लखनऊ: अब तक आपने ट्रेन को पटरियों पर दौड़ते देखा होगा, बसों को सड़कों पर सरपट भागते देखा होगा और हवाई जहाज को आसमान में उड़ते हुए देखा होगा. लेकिन अगर हम आपसे कहें कि भविष्य में ऐसी बसें आएंगी, जो हवा में उड़ती हुई चलेंगी, तो क्या आप यकीन करेंगे? केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कुछ ऐसा ही बड़ा ऐलान किया है. उन्होंने कहा है कि वो भारत में जल्द ही 'हवा में उड़ने वाली बसें' लाने वाले हैं.
आप सोच रहे होंगे, आखिर ये कैसे होगा? क्या ये कोई साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी है? बिल्कुल नहीं! गडकरी जी ने यह बात लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के लोकार्पण कार्यक्रम में कही, जब वो देश में परिवहन क्षेत्र में नई तकनीकों और वैकल्पिक परिवहन सिस्टम पर चर्चा कर रहे थे. उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “अब मैं ऐसी बस लाने जा रहा हूं जो हवा में उड़ती हुई चलेगी.
” उनका यह बयान किसी फिल्मी डायलॉग से कम नहीं लग रहा, लेकिन उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, इसे सिर्फ हवाई बातें मानना बेवकूफी होगी.
आखिर क्यों पड़ी इस 'उड़ने वाली बस' की जरूरत?
नितिन गडकरी लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि देश में लगातार बढ़ते ट्रैफिक और प्रदूषण की समस्या से निपटना बहुत जरूरी है. हमारे बड़े शहरों में रोज सुबह-शाम जाम लगना आम बात हो गई है, जिससे लोगों का समय बर्बाद होता है, फ्यूल ज्यादा खर्च होता है और प्रदूषण भी बढ़ता है.
इसी समस्या का हल निकालने के लिए आधुनिक परिवहन तकनीकों को अपनाना जरूरी है. गडकरी का मानना है कि जमीन के ऊपर चलने वाली सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था ही इन समस्याओं का एक टिकाऊ और प्रभावी समाधान हो सकती है.
उनका कहना है कि सरकार का मुख्य लक्ष्य लोगों को सस्ता, सुरक्षित, तेज और पर्यावरण के अनुकूल सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराना है. इसी विजन को पूरा करने के लिए नई तकनीकों पर लगातार काम किया जा रहा है.
अगर ऐसे सिस्टम आते हैं तो ट्रैफिक जाम कम होगा, यात्रा का समय घटेगा और प्रदूषण पर भी काफी हद तक कंट्रोल पाया जा सकेगा.
तो क्या सच में उड़ेंगी बसें? क्या है 'उड़ने वाली बस' का मतलब?
यहां 'उड़ने वाली बस' का मतलब ऐसा नहीं है कि बस के पंख निकल आएंगे और वो सीधे आसमान में उड़ने लगेगी, जैसे कोई हवाई जहाज उड़ता है. गडकरी जी का इशारा दरअसल उन एडवांस्ड एरियल पब्लिक ट्रांसपोर्ट टेक्नोलॉजी (Advanced Aerial Public Transport Technology) की तरफ है, जिन पर केंद्र सरकार लंबे समय से रिसर्च कर रही है और काम भी कर रही है.
इसमें कई तरह की परियोजनाएं शामिल हैं, जिन्हें हम आसान भाषा में समझ सकते हैं:
- रोपवे आधारित बस सिस्टम: इसमें बसें केबल या रस्सियों पर चलती हैं, जो जमीन से काफी ऊपर लगी होती हैं. ये पहाड़ी इलाकों या भीड़भाड़ वाले शहरों के लिए बढ़िया हैं.
- स्काई बस (Sky Bus): यह एक तरह का हैंगिंग रेल सिस्टम है, जिसमें बसें एलिवेटेड ट्रैक (ऊंचे पिलर्स पर बने ट्रैक) से लटकी हुई चलती हैं. ये देखने में ऐसा लगता है मानो हवा में उड़ रही हों.
- पॉड टैक्सी (Pod Taxi): इसे पर्सनल रैपिड ट्रांजिट (PRT) भी कहते हैं. इसमें छोटी-छोटी ऑटोमेटेड गाड़ियां होती हैं, जो एलिवेटेड या सस्पेंडेड ट्रैक पर चलती हैं. ये यात्रियों को सीधे उनके डेस्टिनेशन तक पहुंचाती हैं, बिना किसी स्टॉपेज के.
- एरियल इलेक्ट्रिक ट्रांजिट (Aerial Electric Transit): इसमें इलेक्ट्रिक पावर से चलने वाले वाहन हवा में खास तरह के स्ट्रक्चर पर चलते हैं.
- केबल-कार आधारित शहरी परिवहन (Cable-car based urban transport): जैसे हम पहाड़ों में केबल कार देखते हैं, वैसे ही शहरों में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है.
इन सभी सिस्टम में एक बात कॉमन है कि वाहन सड़क पर नहीं, बल्कि ऊंचे ट्रैक, केबल या सस्पेंडेड सिस्टम पर चलते हैं. इसी वजह से उन्हें 'हवा में उड़ने वाली' बस या वाहन कहा जा रहा है.
गडकरी के वादे और उनका ट्रैक रिकॉर्ड
नितिन गडकरी को अक्सर उनके बड़े और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स के लिए जाना जाता है. उन्होंने खुद इस बात पर जोर दिया कि जैसे वो पानी में उतरने वाला हवाई जहाज (सी-प्लेन) लेकर आए थे, वैसे ही जो भी वादा करेंगे, उसे पूरा करके दिखाएंगे.
सी-प्लेन परियोजना, जिसमें हवाई जहाज पानी पर उतर और उड़ सकते हैं, भारत में पर्यटन और कनेक्टिविटी के लिए एक नया आयाम साबित हुई है. उनका यह आत्मविश्वास बताता है कि 'उड़ने वाली बस' का विचार सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि एक ठोस प्लान का हिस्सा है.
किन शहरों में हो सकती है इसकी शुरुआत?
हालांकि, गडकरी जी ने अभी तक 'हवा में उड़ने वाली बस' के लिए कोई डिटेल्स प्लान, प्रोजेक्ट या लॉन्च की तारीख घोषित नहीं की है, लेकिन यह साफ है कि यह भविष्य की एक आधुनिक परिवहन प्रणाली है. परिवहन मंत्रालय पहले से ही देश के कई शहरों में वैकल्पिक एरियल ट्रांजिट सिस्टम की संभावनाएं तलाश रहा है.
जिन शहरों में बहुत ज्यादा ट्रैफिक की समस्या है और जहां पारंपरिक सड़कों का विस्तार करना मुश्किल है, वहां ऐसे सिस्टम पहले लाए जा सकते हैं.
बड़े मेट्रो सिटीज जैसे मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता, जहां ट्रैफिक जाम एक बड़ी चुनौती है, वहां इन तकनीकों का इस्तेमाल सबसे पहले होने की उम्मीद है. इसके अलावा, तेजी से बढ़ते टियर-2 शहरों में भी, जहां भविष्य में ट्रैफिक बढ़ने की आशंका है, इन सिस्टम्स को लाने पर विचार किया जा सकता है.
फिलहाल, इसे भारत के शहरी परिवहन के भविष्य के रूप में देखा जा रहा है, जो हमारे शहरों को और ज्यादा एफिशिएंट और रहने लायक बनाएगा.







































