अमेरिका: बीते कुछ सालों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI ने जिस तरह से दुनिया पर अपनी पकड़ बनाई है, उसे देखकर अक्सर लोग हैरान रह जाते हैं. बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों ने AI के दम पर आसमान छूती कमाई की है, लेकिन सवाल ये भी उठ रहा है कि इस कमाई का फायदा सिर्फ कुछ गिने-चुने अरबपतियों को क्यों मिले? क्या ये मुनाफा आम जनता तक भी नहीं पहुंचना चाहिए, खासकर तब जब AI की वजह से लाखों नौकरियां खतरे में पड़ रही हैं?
अमेरिका में इन्हीं सवालों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है. वहां की जनता, जो AI से नौकरी जाने के खतरे और बढ़ती असमानता से जूझ रही है, अब AI कंपनियों की बेहिसाब दौलत को आम लोगों के फायदे के लिए इस्तेमाल करने की मांग कर रही है.
एक हालिया सर्वे में सामने आया है कि अमेरिकी नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा चाहता है कि AI कंपनियों को अपनी आधी हिस्सेदारी एक सरकारी वेल्थ फंड में ट्रांसफर करनी पड़े. ये कोई छोटी-मोटी मांग नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत है.
आखिर इस AI वेल्थ फंड का फंडा क्या है?
दरअसल, अमेरिका में अब तक हुए एक राष्ट्रीय सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. कुल 1,690 वयस्कों पर किए गए इस वेरासाइट (Verasight) सर्वे के मुताबिक, अमेरिका के 69 फीसदी लोग चाहते हैं कि AI कंपनियों को अपने 50 फीसदी शेयर एक सरकारी वेल्थ फंड में डालने के लिए मजबूर किया जाए.
ये वेल्थ फंड सिर्फ पैसे जमा करने का जरिया नहीं होगा, बल्कि इसका मकसद AI से होने वाले आर्थिक फायदे को मौजूदा और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना होगा. इतना ही नहीं, इससे कामकाजी वर्ग यानी वर्किंग क्लास अमेरिकियों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए नए प्रोजेक्ट्स और इन्फ्रास्ट्रक्चर में भी निवेश किया जाएगा.
दिलचस्प बात ये भी है कि इसी सर्वे में 89 फीसदी लोगों ने इस बात पर ज़ोरदार समर्थन दिया कि AI कंपनियों को अपनी सभी इंटरनल सेफ्टी टेस्टिंग के नतीजों को सार्वजनिक करना चाहिए. मतलब साफ है, लोग चाहते हैं कि AI सिर्फ मुनाफा न कमाए, बल्कि पारदर्शिता और सुरक्षा के मोर्चे पर भी खरा उतरे.
बर्नार्ड सैंडर्स का क्या प्रस्ताव है?
इस पूरे मामले को हवा दी है अमेरिकी सीनेटर बर्नार्ड सैंडर्स (Senator Bernie Sanders) ने. उन्होंने 'अमेरिकन AI सॉवरेन वेल्थ फंड एक्ट' (American AI Sovereign Wealth Fund Act) का प्रस्ताव रखा है.
जब इस एक्ट का ऐलान हुआ, तब सैंडर्स ने साफ शब्दों में कहा, "ये सुनिश्चित करेगा कि AI से मिलने वाले आर्थिक लाभ हम सभी के जीवन को बेहतर बनाने के लिए उपयोग किए जाएं, न कि सिर्फ दुनिया के सबसे अमीर लोगों को और अमीर बनाने के लिए."
सैंडर्स यहीं नहीं रुके. उन्होंने अपनी बात को और धार देते हुए कहा, "AI का भविष्य और मानवता का भाग्य सिलिकॉन वैली में अरबपतियों द्वारा बंद दरवाजों के पीछे तय नहीं किया जाना चाहिए, जो केवल अपनी शक्ति और मुनाफे को अधिकतम करने की कोशिश कर रहे हैं.
" उनका ये बयान सीधे तौर पर उन बड़ी टेक कंपनियों को चुनौती है, जो AI के दम पर खरबों का कारोबार कर रही हैं, लेकिन इसके सामाजिक प्रभावों पर चुप्पी साधे हुए हैं.
आपको बता दें कि ये प्रस्ताव इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि AI के जबरदस्त विकास के साथ-साथ नौकरी जाने का डर भी बढ़ रहा है. गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 के आखिर से अब तक AI इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनियों की मार्केट वैल्यू में 27 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा का इजाफा हुआ है.
कंपनियों के मुनाफे और टेक्नोलॉजी में निवेश रिकॉर्ड स्तर पर हैं.
तो फिर समस्या कहां है?
समस्या ये है कि एक तरफ जहां कॉर्पोरेट मुनाफा और अरबपतियों की संपत्ति लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ आम अमेरिकी नागरिक, खासकर वर्किंग क्लास के लोग, AI टेक्नोलॉजी की वजह से नौकरियां खो रहे हैं. एंट्री लेवल की कई पोजीशन तो गायब ही हो चुकी हैं, और जो बची हैं उन पर तलवार लटकी हुई है.
ऐसे में, जब चंद लोग AI से बेहिसाब दौलत कमा रहे हैं और लाखों लोग अपना रोजगार गंवा रहे हैं, तो स्वाभाविक है कि लोग चाहेंगे कि इस दौलत का एक हिस्सा उनके बेहतर भविष्य के लिए भी इस्तेमाल हो.
सर्वे में एक और दिलचस्प बात सामने आई. जब इस सॉवरेन वेल्थ फंड को सीधे सीनेटर सैंडर्स के नाम से जोड़ा गया, तब भी इसके समर्थन में सिर्फ मामूली गिरावट आई और ये 64 फीसदी पर बना रहा.
ये आंकड़ा दिखाता है कि AI से होने वाली भारी कमाई को आम अमेरिकियों के बीच बांटने की इच्छा किसी एक पार्टी या नेता तक सीमित नहीं है, बल्कि ये द्विदलीय यानी बाई-पार्टिसन इच्छा है. मतलब, रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ही चाहते हैं कि AI की दौलत का कुछ हिस्सा जनता को मिले.
कुल मिलाकर, अमेरिका में AI को लेकर एक नया आर्थिक और सामाजिक मॉडल बनाने की बात हो रही है. जनता अब सिर्फ तकनीक का इस्तेमाल नहीं, बल्कि उससे होने वाले फायदों में भी अपनी हिस्सेदारी चाहती है.
देखना होगा कि सीनेटर सैंडर्स का ये प्रस्ताव हकीकत में बदल पाता है या नहीं और AI की दौलत वाकई में आम अमेरिकियों की जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव ला पाती है या नहीं.



































