औरैया: साहब, फौजी की ज़िंदगी का भी अपना अलग ही रौब होता है और अपना ही अलग दर्द। सरहद पर देश की रखवाली करते हुए कब क्या हो जाए, कोई नहीं जानता। लेकिन जब कोई जवान छुट्टी पर अपने घर लौटता है, तो परिवार में जो खुशी की लहर दौड़ती है, वो शायद दुनिया की किसी और खुशी से बढ़कर होती है। उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के बेला कस्बे में भी ऐसा ही माहौल था, जब बीएसएफ के जवान सुभाष चंद्र पाण्डेय नौ जून को अपनी बटालियन से छुट्टियां लेकर घर लौटे थे। परिवार खुश था, बच्चे खुश थे, पत्नी के चेहरे पर सुकून था। कौन जानता था कि ये छुट्टियां उनके जीवन की आखिरी छुट्टियां साबित होंगी और घर का ये लाडला फिर कभी ड्यूटी पर वापस नहीं जा पाएगा?
बीएसएफ की डेल्टा बटालियन 101, जो बेंगलुरु में तैनात है, के जांबाज सिपाही सुभाष चंद्र पाण्डेय (56 वर्ष) अपने घर बेला आए थे। पूरा जून महीना परिवार के साथ बीता।
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. एक फौजी के लिए ये पल किसी जन्नत से कम नहीं होते।
उन्हें छह जुलाई को वापस ड्यूटी पर लौटना था। यानी, कुछ ही दिन बाकी थे, जब उन्हें फिर से अपने साथियों के साथ सरहद की तरफ कूच करना था।
सब कुछ सामान्य चल रहा था, शायद घर में आखिरी दिनों की कुछ और योजनाएं बन रही होंगी। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था, जिसका किसी को जरा भी इल्म नहीं था।
खुशी के माहौल में छा गया मातम
26 जून की रात का वक्त था, करीब 9 बजे के आसपास। घर में सब ठीक-ठाक था।
अचानक सुभाष चंद्र पाण्डेय के सिर में तेज दर्द उठा। पहले शायद लगा होगा कि मामूली बात है, थकान होगी या मौसम का असर।
लेकिन दर्द इतना तेज था कि कुछ ही पलों में वो अपनी सुध-बुध खो बैठे और बेहोश हो गए। सोचिए उस वक्त परिवार पर क्या बीती होगी! जिस शख्स को कुछ देर पहले तक वो हंसते-बोलते देख रहे थे, वो अचानक उनकी आंखों के सामने बेसुध पड़ा था।
एक पल में खुशियों का माहौल गम में बदल गया, घर में चीख-पुकार मच गई।
परिवार के सदस्यों ने देर न करते हुए तुरंत उन्हें पास के अस्पताल ले जाने की सोची, लेकिन गंभीर हालत देखते हुए यह साफ था कि उन्हें बेहतर इलाज की जरूरत है। बिना वक्त गंवाए, आनन-फानन में उन्हें कानपुर के रिजेंसी अस्पताल ले जाया गया।
ये रात कितनी मुश्किल रही होगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। रास्ते भर परिवार के लोग बस यही दुआ कर रहे होंगे कि उनका लाल, उनका सहारा, जल्दी से ठीक हो जाए।
कानपुर तक का सफर, एम्बुलेंस की सायरन की आवाज़, और अनहोनी का डर, हर एक पल पहाड़ जैसा भारी रहा होगा।
कानपुर के अस्पताल में ज़िंदगी और मौत की जंग
कानपुर के रिजेंसी अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने तुरंत सुभाष चंद्र पाण्डेय का इलाज शुरू किया। अगले चार दिन, यानी 26 जून की रात से लेकर 30 जून की रात तक, अस्पताल में ज़िंदगी और मौत के बीच एक भयानक जंग चलती रही।
परिवार के लोग अस्पताल के बाहर, कभी अंदर, बस यही उम्मीद लगाए बैठे रहे कि डॉक्टर साहब कोई अच्छी खबर सुनाएं। हर गुज़रता घंटा एक सदी जैसा लग रहा होगा।
हर फोन की घंटी उन्हें डरा रही होगी और हर डॉक्टर का चेहरा कुछ कहने से पहले ही दिल की धड़कनें बढ़ा रहा होगा।
लेकिन कभी-कभी सारी दुआएं, सारी कोशिशें भी अधूरी रह जाती हैं। 30 जून की रात, ठीक 12 बजे के बाद, डॉक्टरों ने परिवार को वो खबर सुनाई, जिसे कोई भी सुनना नहीं चाहता।
सुभाष चंद्र पाण्डेय ने ज़िंदगी की जंग हार दी थी। खबर सुनते ही परिवार पर मानों पहाड़ टूट पड़ा।
उनकी पत्नी ऊषा पाण्डेय, दो बेटों विकल (35 वर्ष) और छोटू (31 वर्ष) और अविवाहित बेटी अंशु (25 वर्ष) का रो-रोकर बुरा हाल था। सोचिए, एक परिवार जो कुछ दिनों पहले अपने मुखिया के घर लौटने की खुशी मना रहा था, अब उसकी अंतिम विदाई की तैयारी कर रहा था।
ये नियति का ऐसा क्रूर मज़ाक था, जिसे कोई भी समझ नहीं पा रहा था।
अधूरे सपने और पीछे छूट गया परिवार
सुभाष चंद्र पाण्डेय ने अपने पीछे एक भरा-पूरा परिवार छोड़ा है। उनकी पत्नी ऊषा पाण्डेय, जो अब इस दुख की घड़ी में अकेली पड़ गई हैं।
दो बेटे, विकल और छोटू, जिनके कंधों पर अब पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई है। और एक बेटी अंशु, जिसकी अभी शादी नहीं हुई है।
25 साल की अंशु के लिए अपने पिता को इस तरह खो देना, एक बहुत बड़ा सदमा है। पिता का साया उठना किसी भी बच्चे के लिए सबसे बड़ा दुख होता है, खासकर जब जिंदगी में अभी बहुत कुछ करना बाकी हो।
बीएसएफ जवान सुभाष चंद्र पाण्डेय का असमय निधन सिर्फ उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि बेला कस्बे और पूरे औरैया जिले के लिए एक बड़ी क्षति है। जिस शख्स ने अपनी ज़िंदगी देश की सेवा में लगा दी, वो अपने ही घर में, छुट्टी पर रहते हुए, अचानक इस दुनिया को अलविदा कह गया।
क्षेत्र में उनके निधन की खबर से गहरा दुख और शोक का माहौल है। लोग उनके साहस और देश सेवा को याद कर रहे हैं, और साथ ही परिवार के प्रति संवेदनाएं व्यक्त कर रहे हैं।
शायद नियति का यही खेल है, जिसे कोई समझ नहीं सकता।