गेमिंग की दुनिया: आजकल टेक्नोलॉजी इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि कभी-कभी समझ ही नहीं आता कि क्या सही है और क्या गलत। एक तरफ जहां हर कंपनी डिजिटल होने की दौड़ में लगी है, वहीं दूसरी तरफ कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो लाखों लोगों की पसंद और सहूलियत पर सीधे चोट करते हैं। ऐसा ही कुछ कर दिया है दुनिया की जानी-मानी टेक कंपनी सोनी ने, और उसके इस कदम से गेमिंग इंडस्ट्री में जबरदस्त हंगामा मचा हुआ है।
सोनी ने ऐलान किया है कि वो साल 2028 तक प्लेस्टेशन के फिजिकल डिस्क यानी गेम की जो CDs या DVDs आती हैं, उन्हें बनाना बंद कर देगा। अब आप सोच रहे होंगे, इसमें क्या बड़ी बात है? लेकिन ये बात छोटी नहीं, बहुत बड़ी है।
ब्रिटेन की एक बड़ी ट्रेड संस्था है, जिसका नाम है एंटरटेनमेंट रिटेलर्स एसोसिएशन (ERA)। इस संस्था ने सोनी के इस फैसले पर जमकर हमला बोला है।
उनका कहना है कि ये सिर्फ 'कॉर्पोरेट सुविधा की जीत है, उपभोक्ता की पसंद पर'। सीधा मतलब है, कंपनी अपनी सुविधा देख रही है, ग्राहकों की नहीं।
सोनी का फैसला, क्यों बना बवाल?
दरअसल, सोनी ने प्लान बनाया है कि 2028 के बाद प्लेस्टेशन के लिए फिजिकल डिस्क का प्रोडक्शन बंद कर दिया जाएगा। इसका मतलब ये हुआ कि आप कोई भी गेम सिर्फ डिजिटल तरीके से डाउनलोड कर पाएंगे।
गेम को हाथ में पकड़ने, उसकी सुंदर पैकेजिंग देखने, उसे इकट्ठा करने या दोस्तों के साथ शेयर करने का अनुभव खत्म हो जाएगा। ERA ने इस फैसले को लेकर सोनी की जमकर आलोचना की है।
उनका साफ कहना है कि डिजिटल गेम को फिजिकल फॉर्मेट का पूरक होना चाहिए, उसे बदलने की कोशिश नहीं।
ERA के सीईओ किम बेले ने एक बयान में साफ-साफ कहा, "डिस्क हटाना प्रगति नहीं है, ये तो सिर्फ पसंद हटाना है।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज भी करोड़ों गेमर्स फिजिकल कॉपीज खरीदना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें 'सच्ची ओनरशिप' यानी मालिकाना हक की वैल्यू पता है।
फिजिकल डिस्क में ऐसा क्या खास है?
अगर आप गेम खेलते हैं या गेमिंग से थोड़ा भी वाकिफ हैं, तो आप जानते होंगे कि फिजिकल डिस्क खरीदने के कई फायदे होते हैं। किम बेले ने उन्हीं फायदों को गिनाया है।
उन्होंने कहा कि एक डिस्क को आप अपने परिवार के साथ शेयर कर सकते हैं, उसे बाद में बेच सकते हैं या किसी और गेम से बदल सकते हैं (ट्रेड-इन कर सकते हैं)। उसे कलेक्ट करके रख सकते हैं, जो बाद में किसी पुराने कलेक्शन का हिस्सा बन सकती है।
और सबसे जरूरी बात, इसे सालों बाद भी खेला जा सकता है। सोचिए, बचपन में खरीदी हुई कोई गेम सीडी आज भी आप अपनी पुरानी कंसोल में लगाकर खेल सकते हैं!
वहीं, बेले ने ये भी बताया कि एक डिजिटल डाउनलोड लाइसेंस में अक्सर ये आजादी नहीं मिलती। आपने एक बार गेम डाउनलोड कर लिया, तो वो आपकी आईडी से लिंक हो गया।
उसे शेयर करना, बेचना या कलेक्ट करना नामुमकिन जैसा है। अगर किसी वजह से ऑनलाइन स्टोर बंद हो गया या आपकी आईडी में कोई दिक्कत आ गई, तो वो गेम भी खत्म!
आंकड़े क्या कहते हैं, क्या फिजिकल डिस्क की मांग कम है?
अगर आपको लगता है कि आजकल लोग सिर्फ डिजिटल गेम ही खरीदते हैं, तो आप शायद गलत हैं। द गेम बिजनेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, NielsenIQ और मार्केट रिसर्च फर्म GfK के आंकड़ों ने कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।
रिपोर्ट बताती है कि 2025 में यूके में बिके कुल फिजिकल गेम्स में से 45 प्रतिशत सिर्फ PS4 या PS5 के लिए थे। यह उस दौरान फिजिकल गेम रेवेन्यू का लगभग आधा हिस्सा था।
यानी लोग आज भी प्लेस्टेशन के लिए फिजिकल गेम धड़ल्ले से खरीद रहे हैं।
इतना ही नहीं, ERA ने यह भी बताया कि 25 साल से कम उम्र के 25 प्रतिशत गेमर्स आज भी डिस्क का इस्तेमाल करते हैं। 2025 में यूके में डिस्क-बेस्ड गेम्स का कुल बाजार 300 मिलियन पाउंड (लगभग 3,170 करोड़ रुपये) से ज्यादा का था।
ये आंकड़े साफ-साफ बताते हैं कि बॉक्स वाले गेम्स के लिए आज भी एक बड़ा और समर्पित दर्शक वर्ग मौजूद है।
किम बेले ने जोर देकर कहा कि "रिटेलर्स को ये डिमांड हर दिन दिखती है।" उनका मानना है कि फिजिकल गेम्स की वजह से लोग दुकानों पर आते हैं और गिफ्ट के तौर पर या कलेक्ट करने के लिए इन्हें खरीदते हैं, जिससे उन्हें असली वैल्यू मिलती है।
इंडस्ट्री को हर वैध तरीके को अपनाना चाहिए जिससे ग्राहक जुड़े रहें।
गेमर्स का क्या रिएक्शन है इस फैसले पर?
सिर्फ रिटेलर्स ही नहीं, खुद गेमर्स भी सोनी के इस फैसले से खुश नहीं हैं। सोशल मीडिया पर #SavePhysicalGames जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।
प्लेस्टेशन फैन्स ने एक ऑनलाइन याचिका (petition) भी शुरू की है, जिसमें सोनी से इस फैसले को पलटने की अपील की गई है। इस याचिका पर अब तक 1 लाख 70 हजार से ज्यादा लोगों ने साइन किए हैं!
कई गेमर्स ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर फिजिकल डिस्क बंद हो गए, तो वो गेम खरीदना ही छोड़ देंगे। उनकी चिंता जायज भी है।
अगर सारे गेम डिजिटल हो गए, तो क्या गेमर्स सच में गेम के मालिक होंगे या सिर्फ एक लाइसेंस के साथ गेम खेलने की इजाजत मिलेगी? ये एक बड़ा सवाल है जो सोनी के सामने खड़ा है।
कुल मिलाकर, सोनी का ये फैसला गेमिंग इंडस्ट्री में एक नई बहस छेड़ चुका है। एक तरफ जहां टेक्नोलॉजी कंपनियां पूरी तरह डिजिटल की ओर बढ़ रही हैं, वहीं ग्राहक और रिटेलर्स आज भी फिजिकल ओनरशिप को अहमियत देते हैं।
अब देखना ये होगा कि सोनी इन विरोधों को सुनकर अपने फैसले पर फिर से विचार करता है या फिर अपनी कॉर्पोरेट सुविधा को तरजीह देता है।




































