पटना: अरे भाई साहब! बिहार के सियासी गलियारों में आजकल एक नाम बड़ी तेजी से कौंध रहा है और सबकी जुबान पर चढ़ा हुआ है – अपने चौबे जी का. वही चौबे जी, जो भारतीय जनता पार्टी के एक कद्दावर विधायक हैं और जिनकी लच्छेदार भाषणों से लेकर तीखी टिप्पणियों तक, सब कुछ सियासी महफिल में खूब सुर्खियां बटोरता था. लेकिन अब खबर ये नहीं कि उन्होंने किसी विरोधी नेता पर निशाना साधा है, बल्कि खबर ये है कि चौबे जी ने अचानक ही राजनीति की आपाधापी, जोड़-तोड़ और उठापटक छोड़कर अध्यात्म की गंगा में ऐसी डुबकी लगाई है कि देखने वाले हक्के-बक्के रह गए हैं. हर कोई बस एक ही सवाल पूछ रहा है – आखिर ये अचानक हुआ क्या? क्या राजनीति में कोई बड़ा दांव उल्टा पड़ गया, या फिर ये कोई नई चाल है जो सियासी बिसात पर बिछाई जा रही है? खासकर तब, जब उत्तर प्रदेश में उनकी राजनीतिक 'नाव' अटकी हुई बताई जा रही थी और मीडिया की टीआरपी का खेल उन्हें लगातार घेरे हुए था. इस पूरे 'आध्यात्मिक ड्रामे' के पीछे की कहानी बड़ी दिलचस्प है, जिसे सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे और आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि भैया, ये नेता लोग भी क्या-क्या गुल खिलाते हैं!
चौबे जी का अचानक 'आध्यात्मिक अवतरण': सियासत से वैराग्य तक का सफर
चौबे जी, जिन्हें बिहार की राजनीति में एक दबंग और बेबाक नेता के तौर पर जाना जाता था, अक्सर विधानसभा में अपनी बुलंद आवाज और विरोधी दलों पर सीधे हमलों के लिए मशहूर थे. उनकी एक छवि थी, एक स्टाइल था – कुर्ता-पायजामा, माथे पर तिलक और जुबान पर हमेशा सियासी तेवर.
ऐसे नेता का अचानक शांति और वैराग्य का दामन थाम लेना किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लग रहा है. सूत्रों की मानें तो पिछले कुछ दिनों से वे सार्वजनिक कार्यक्रमों से पूरी तरह गायब हैं.
उनके फोन बंद हैं और उनके करीबी सहयोगी भी उनसे संपर्क साधने में नाकाम रहे हैं. बताया जा रहा है कि चौबे जी इन दिनों किसी अज्ञात पवित्र धाम में, शायद गंगा किनारे किसी आश्रम में, गहन आध्यात्मिक साधना में लीन हैं.
उनके इस अचानक बदले हुए रूप को देखकर राजनीतिक पंडित भी हैरान हैं. कुछ वरिष्ठ नेताओं का तो ये भी कहना है कि 'राजनीति में अक्सर ऐसा होता है जब नेता को लगता है कि उसकी पकड़ ढीली पड़ रही है, तो वह ऐसे ही नए रास्ते तलाशता है.
' वहीं, उनके कुछ समर्थक इसे उनकी 'इनर जर्नी' और आत्म-मंथन का दौर बता रहे हैं. उनका कहना है कि चौबे जी हमेशा से धर्म-कर्म में विश्वास रखते थे, बस अब उन्हें थोड़ा ज्यादा समय मिल गया है खुद को जानने का.
लेकिन सवाल तो वहीं का वहीं है कि ये बदलाव आया क्यों और अब इसकी टाइमिंग को लेकर इतनी बातें क्यों हो रही हैं?
उत्तर प्रदेश में अटकी सियासी नाव का किस्सा: क्या रही वजह?
चौबे जी के इस 'आध्यात्मिक अवतरण' को अगर समझना है, तो हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. दरअसल, उनके इस बदलाव के पीछे उत्तर प्रदेश से जुड़ी एक बड़ी 'अटकन' बताई जा रही है.
पिछले दिनों चौबे जी को पार्टी हाईकमान ने उत्तर प्रदेश में एक बड़ी और अहम जिम्मेदारी सौंपी थी. कुछ लोगों का कहना था कि यह जिम्मेदारी पश्चिमी यूपी के किसी महत्वपूर्ण चुनाव अभियान से जुड़ी थी, जहां पार्टी को एक मजबूत चेहरे की तलाश थी.
वहीं, कुछ अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, यह पार्टी के भीतर चल रही किसी विशेष संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा था, जिसमें चौबे जी को बड़ी भूमिका निभानी थी. लेकिन अफसोस! जो भी हुआ, वह चौबे जी के राजनीतिक करियर के लिए अच्छा साबित नहीं हुआ.
उनकी 'सियासी नाव' उत्तर प्रदेश के सियासी जल में ऐसी फंसी कि उससे निकलना मुश्किल हो गया. यह सिर्फ अटकलें नहीं हैं, बल्कि पार्टी के अंदर भी उनकी भूमिका और प्रदर्शन को लेकर खुसर-पुसर शुरू हो गई थी.
खबरें तो यहां तक थीं कि शीर्ष नेतृत्व भी उनके यूपी मिशन से कुछ खास खुश नहीं था और उनकी रिपोर्ट कार्ड पर लाल स्याही चल चुकी थी. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यूपी में मिली इस 'नाकामी' या 'अटकन' ने ही चौबे जी को राजनीति से मोहभंग कर अध्यात्म की ओर धकेल दिया? क्या यह सिर्फ एक संयोग है, या फिर राजनीति के कुरुक्षेत्र से यह एक अस्थायी पलायन है, ताकि वापसी और मजबूत होकर की जा सके?
TRP के खेल में घिरे विधायक जी: मीडिया और सोशल मीडिया की नजर
और भैया, जब बात नेताओं की हो और उसमें थोड़ा आध्यात्म का तड़का लग जाए, तो मीडिया और सोशल मीडिया भला पीछे कैसे रह सकते हैं! चौबे जी का यह 'आध्यात्मिक अवतार' इन दिनों मीडिया की सुर्खियों में खूब छाया हुआ है. खासकर, जो न्यूज चैनल राजनीतिक मसाला और चटपटी खबरें परोसने में माहिर हैं, वे इस खबर को मिर्च-मसाला लगाकर धड़ल्ले से परोस रहे हैं.
हर तरफ चर्चा है कि क्या चौबे जी सचमुच वैरागी हो गए हैं, या यह सिर्फ अपनी छवि चमकाने और यूपी में मिली असफलता से ध्यान भटकाने का एक नया तरीका है? टीवी चैनलों पर गर्मागर्म बहसें छिड़ गई हैं, जहां कुछ विशेषज्ञ इसे राजनीतिक 'रिट्रीट' बता रहे हैं, तो कुछ इसे एक नेता का स्वाभाविक 'जीवन दर्शन' मान रहे हैं. एक जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'राजनीति में जब कोई नेता किसी बड़ी मुश्किल या विवाद में फंसता है, तो उसके पास दो रास्ते होते हैं – या तो वह चुप्पी साध लेता है या फिर कुछ ऐसा करता है जिससे लोगों का ध्यान बंट जाए.
चौबे जी का यह आध्यात्मिक रुख भी उसी रणनीति का हिस्सा लगता है. उन्हें पता है कि आध्यात्म की बात लोगों को आकर्षित करती है और सहानुभूति भी दिला सकती है.
' वहीं, सोशल मीडिया पर तो मीम्स और टिप्पणियों की बाढ़ आई हुई है. ट्विटर से लेकर फेसबुक तक, लोग चौबे जी के इस 'नये अवतार' पर तरह-तरह की बातें लिख रहे हैं.
कुछ लोग उनके इस कदम को आध्यात्मिक शांति की तलाश बताकर सराह रहे हैं, तो कुछ इसे महज राजनीतिक 'शो ऑफ' करार दे रहे हैं. 'अध्यात्म बनाम राजनीति' की यह जंग फिलहाल मीडिया की टीआरपी को खूब बढ़ा रही है और हर कोई इस ड्रामा का अगला एपिसोड देखने को बेताब है.
फिलहाल, चौबे जी अपने आध्यात्मिक पथ पर कितनी दूर तक जाएंगे और इसका उनकी राजनीतिक भविष्य पर क्या असर होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. क्या वे इस 'गंगा' में डुबकी लगाकर अपने राजनीतिक करियर की नैया पार लगा पाएंगे, या फिर यह 'डुबकी' उनके लिए और नई सियासी मुश्किलें खड़ी करेगी? लेकिन एक बात तो तय है, बिहार की राजनीति में इस वक्त चौबे जी से जुड़ा यह 'अध्यात्मिक मिस्टीरियस केस' सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है.
सबको इंतजार है कि कब चौबे जी 'ध्यान' से बाहर आएंगे और बताएंगे कि आखिर उनके मन में चल क्या रहा है. तब तक के लिए, अटकलें जारी हैं और 'बात खरी है' के अगले एपिसोड में इस पर और भी गहरी पड़ताल जारी रहेगी.

