अंतरराष्ट्रीय डेस्क: आयरलैंड, जिसे अक्सर अपनी हरी-भरी वादियों और मनमोहक दृश्यों के लिए जाना जाता है, आज एक ऐसी खामोश क्रांति की चपेट में है, जिसका शोर भले ही सुनाई न दे, लेकिन असर पूरे देश की बिजली खपत पर पड़ रहा है। सोचिए, एक ऐसा देश जो अपनी कुदरती खूबसूरती के लिए दुनियाभर में मशहूर है, वहां के घरों से ज्यादा बिजली की भूख अब उन अदृश्य सर्वर्स की हो चली है, जो चौबीसों घंटे हमारी डिजिटल दुनिया को जिंदा रखते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं डेटा सेंटर्स की, जिनकी बिजली खपत पिछले दस सालों में इतनी बढ़ गई है कि अब यह चिंता का विषय बन गई है।
जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। आयरलैंड में डेटा सेंटर्स की बिजली की खपत पिछले एक दशक में, यानी महज दस सालों में, 360% तक बढ़ गई है।
ये कोई छोटा-मोटा उछाल नहीं है, बल्कि एक जबरदस्त हाई जंप है जिसने पूरे सिस्टम को हिला कर रख दिया है। साल 2026 तक आते-आते, ये डेटा सेंटर्स देश की कुल बिजली डिमांड का 23% हिस्सा अकेले निगल रहे हैं।
अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें क्या बड़ी बात है? तो सुनिए, देश की कुल आवासीय खपत, यानी जितने बिजली की जरूरत घरों में होती है, वो 28% है। यानी, डेटा सेंटर्स अब घरों की खपत के लगभग बराबर पहुंच गए हैं, और जिस स्पीड से ये बढ़ रहे हैं, वो दिन दूर नहीं जब ये सर्वर फार्म आयरलैंड की पांच मिलियन से ज़्यादा आबादी के घरों की बिजली खपत को भी पीछे छोड़ देंगे।
आंकड़े क्या कहानी कहते हैं?
ये सारे हैरतअंगेज आंकड़े आयरलैंड के सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (CSO) की एक रिपोर्ट से सामने आए हैं। रिपोर्ट बताती है कि 2024 से 2025 के बीच, डेटा सेंटर्स की बिजली खपत में साल-दर-साल 10% की बढ़ोतरी हुई है।
और ये सब तब हुआ है, जब 2021 में नए डेटा सेंटर्स के ग्रिड कनेक्शन पर एक तरह से रोक लगा दी गई थी, जिसे 'मोरेटोरियम' कहते हैं। पिछले साल, देश के डेटा सेंटर्स ने कुल मिलाकर 7,663 GWh (गीगावाट-घंटे) बिजली चट कर ली।
ये तो सिर्फ डेटा सेंटर्स का आंकड़ा है, बाकी पूरे आयरलैंड की बिजली डिमांड इसी दौरान सिर्फ 2% बढ़ी है। अब आप खुद सोचिए, एक तरफ 10% की ग्रोथ और दूसरी तरफ सिर्फ 2%, ये असमानता बताती है कि मामला कितना गंभीर है।
मोरेटोरियम क्यों लगाया गया था और क्या हुआ?
2021 में आयरलैंड की कमीशन फॉर रेगुलेशन ऑफ यूटिलिटीज (CRU) ने एक बड़ा कदम उठाया था। उन्होंने देश के नेशनल ग्रिड ऑपरेटर, EirGrid, को ग्रेटर डबलिन एरिया में डेटा सेंटर्स के लिए नए पावर एप्लीकेशन्स को प्रोसेस करना बंद करने को कहा था।
इसका मतलब था कि डबलिन और उसके आसपास के इलाकों में अब कोई भी नया डेटा सेंटर सीधे नेशनल ग्रिड से बिजली नहीं ले पाएगा। इस नियम के बाद बनाए गए नए डेटा सेंटर्स को अपनी बिजली खुद पैदा करनी थी, या फिर उन्हें ऐसे इलाकों में अपनी यूनिट लगानी थी जहां ये पाबंदी लागू नहीं थी।
मकसद साफ था - बिजली ग्रिड पर बढ़ते बोझ को कम करना और डेटा सेंटर्स की बेतहाशा ग्रोथ पर लगाम लगाना।
लेकिन, जैसा कि आंकड़े बता रहे हैं, इस मोरेटोरियम का असर उतना नहीं हुआ जितना सोचा गया था। 2021 के बाद भी डेटा सेंटर्स की खपत लगातार बढ़ती रही।
आखिर क्यों ऐसा हुआ? क्या टेक कंपनियां कोई नया रास्ता निकाल रही थीं, या फिर डिजिटल डिमांड इतनी बढ़ गई थी कि उसे संभालना मुश्किल हो गया था? ये सारे सवाल आज भी आयरलैंड के ऊर्जा सेक्टर के सामने खड़े हैं।
अब क्या नई पॉलिसी लाई गई है?
जब पुरानी रणनीति काम नहीं आई, तो CRU ने एक नई पॉलिसी पेश की, जिसका नाम है 'लार्ज एनर्जी यूजर्स (LEU) कनेक्शन पॉलिसी'। इस नई पॉलिसी ने पुराने मोरेटोरियम की जगह ले ली है।
इसके तहत, नए डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स पर कुछ खास नियम और शर्तें लगाई गई हैं, ताकि नेशनल ग्रिड पर दबाव कम किया जा सके और साथ ही, ऊर्जा के नए स्रोत भी पैदा किए जा सकें।
इन नियमों के मुताबिक, जो डेटा सेंटर्स 10 MVA (मेगावोल्ट एम्पीयर) से ज़्यादा बिजली खपत करते हैं, उन्हें अब अपनी 100% डिमांड को पूरा करने के लिए साइट पर ही फ्लेक्सिबल पावर जनरेशन सिस्टम लगाना होगा। आसान शब्दों में कहें तो, उन्हें अपनी बिजली खुद ही पैदा करनी होगी, और ऐसी व्यवस्था करनी होगी जो जरूरत के हिसाब से बिजली उत्पादन को घटा-बढ़ा सके।
इतना ही नहीं, एक और सख्त शर्त जोड़ी गई है। इन बड़े डेटा सेंटर्स को अपनी सालाना बिजली का कम से कम 80% हिस्सा नए, बिना सब्सिडी वाले रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स से लेना होगा।
यानी, उन्हें सिर्फ अपनी बिजली पैदा नहीं करनी, बल्कि ये भी सुनिश्चित करना होगा कि उनकी ज़्यादातर बिजली साफ-सुथरी और पर्यावरण-अनुकूल स्रोतों से आ रही हो। ये एक बड़ा कदम है, जो न सिर्फ बिजली की डिमांड को मैनेज करने में मदद करेगा, बल्कि आयरलैंड के क्लीन एनर्जी लक्ष्यों को हासिल करने में भी अहम रोल निभाएगा।
कुल मिलाकर, आयरलैंड एक बड़े एनर्जी चैलेंज का सामना कर रहा है। एक तरफ डिजिटल युग की बढ़ती जरूरतें हैं, जो डेटा सेंटर्स के जरिए पूरी होती हैं, तो दूसरी तरफ सीमित ऊर्जा संसाधन और पर्यावरण को बचाने की चुनौती।
देखना होगा कि ये नई नीतियां किस हद तक इस बैलेंस को बना पाती हैं। क्या आयरलैंड बाकी दुनिया के लिए एक मिसाल कायम कर पाएगा कि कैसे डिजिटल ग्रोथ को सस्टेनेबल तरीके से मैनेज किया जाए? यह समय ही बताएगा।
ये वीडियो भी देखें: आयरलैंड डेटा सेंटर पावर डिमांड से जूझ रहा है







































