संयोजकों के साथ मिलकर काम करने और संगठन की गतिविधियों को गति देने का निर्देश दिया गया।
भाजपा का पन्ना प्रमुख वो होता है, जिसके पास एक 'पन्ने' में दर्ज मतदाताओं की जिम्मेदारी होती है। बूथ अध्यक्ष उस बूथ पर पार्टी का चेहरा होता है, और शक्ति केंद्र संयोजक कई बूथों को मिलाकर बने शक्ति केंद्र का मुखिया।
ये जमीनी स्तर पर काम करने वाले वो लोग हैं, जो सीधे मतदाताओं से जुड़कर पार्टी के लिए माहौल बनाते हैं। मंत्री का जोर इन्हीं लोगों को सक्रिय करने पर था।
सियासी गलियारों में हड़कंप और विपक्ष के सवाल
ए.के.
शर्मा के इस बयान के बाद मऊ जिले के राजनीतिक माहौल में गहमागहमी बढ़ गई है। केवल मऊ ही क्यों, प्रदेश के बाकी हिस्सों में भी यह बात जंगल की आग की तरह फैल चुकी है।
विपक्षी दलों के नेता अब इस पर सवाल उठाने लगे हैं। उनका कहना है कि भाजपा पहले से ही चुनावी मोड में दिख रही है।
ये बयान एक तरह से विपक्ष को भी सचेत कर रहा है कि उन्हें अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने की जरूरत है। अगर भाजपा वाकई पहले चुनाव कराने की सोच रही है, तो इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? क्या सरकार किसी बड़े फैसले की तैयारी में है, जिसका फायदा वह चुनाव में भुनाना चाहती है? या फिर कुछ और ही सियासी दांवपेंच चल रहे हैं, जिनकी भनक अभी तक लग नहीं पाई है?
हालांकि, चुनाव की तारीखें तय करना किसी सरकार या मंत्री के हाथ में नहीं होता। यह अधिकार केवल भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के पास है।
आयोग एक स्वायत्त संस्था है, जो निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार है। फिलहाल, निर्वाचन आयोग की ओर से 2027 के विधानसभा चुनाव कार्यक्रम को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
मंत्री का बयान एक संभावना जता रहा है, और राजनीतिक हलकों में ऐसी संभावनाएं और अटकलें चलती रहती हैं। लेकिन जब यह बात एक कैबिनेट मंत्री के मुंह से निकलती है, तो इसका वजन कुछ ज्यादा ही हो जाता है।
यह कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का एक तरीका भी हो सकता है, ताकि वे अभी से ढीले न पड़ें।
फिलहाल, यूपी की सियासत में हलचल तेज है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मंत्री ए.
के. शर्मा के इस बयान को लेकर और क्या-क्या प्रतिक्रियाएं आती हैं और क्या सच में उत्तर प्रदेश अगले पांच-छह महीनों में चुनावी रंग में रंगने वाला है, या यह सिर्फ कार्यकर्ताओं को बूस्ट करने की एक रणनीति है।
लेकिन एक बात तो तय है, मऊ से निकला यह बयान फिलहाल तो लखनऊ तक सभी की नींद उड़ाए हुए है।