मैनपुरी: उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है, जहां एक सरकारी हैंडपंप ही रातों-रात गायब हो गया और उसकी जगह पर एक साहब ने अपने मकान का हिस्सा खड़ा कर दिया। जी हां, सरकारी जमीन और पानी की सप्लाई पर एक व्यक्ति ने ऐसा कब्जा जमाया है कि अब मोहल्ले वाले पानी को तरस रहे हैं। ये पूरा खेल मैनपुरी शहर के महमूद नगर मोहल्ले में हुआ है, जहां इंडिया मार्का हैंडपंप को जड़ से उखाड़कर कथित तौर पर एक निजी निर्माण कर लिया गया।
मामला अब सीधे जिलाधिकारी महोदय की चौखट पर पहुंच गया है। मोहल्ले के एक शख्स मोमिन पुत्र निसार ने जिलाधिकारी को बाकायदा एक शिकायती पत्र सौंपा है।
इसमें साफ-साफ आरोप लगाया गया है कि एक सार्वजनिक इंडिया मार्का हैंडपंप को हटाकर न सिर्फ सार्वजनिक भूमि, बल्कि एक नाली पर भी अवैध कब्जा कर लिया गया है और उस पर निर्माण कार्य कर लिया गया है। सोचिए, जिस हैंडपंप से सैकड़ों लोग प्यास बुझाते थे, वो अचानक कैसे गायब हो सकता है और उसकी जगह कोई अपना घर बना ले?
मोमिन ने अपनी शिकायत में जो बताया है, वो और भी चौंकाने वाला है। उनके मुताबिक, धारऊ रोड पर पानी की टंकी के पास, उनके अपने मकान के पड़ोस में, एक सरकारी जमीन पर सालों से एक इंडिया मार्का हैंडपंप लगा था।
ये हैंडपंप सिर्फ मोहल्ले वालों के लिए नहीं, बल्कि राहगीरों के लिए भी पानी का सहारा था। लोग आते-जाते अपनी प्यास बुझाते थे, खासकर गर्मियों में तो इसकी अहमियत और बढ़ जाती थी।
क्या है पूरा मामला और किसने उठाया हैंडपंप का जिम्मा?
मोमिन का सीधा-सीधा आरोप है कि उनके पड़ोसी शरीफ पुत्र नसीर ने इस हैंडपंप को उखाड़कर न जाने कहां गायब कर दिया। गायब करने के बाद साहब यहीं नहीं रुके, उन्होंने तो कमाल कर दिया।
उसी जगह पर अपने मकान का आगे का हिस्सा बनाकर सरकारी जमीन पर पूरी तरह से कब्जा जमा लिया। इतना ही नहीं, जो मोहल्ले की सार्वजनिक नाली थी, उसकी जमीन पर भी कथित तौर पर निर्माण कर लिया गया।
अब आप खुद सोचिए, एक सरकारी संपत्ति, जो आम जनता के काम आती है, उसे कोई अपनी निजी संपत्ति कैसे बना सकता है? ये तो सरासर सरकारी जमीन और संसाधनों पर डाका डालने जैसा हुआ।
इस पूरे मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि ये सिर्फ हैंडपंप उखाड़ने का मामला नहीं है, बल्कि सार्वजनिक सुविधा को छीनने का और सरकारी संपत्ति पर अवैध कब्जा करने का मामला है। मोहल्ले के लोगों का कहना है कि हैंडपंप के चले जाने से उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर पड़ा है।
अब उन्हें पीने के पानी के लिए दूर जाना पड़ता है या फिर किसी और का सहारा लेना पड़ता है, जो कि पहले आसानी से उपलब्ध था। खासकर गर्मी के दिनों में जब पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब इसकी कमी बहुत ज्यादा खलती है।
नगर पालिका ने भी मानी थी बात, नोटिस भी भेजा, फिर क्या हुआ?
ये पहली बार नहीं है जब इस मामले ने तूल पकड़ा हो। शिकायतकर्ता मोमिन ने बताया है कि इस अतिक्रमण को लेकर पहले भी कई बार शिकायतें की जा चुकी हैं।
दिलचस्प बात ये है कि नगर पालिका परिषद मैनपुरी ने इन शिकायतों पर जांच भी की थी। और जांच में क्या निकला? बिल्कुल वही जो मोमिन कह रहे थे – सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की पुष्टि हुई।
यानी नगर पालिका ने खुद माना कि हां, सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा हुआ है।
अतिक्रमण की पुष्टि होने के बाद, नगर पालिका परिषद मैनपुरी ने 20 जनवरी 2023 को अतिक्रमण हटाने के लिए एक नोटिस भी जारी किया था। ये एक सरकारी प्रक्रिया है, जिसके तहत दोषी व्यक्ति को अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया जाता है।
लेकिन, यहां पर ट्विस्ट है। नगर पालिका का नोटिस जारी होने के बावजूद, कथित अतिक्रमण आज तक हटाया नहीं गया।
सरकारी जमीन को आज भी कब्जा मुक्त नहीं कराया जा सका है। सवाल उठता है कि जब सरकारी विभाग ने खुद अतिक्रमण को स्वीकार किया और हटाने का नोटिस भी दिया, तो फिर ये अतिक्रमण अभी तक क्यों नहीं हटाया गया?
शिकायतकर्ता की जिलाधिकारी से क्या है गुहार और आगे क्या होगा?
मोमिन का आरोप है कि इस पूरे प्रकरण में संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, जिसकी वजह से सरकारी संपत्ति पर कब्जा जस का तस बना हुआ है। हैंडपंप हटने से स्थानीय लोगों और राहगीरों को पीने के पानी की सुविधा का जो नुकसान हो रहा है, वो एक अलग समस्या है।
उन्होंने अब जिलाधिकारी से गुहार लगाई है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
मोमिन की मांग साफ है: अगर उनके आरोप सही पाए जाते हैं, तो सरकारी हैंडपंप उखाड़ने वाले और सार्वजनिक भूमि व नाली पर अवैध कब्जा करने वाले शख्स के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही, सरकारी जमीन को तत्काल कब्जामुक्त कराकर उसे दोबारा सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित किया जाए।
अब देखना ये है कि जिलाधिकारी इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और क्या महमूद नगर के लोगों को उनका सरकारी हैंडपंप वापस मिल पाता है या कम से कम पानी की सुविधा दोबारा बहाल हो पाती है। ये सिर्फ एक हैंडपंप का मामला नहीं, बल्कि सरकारी जमीन और आम जनता के अधिकारों का भी मामला है।