धार: मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर धार में मौजूद भोजशाला का विवाद तो आपने सुना ही होगा। सालों से ये मामला हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के लिए आस्था और पहचान से जुड़ा है। अब ये हाई-प्रोफाइल मामला देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। हाल ही में इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, और जो फैसला आया, उसने मुस्लिम पक्ष को फिलहाल के लिए बड़ा झटका दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया, जिसे मुस्लिम पक्ष ने चुनौती दी थी। शीर्ष अदालत ने इस पूरे मामले को 'बेहद संवेदनशील' बताया और कहा कि सभी पक्षों को बहुत सोच-समझकर बयान देने चाहिए, ताकि माहौल न बिगड़े।
क्या कुछ हुआ कोर्ट में और क्या हैं इसके मायने, चलिए सब आसान भाषा में समझते हैं।
भोजशाला का पूरा मामला क्या है, और विवाद क्यों है?
दरअसल, धार की भोजशाला एक ऐतिहासिक इमारत है, जिसे लेकर हिंदू और मुस्लिम दोनों ही अपने-अपने दावे करते हैं। हिंदू पक्ष इसे देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर मानता है, जिसका निर्माण राजा भोज ने करवाया था, वहीं मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के तहत यह एक संरक्षित स्मारक है। ASI के नियमों के मुताबिक, हर मंगलवार को हिंदू समुदाय यहां पूजा कर सकता है, और शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज़ पढ़ सकता है।
लेकिन, इस व्यवस्था को लेकर समय-समय पर विवाद उठता रहा है।
हाल ही में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला को लेकर एक आदेश दिया था, जिसे मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि हाई कोर्ट के आदेश से वहां पिछले 40 साल से चली आ रही स्थिति बदल गई है, जो कि ठीक नहीं है।
इसी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई।
सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ, कौन से तर्क दिए गए?
सुनवाई की कमान चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस मोहना की बेंच ने संभाली थी। मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील हुजेफा अहमदी ने कोर्ट में अपनी दलीलें रखीं।
अहमदी साहब ने कोर्ट के सामने ये बात रखी कि भोजशाला में जो पुरानी व्यवस्था थी, उसे बदल दिया गया है, और यह अनुचित है। उन्होंने मांग की कि हाई कोर्ट के आदेश पर फिलहाल रोक लगाई जाए।
लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को तुरंत मंजूर नहीं किया। चीफ जस्टिस ने साफ शब्दों में कहा कि यह मामला बहुत ही नाज़ुक है।
उन्होंने कहा कि "इस्तेमाल किए जाने वाले हर एक्सप्रेशन के प्रति बहुत ही सावधानी की जरूरत है।" मतलब, कोई भी पक्ष ऐसी बात न कहे, जिससे किसी की भावनाएं आहत हों या तनाव बढ़े।
अदालत का मकसद किसी भी तरह से माहौल खराब करना नहीं था, बल्कि एक स्थायी समाधान खोजना था।
नमाज़ के लिए मिली अस्थायी जगह, लेकिन ये परमानेंट नहीं है?
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने मुस्लिम पक्ष से एक अहम सवाल पूछा। उन्होंने जानना चाहा कि क्या भोजशाला परिसर के पास कोई ऐसी खुली जगह है, जहां मुस्लिम भाई शुक्रवार की नमाज़ अदा कर सकें? इस पर चर्चा हुई और अंततः अदालत ने एक अंतरिम व्यवस्था दी।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि भोजशाला परिसर के पास एक खुली जगह फिलहाल शुक्रवार की नमाज के लिए उपलब्ध कराई जाए।
लेकिन, अदालत ने इस बात को भी साफ कर दिया कि यह केवल एक 'अस्थायी व्यवस्था' है। इसका मतलब है कि यह कोई परमानेंट समाधान नहीं है, बल्कि तब तक के लिए है, जब तक इस पूरे विवाद का कोई ठोस हल नहीं निकल जाता।
कोर्ट ने कहा कि वे इस मामले की नियमित सुनवाई करेंगे, ताकि इसका एक स्थायी समाधान निकाला जा सके।
प्रशासन और ASI का क्या कहना है?
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी अदालत में मौजूद थे। उन्होंने कोर्ट को बताया कि प्रशासन के दखल के बाद फिलहाल इलाके में शांति बनी हुई है।
मेहता ने यह भी कहा कि यह मामला शुरुआत में कुछ दिनों का लग रहा था, लेकिन अब करीब दो महीने बीत चुके हैं और विवाद अभी भी जारी है। उन्होंने संकेत दिया कि मामला जितना जटिल दिख रहा है, उससे कहीं ज़्यादा है।
अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पहले के आदेशों पर भी टिप्पणी की और कहा कि उन्हीं आदेशों के बाद वहां विवाद की स्थिति बनी थी। इसका मतलब है कि कोर्ट ASI की भूमिका को भी देख रहा है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी संग्रहालयों में रखी पुरातात्विक वस्तुओं पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, जो शायद किसी अन्य संदर्भ में बात उठी होगी, लेकिन फिलहाल भोजशाला विवाद पर ही ध्यान केंद्रित रखा गया।
आगे क्या होगा, अगली सुनवाई कब है?
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इसका मतलब है कि हाई कोर्ट का आदेश अभी लागू रहेगा।
इसके साथ ही, अदालत ने ASI और मध्य प्रदेश सरकार से मुस्लिम पक्ष की याचिका पर जवाब भी मांगा है। यानी, दोनों सरकारी एजेंसियों को अपनी बात कोर्ट के सामने रखनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि भोजशाला परिसर में किसी भी तरह का निर्माण या उसके ढांचे में बदलाव बिना अदालत की अनुमति के नहीं किया जा सकता। यह एक अहम निर्देश है, जो यह सुनिश्चित करेगा कि मामले की सुनवाई के दौरान यथास्थिति बनी रहे।
अब इस मामले की अगली सुनवाई में और क्या निकलकर सामने आता है, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, इंतजार है अगली तारीख का, जब फिर से देश की सबसे बड़ी अदालत में इस संवेदनशील मामले पर बहस होगी।









































