अंतर्राष्ट्रीय टेक डेस्क: कभी सोचा है आपने कि कितनी बार ऐसा हुआ है, जब आपने किसी कंपनी के कस्टमर केयर में कॉल किया और एक ही समस्या को बार-बार दोहराना पड़ा? पहले एक एजेंट को बताया, उसने कहा "ठीक है, हम देखते हैं"। फिर थोड़ी देर बाद दूसरे से बात हुई, उसने भी वही सवाल पूछे। ये कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि आज के मॉडर्न बिजनेस वर्ल्ड की एक बड़ी समस्या है, जिसे 'ऑर्गनाइजेशनल मेमोरी क्राइसिस' कहते हैं। और पता है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की एंट्री ने इस छिपी हुई दिक्कत को अब सबके सामने ला दिया है, वो भी ब्रिटेन जैसे हाई-टेक देशों में।
हाल ही में ब्रिटेन में AI को लेकर एक अजीब सी तस्वीर सामने आई है। एक तरफ कंपनियां AI को धड़ाधड़ अपना रही हैं, ताकि काम तेजी से हो, उत्पादकता बढ़े।
दूसरी तरफ, AI के आने से बिजनेस के भीतर की एक पुरानी कमजोरी उजागर हो गई है, जिसे लेकर अब तक लोग आंखें मूंदे हुए थे। मामला कुछ ऐसा है कि काम तो तेजी से हो रहा है, लेकिन ‘क्लैरिटी’ यानी स्पष्टता नहीं बढ़ रही।
ये ठीक वैसा ही है जैसे आप बहुत तेजी से गाड़ी चला रहे हों, लेकिन आपको पता ही न हो कि जाना कहां है।
आखिर ये 'मेमोरी क्राइसिस' है क्या, और AI इसे क्यों बढ़ा रहा है?
सीधा-सीधा कहें तो 'मेमोरी क्राइसिस' का मतलब है कि कंपनियों के पास अपने ही ग्राहकों या अपने ही ऑपरेशंस से जुड़ी जानकारी का कोई साझा और व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं है। मान लीजिए, आपने किसी कंपनी के प्रोडक्ट में कोई खराबी बताई।
ये बात पहले एजेंट को पता है, लेकिन जब आप दूसरे या तीसरे एजेंट से बात करते हैं, तो उन्हें आपकी पिछली बातचीत की कोई जानकारी नहीं होती। क्यों? क्योंकि कंपनी के भीतर अलग-अलग सिस्टम हैं, अलग-अलग टूल हैं, और ये सब एक-दूसरे से ठीक से जुड़े हुए नहीं हैं।
नतीजा? ग्राहक परेशान, और कंपनी का समय भी बर्बाद।
अब बात आती है AI की। जब कंपनियां इस टुकड़े-टुकड़े वाली जानकारी पर AI को बैठा देती हैं, तो समस्या और गंभीर हो जाती है।
AI तो स्मार्ट है, वो डेटा को प्रोसेस कर सकता है। लेकिन अगर डेटा ही बिखरा हुआ और अधूरा है, तो AI क्या करेगा? वो भी आपको अधूरी या गलत जानकारी ही देगा।
वो सिर्फ वही डेटा उठाएगा जो उसे मिलेगा, लेकिन दो अलग-अलग सिस्टम में पड़ी एक ही ग्राहक की जानकारी को वो अपने आप जोड़ नहीं पाता। इससे संस्थागत मेमोरी और भी कमजोर होती दिख रही है।
लन्दन में क्यों बननी पड़ी 'AI और जॉब्स टास्कफोर्स'?
यह समस्या अब इतनी बड़ी हो गई है कि सरकारें भी इसे अनदेखा नहीं कर पा रही हैं। अप्रैल में, लंदन के मेयर ने AI और जॉब्स टास्कफोर्स का गठन किया।
इसका मकसद यह जांचना था कि AI लंदन में काम करने के तरीकों को कैसे बदल रहा है। यह सिर्फ AI में निवेश करने की घोषणाओं से कहीं आगे की बात है।
अब सवाल यह है कि AI कंपनियों के भीतर असल में क्या कर रहा है और क्या यह सिर्फ मौजूदा समस्याओं को उजागर कर रहा है या हल भी कर रहा है?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि AI टेक्नोलॉजी को सही तरीके से लागू करने से पहले कंपनियों को अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को ठीक करना होगा। अगर आपका बेस ही कमजोर है, तो उस पर कितनी भी अच्छी बिल्डिंग बना लो, वो टिकेगी नहीं।
ठीक वैसे ही, अगर आपकी जानकारी बिखरी हुई है, तो AI के बड़े-बड़े दावे खोखले ही साबित होंगे।
'टॉगलिंग टैक्स' क्या है और यह प्रोडक्टिविटी को कैसे खाता है?
हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू में छपी एक रिसर्च के मुताबिक, नॉलेज वर्कर्स (जो लोग जानकारी के आधार पर काम करते हैं, जैसे डेटा एनालिस्ट, मार्केटिंग एक्सपर्ट) दिन में लगभग 1200 बार अलग-अलग एप्लीकेशन और टूल्स के बीच स्विच करते हैं। इसे "टॉगलिंग टैक्स" नाम दिया गया है।
सोचिए, एक कर्मचारी दिनभर में 1200 बार एक सॉफ्टवेयर से दूसरे सॉफ्टवेयर में जा रहा है! इसका मतलब साफ है कि हमारे पास टूल्स की कमी नहीं है, लेकिन उनके बीच कोई तालमेल नहीं है।
यह "टॉगलिंग टैक्स" उत्पादकता को अंदर ही अंदर खोखला करता है। हर बार जब आप एक ऐप से दूसरे ऐप में जाते हैं, तो आपका फोकस टूटता है, और आपको दोबारा खुद को उस काम में लगाना पड़ता है।
यह सिर्फ समय की बर्बादी नहीं, बल्कि मानसिक थकान भी पैदा करता है। और जब ऐसे में AI को इन बिखरे हुए सिस्टम्स पर थोपा जाता है, तो उत्पादकता बढ़ने के बजाय एक नया 'प्रोडक्टिविटी पैराडॉक्स' जन्म लेता है।
मतलब, काम तो तेजी से हो रहा है, लेकिन स्पष्टता और नतीजे वो नहीं मिल पा रहे हैं, जिनकी उम्मीद थी।
AI सब कुछ ऑटोमेटिक कर देगा, ये सिर्फ एक भ्रम है?
आजकल मार्केट में कई AI टूल्स हैं, जो दावा करते हैं कि वे दस्तावेजों को ढूंढेंगे, बातचीत का सारांश बनाएंगे, और जरूरी लिंक्स को सामने लाएंगे। ये सब ठीक है, लेकिन इन टूल्स का एक बड़ा हिस्सा अभी भी 'सिंथेसिस वर्क' यानी जानकारी को जोड़कर एक मतलब निकालने का काम इंसानों पर ही छोड़ देता है।
AI सिर्फ कच्चा माल इकट्ठा कर रहा है, उसे पकाना अभी भी कर्मचारियों को पड़ रहा है।
इसका मतलब है कि कर्मचारियों को अभी भी बिखरी हुई जानकारी को खुद ही जोड़कर एक पूरा चित्र बनाना पड़ रहा है। और इसका असर सिर्फ कर्मचारियों पर ही नहीं, बल्कि उन ग्राहकों और अंतिम-उपयोगकर्ताओं पर भी पड़ता है, जो कंपनी के फैसलों का इंतजार कर रहे होते हैं।
कुल मिलाकर, ब्रिटेन की AI क्रांति एक महत्वपूर्ण सवाल उठा रही है: क्या हम सिर्फ नई टेक्नोलॉजी को अपना रहे हैं, या हम अपनी पुरानी समस्याओं को ठीक करने के बजाय उन्हें AI के पर्दे के पीछे छिपा रहे हैं? जब तक कंपनियों के भीतर 'शेयर्ड मेमोरी' का कल्चर और सिस्टम नहीं बनेगा, तब तक AI अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएगा।



































