नई दिल्ली: देश के स्कूलों में अब वो सब बातें सिखाने की तैयारी हो रही है, जिन पर अमूमन हमारे समाज में खुलकर बात करने से लोग कतराते हैं। जी हां, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि पूरे देश के स्कूलों और कॉलेजों में अब 'सेक्स एजुकेशन' यानी यौन शिक्षा का एक पूरा 'पाठ्यक्रम' शुरू किया जाएगा। यह सिर्फ एक 'एकेडमिक' फैसला नहीं है, बल्कि इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट की एक अहम 'टिप्पणी' और एक बड़ी 'कमेटी' की सालों की मेहनत शामिल है। एक ऐसा कदम, जो शायद हमारे बच्चों को न सिर्फ उनके शरीर और रिश्तों के बारे में सही जानकारी देगा, बल्कि उन्हें कई तरह के 'खतरों' से भी बचा सकता है।
बता दें कि केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से सुप्रीम कोर्ट को ये जानकारी दी है कि उन्होंने एक विशेषज्ञ समिति की सारी सिफारिशों को मान लिया है। अब बस सुप्रीम कोर्ट की 'मंज़ूरी' का इंतजार है और फिर इन सिफारिशों को पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट में सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहीं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने जस्टिस बी. वी.
नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ के सामने ये बात रखी।
उन्होंने साफ कहा कि सरकार ने 'रिपोर्ट' को स्वीकार कर लिया है और अब इसे देश भर में लागू करने का मन बना लिया है।
आखिर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी पहल करने को क्यों कहा था?
इस पूरे मामले की जड़ में सुप्रीम कोर्ट की एक पुरानी टिप्पणी है। असल में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि कुछ ऐसे तरीके खोजे जाएं, जिनसे 'किशोरों' (adolescents) के बीच आपसी सहमति से बने रिश्तों और नाबालिग के गर्भवती होने के मामलों को 'पॉक्सो' (POCSO) कानून के तहत हर बार 'अपने-आप' अपराध न माना जाए।
कोर्ट का मानना था कि हर मामले को एक ही तराजू पर तौलना कभी-कभी सही नहीं होता, खासकर जब मामला 'आपसी सहमति' का हो।
ये एक बेहद संवेदनशील और जटिल मसला था। 'पॉक्सो' कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया है, लेकिन कभी-कभी ऐसे मामले भी सामने आते हैं जहां नाबालिग उम्र के लड़के-लड़की 'आपसी सहमति' से रिश्ते में होते हैं और फिर किसी कारण से मामला पुलिस तक पहुंच जाता है।
ऐसे में कानून की व्याख्या और उसके 'इम्प्लीमेंटेशन' पर सवाल उठने लगे थे।
समिति को क्या काम सौंपा गया था और इसमें कौन-कौन शामिल थे?
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार ने तुरंत गंभीरता से इस पर काम शुरू कर दिया। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के एक अतिरिक्त सचिव की अगुवाई में एक 26 सदस्यीय राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति बनाई गई।
इस कमेटी का गठन कोई साधारण बात नहीं थी, क्योंकि इसमें समाज के विभिन्न क्षेत्रों के जानकार शामिल किए गए थे।
समिति को एक बड़ा और महत्वपूर्ण काम सौंपा गया था। उन्हें यह जांचना था कि 'पॉक्सो' कानून का 'आपसी सहमति' वाले 'किशोर' रिश्तों पर क्या असर पड़ता है।
इसके साथ ही, उन्हें यह भी देखना था कि बच्चों की सुरक्षा, उनके 'निजता के अधिकार' (right to privacy) और कानून के मौजूदा प्रावधानों के बीच एक सही 'बैलेंस' कैसे बनाया जा सकता है। यह एक ऐसा 'चैलेंज' था, जहाँ बच्चों को बचाने के साथ-साथ उनकी 'स्वतंत्रता' और 'समझ' का भी ध्यान रखना था।
इस विशेषज्ञ समिति में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) के कई नामी 'विशेषज्ञ' शामिल थे। इनके अलावा, 'क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक', केंद्र और राज्य सरकारों के आला अधिकारी, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के प्रतिनिधि और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के सदस्य भी इस कमेटी का हिस्सा थे।
यानी हर 'एंगल' से विचार करने के लिए 'डायवर्स' टीम बनाई गई थी।
समिति की मुख्य सिफारिशें क्या हैं और इनका बच्चों पर क्या असर होगा?
काफी 'रिसर्च' और 'डिस्कशन' के बाद इस कमेटी ने अपनी 'रिपोर्ट' सरकार को सौंपी, जिसमें कई अहम सिफारिशें की गई हैं। सबसे पहली और बड़ी बात ये कि स्कूलों के 'मुख्य पाठ्यक्रम' (main curriculum) में अब 'व्यापक यौन शिक्षा' (comprehensive sex education) को शामिल किया जाए।
इसका मतलब सिर्फ 'किताबें' नहीं, बल्कि बच्चों को 'यौन शोषण' से बचाने के बारे में भी जागरूक किया जाएगा। ये उन्हें किसी भी तरह के 'खतरे' को पहचानने और उससे बचने में मदद करेगा।
समिति का कहना है कि यह 'शिक्षा' बच्चों की उम्र के हिसाब से दी जानी चाहिए। यानी, छोटे बच्चों को शुरुआती कक्षाओं में ही 'पर्सनल हाइजीन' (personal hygiene), शरीर के बारे में सही जानकारी और सबसे ज़रूरी 'गुड टच' (good touch) और 'बैड टच' (bad touch) जैसी बातें सिखाई जाएं।
ये बातें उन्हें अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक करेंगी और उन्हें किसी भी गलत हरकत को पहचानने की 'समझ' देंगी।
इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) से भी अपील की गई है। उनसे कहा गया है कि इन सिफारिशों के आधार पर स्कूलों के 'पाठ्यक्रम' में ज़रूरी बदलाव किए जाएं।
यानी, अब एनसीईआरटी को अपने सिलेबस में इन नए 'चैप्टर्स' और 'कॉन्सेप्ट्स' को शामिल करना होगा। साथ ही, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के अनुसार स्कूलों और कॉलेजों में 'किशोरों' के लिए उपयुक्त 'गाइडलाइंस' बनाने की भी बात कही गई है।
कुल मिलाकर, ये एक ऐसा बदलाव है जो आने वाले समय में हमारे बच्चों की सोच और समाज की 'मेंटेलिटी' को बदल सकता है, उन्हें सुरक्षित और जानकार बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।






































