राष्ट्रीय डेस्क: भारत का एक बड़ा सपना है, दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल होने का जो अपने दम पर चिप बनाते हैं, डिजाइन करते हैं और पूरी दुनिया को सप्लाई करते हैं। ये चिप वही होते हैं जो आपके फोन से लेकर कार तक, हर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की जान होते हैं। और अब, इस सपने को हकीकत में बदलने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम उठ गया है। खबर ये है कि भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 (ISM 2.0) का रास्ता साफ हो गया है। जी हां, जो थोड़ी-बहुत अड़चनें थीं, वो सब दूर कर दी गई हैं।
सरकार के अंदर से खबर आ रही है कि इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) मंत्रालय अब जल्द ही इस बड़े मिशन को कैबिनेट की मंजूरी के लिए पेश करने वाला है। सूत्रों की मानें तो इससे जुड़े सभी मसले सुलझा लिए गए हैं और अब ये सिर्फ औपचारिकता भर बची है कि सरकार इस बड़े प्लान पर अपनी मुहर लगा दे।
ये मिशन भारत को सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक गेम चेंजर साबित हो सकता है।
अगर आप सोच रहे हैं कि इस मिशन का बजट कितना बड़ा है, तो जान लीजिए कि ये कोई छोटी-मोटी रकम नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, ISM 2.0 की कुल लागत करीब 1.25 लाख करोड़ रुपए होने वाली है।
इतने बड़े बजट के साथ, सरकार ने तीन मुख्य चीजों पर फोकस करने का मन बनाया है: पहला, चिप मैन्युफैक्चरिंग यानी चिप बनाने की प्रक्रिया; दूसरा, डिजाइन, यानी चिप की रूपरेखा तैयार करना; और तीसरा, स्किल डेवलपमेंट, यानी इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को कुशल बनाना।
आखिर भारत को पूरे इकोसिस्टम की जरूरत क्यों पड़ी?
अब यहां एक बहुत अहम बात है। सरकार सिर्फ चिप मैन्युफैक्चरिंग पर ही ध्यान नहीं दे रही, बल्कि पूरे इकोसिस्टम को खड़ा करने की बात कर रही है।
इकोसिस्टम का मतलब क्या है? मान लीजिए आप एक घर बना रहे हैं, तो सिर्फ ईंटें होने से काम नहीं चलेगा। आपको सीमेंट, बजरी, रेत, सरिया और कुशल कारीगर भी चाहिए।
ठीक वैसे ही, सेमीकंडक्टर चिप बनाने के लिए सिर्फ फैक्ट्री लगाने से बात नहीं बनेगी। इसके लिए रॉ मैटेरियल यानी कच्चा माल, जैसे गैस और इंगॉट्स (जो चिप बनाने का आधार होते हैं) और बाकी दूसरे जरूरी सामान भी देश में ही बनने चाहिए।
सरकार का जोर इसी बात पर है कि देश के भीतर ही गैस, इंगॉट्स और दूसरे रॉ मैटेरियल का प्रोडक्शन शुरू हो, ताकि हमारी सप्लाई चेन्स मजबूत हों और हमें दूसरे देशों पर निर्भर न रहना पड़े। ये एक तरह का ‘मेक इन इंडिया’ एप्रोच है, जो इस अति-संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में हमारी आत्मनिर्भरता को बढ़ाएगा।
क्या ये सचमुच एक बड़ा कदम नहीं है?
क्या पहले भी कोई मिशन था, और उसका क्या हुआ?
ऐसा नहीं है कि भारत ने सेमीकंडक्टर की दुनिया में कदम पहली बार रखा है। इससे पहले इंडियन सेमीकंडक्टर मिशन 1.0 (ISM 1.0) भी आया था।
वो मिशन करीब 70,000 करोड़ रुपए का था, जिसके तहत सरकार ने करीब 12 कंपनियों को मैन्युफैक्चरिंग करने की परमिशन दी थी। खुशी की बात ये है कि उनमें से 3 कंपनियों ने तो अपना प्रोडक्शन भी शुरू कर दिया है।
तो देखा जाए तो ISM 2.0 उसी सफलता की सीढ़ी का अगला पायदान है।
एक और महत्वपूर्ण अपडेट ये है कि ISM 2.0 की समय सीमा 5 साल से बढ़ाकर 12 साल कर दी गई है। ये दिखाता है कि सरकार इस मिशन को लेकर कितनी गंभीर है और इसे एक लंबी अवधि की योजना के रूप में देख रही है।
सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में निवेश और डेवलपमेंट में समय लगता है, इसलिए ये विस्तार एक समझदारी भरा कदम है। इससे कंपनियों को भी एक स्थिर माहौल मिलेगा ताकि वो बड़े निवेश कर सकें।
इस मिशन से भारत को क्या फायदा होगा?
सरकार को इस नई योजना से बड़ी उम्मीदें हैं। लक्ष्य ये है कि साल 2030 तक भारत अपनी घरेलू सेमीकंडक्टर मांग का करीब 75 प्रतिशत तक खुद ही पूरा कर सके।
इसका सीधा मतलब है कि विदेशों से चिप इम्पोर्ट करने की हमारी निर्भरता काफी कम हो जाएगी। अभी हम अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से मंगाते हैं, लेकिन ISM 2.0 हमें इस निर्भरता से आजादी दिलाएगा।
सिर्फ आत्मनिर्भरता ही नहीं, बल्कि सरकार का ये भी लक्ष्य है कि भारत ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बन जाए। सोचिए, एक दिन भारत सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिप बनाएगा! ये न सिर्फ हमारी अर्थव्यवस्था को बूस्ट देगा, बल्कि लाखों नई नौकरियां भी पैदा करेगा।
इस मिशन के रोल आउट होने के बाद, ऐसी उम्मीद है कि कई नई कंपनियां इस सेमीकंडक्टर स्पेस में कदम रखेंगी, जिससे कॉम्पिटिशन बढ़ेगा और इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा। कुल मिलाकर, ये सिर्फ एक सरकारी स्कीम नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की एक बड़ी तस्वीर है।




































