राजस्थान: भैया, खबर ऐसी आई है कि सुनने वाले के कान खड़े हो जाएं और दिल में एक अजीब सी बेचैनी उठने लगे। राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में पिछले दो महीनों में जो हुआ है, वो किसी बुरे सपने से कम नहीं। जहां एक नए जीवन का स्वागत होना था, वहां मातम पसर गया है। मई 2026 से अब तक, बच्चे के जन्म या सिजेरियन ऑपरेशन से जुड़ी परेशानियों के चलते कम से कम 18 माताओं की जान चली गई है। और इसमें सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि जुलाई के सिर्फ शुरुआती छह दिनों में नौ महिलाएं मौत की नींद सो गईं। ये आंकड़े किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को हिला देने के लिए काफी हैं।
लेकिन ये कहानी सिर्फ मौतों तक ही नहीं रुकती। इन 18 मौतों के अलावा, 7 और महिलाएं ऐसी हैं जिनकी हालत गंभीर बनी हुई है।
प्रसव के बाद उनकी किडनी फेल हो गई है और अब उन्हें जिंदगी बचाने के लिए डायलिसिस का सहारा लेना पड़ रहा है। सोचिए, एक घर में बच्चे की किलकारी गूंजनी थी, लेकिन वहां अब मौत का सन्नाटा और बीमारी की खामोशी पसरी हुई है।
ये कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं लगती, बल्कि लगता है कि प्रसव के बाद होने वाली गंभीर जटिलताओं का एक बड़ा पैटर्न सामने आ रहा है।
आम तौर पर, बच्चे का जन्म हर परिवार के लिए खुशी का पल होता है। लेकिन राजस्थान के मुख्य इलाकों में अब ये 'पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी' जैसा बनता जा रहा है।
ये स्थिति राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़े-बड़े सवाल खड़े करती है। क्या हमारे सरकारी अस्पताल माताओं को वो सुरक्षा दे पा रहे हैं, जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है? आइए, इस पूरी कहानी को थोड़ा और करीब से समझते हैं।
आखिर राजस्थान के अस्पतालों में माताओं के साथ ये क्या हो रहा है?
बता दें कि मई महीने से भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, जोधपुर जैसे कम से कम पांच जिलों के सरकारी अस्पतालों से माताओं की मौत की खबरें लगातार आ रही हैं। कुल मिलाकर 18 मौतें, जिनमें से 9 तो सिर्फ जुलाई के पहले छह दिनों में ही हो गईं।
जरा कल्पना कीजिए, छह दिन में नौ घर उजड़ गए। इन सभी मामलों में महिलाओं की मौत डिलीवरी या ऑपरेशन के बाद ही हुई है।
ये एक ऐसा पैटर्न है जो किसी को भी चिंता में डाल सकता है कि आखिर राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं की क्वालिटी को क्या हो गया है?
जानकारों का कहना है कि इतने कम समय में इतनी सारी मौतों का होना वाकई हैरान करने वाला है। आमतौर पर डिलीवरी या सिजेरियन ऑपरेशन को अब काफी सुरक्षित प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन अगर इतने बड़े पैमाने पर जटिलताएं आ रही हैं, तो कहीं न कहीं सिस्टम में कोई बड़ी गड़बड़ी ज़रूर है।
मातृ मृत्यु दर में सुधार के बाद ये अचानक गिरावट क्यों?
अगर हम राजस्थान के पिछले रिकॉर्ड्स देखें, तो मातृ स्वास्थ्य के मामले में इस राज्य ने काफी अच्छा काम किया था। आपको जानकर शायद थोड़ी तसल्ली होगी कि कुछ साल पहले तक राजस्थान को मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality Ratio - MMR) कम करने में देश का एक सफल उदाहरण माना जाता था।
आंकड़ों की बात करें तो, साल 2017-19 के दौरान प्रति 1 लाख जीवित जन्म पर 141 माताओं की मौत होती थी। लेकिन राजस्थान ने इस आंकड़े को सुधारते हुए 2018-20 में इसे घटाकर 113 पर ला दिया।
ये एक बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन अब जब इतने कम समय में एक साथ इतनी सारी मौतें सामने आ रही हैं, तो हेल्थ एक्सपर्ट्स भी परेशानी में हैं।
उनके मन में भी यही सवाल है कि आखिर इतने अच्छे सुधार के बाद अचानक ऐसी स्थिति क्यों पैदा हो गई? कहीं ये किसी नई समस्या का संकेत तो नहीं?
परिवारों का दर्द और उनके गंभीर आरोप क्या हैं?
जिन परिवारों ने अपनी मां, बेटी या पत्नी को खोया है, उनका दर्द समझ पाना मुश्किल है। वे तो अस्पताल में एक नए मेहमान के स्वागत की उम्मीद लेकर पहुंचे थे, लेकिन उनकी खुशियां पलभर में छीन ली गईं।
इन परिवारों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन ने उन्हें इलाज से जुड़े पूरे मेडिकल रिकॉर्ड्स तक नहीं दिए। उन्हें ये भी ठीक से नहीं बताया गया कि आखिर उनकी प्रियजन की मौत कैसे हुई।
कई परिवारों ने इन मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग की है। वे चाहते हैं कि जिम्मेदारी तय की जाए और पूरी पारदर्शिता के साथ बताया जाए कि क्या हुआ था।
परिजनों का कहना है कि उनकी महिलाएं जब भर्ती हुई थीं, तब उनकी स्थिति सामान्य थी, लेकिन सामान्य प्रसव या सिजेरियन के कुछ समय बाद ही उनकी जान चली गई। ये आरोप बेहद गंभीर हैं और इनकी गहन जांच होनी बहुत जरूरी है।
कुल मिलाकर, राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में हुई इन मौतों ने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं कि वे इस मामले में क्या कदम उठाते हैं।
लोग जानना चाहते हैं कि आखिर इन माताओं की मौत के पीछे की असली वजह क्या है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या किया जाएगा।









































