दिल्ली: देश की आर्थिक सेहत का ब्यौरा देने वाले आंकड़े सामने आए हैं, और ये बता रहे हैं कि जून के महीने में हम जितना सामान विदेश से लाए, उससे कम ही भेज पाए। सीधे शब्दों में कहें तो हमारा व्यापार घाटा एक बार फिर बढ़ गया है और इस बार इसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं! सोचिए, एक महीने में करीब 30.43 अरब डॉलर का घाटा, ये आंकड़ा अपने आप में ही कई सवाल खड़े कर रहा है। सरकार की कोशिशों के बावजूद, आयात का मीटर जिस रफ्तार से भागा है, उसने निर्यात की रफ्तार को पीछे छोड़ दिया है। तो आखिर ये पूरा माजरा क्या है और क्यों ये आंकड़े हमारे लिए अहम हैं?
आंकड़ों की बात करें तो, जून 2026 में देश का कुल व्यापार घाटा यानी ट्रेड डेफिसिट 30.43 अरब डॉलर तक पहुंच गया। ये पिछले कई महीनों के मुकाबले काफी ज्यादा है।
इसका सीधा मतलब है कि हमने जून में 30 अरब डॉलर से ज्यादा का सामान बाहर से खरीदा, जबकि उतना सामान हम बेच नहीं पाए। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप महीने के आखिर में अपनी कमाई से ज्यादा खर्च कर दें!
ये ट्रेड डेफिसिट आखिर बला क्या है?
जो लोग अर्थव्यवस्था की पेचीदगियों में नहीं घुसना चाहते, उनके लिए इसे समझना बड़ा आसान है। मोटा-मोटी समझ लीजिए कि जब कोई देश विदेश से ज्यादा सामान खरीदता है (आयात), और उससे कम सामान दूसरे देशों को बेचता है (निर्यात), तो इस अंतर को ही व्यापार घाटा या ट्रेड डेफिसिट कहते हैं।
अगर इसका उलटा हो, यानी निर्यात ज्यादा और आयात कम हो, तो उसे व्यापार अधिशेष या ट्रेड सरप्लस कहते हैं। ये एक तरह से किसी भी देश के लिए बैलेंस शीट जैसा होता है, जो बताता है कि वो दुनिया के साथ कितना खरीद-फरोख्त कर रहा है।
अब जरा जून के आंकड़ों को ध्यान से देखते हैं। वाणिज्य मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जून महीने में हमारा निर्यात 15.5 प्रतिशत की बढ़िया बढ़ोतरी के साथ 40.41 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
ये सुनने में तो अच्छा लगता है कि हमने निर्यात बढ़ाया, लेकिन असली कहानी आयात के आंकड़ों में छिपी है।
आयात ने बढ़ाई टेंशन, क्यों हुई इतनी खरीद?
दरअसल, जून में देश का आयात लगभग 31 प्रतिशत की जबरदस्त छलांग के साथ 70.84 अरब डॉलर पर पहुंच गया। आप खुद ही देखिए, निर्यात जहां 15.5 प्रतिशत बढ़ा, वहीं आयात सीधे डबल से ज्यादा की रफ्तार से 31 प्रतिशत बढ़ गया।
यही वो अंतर है, जिसने हमारे व्यापार घाटे को इतना ऊंचा पहुंचा दिया है। सवाल उठता है कि ऐसा क्या हो गया कि हमें इतना सामान बाहर से मंगाना पड़ा?
सिर्फ एक महीने के आंकड़े ही नहीं, अगर पूरे वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून 2026 तक के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर और साफ हो जाती है। इस तिमाही में भारत का कुल निर्यात 15.92 प्रतिशत बढ़कर 129.32 अरब डॉलर रहा।
वहीं, आयात में 19.89 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और ये 216.18 अरब डॉलर तक पहुंच गया। साफ दिख रहा है कि आयात की रफ्तार, निर्यात की रफ्तार से कहीं ज्यादा तेज है।
सोने की चमक ने भी बढ़ाई चिंता?
एक और आंकड़ा जो इस कहानी में अहम रोल निभा रहा है, वो है सोने का आयात। चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही के दौरान देश में सोने का आयात बढ़कर 11.01 अरब डॉलर हो गया।
पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 7.49 अरब डॉलर था। यानी, हमने पिछले साल के मुकाबले इस साल पहली तिमाही में करीब 3.5 अरब डॉलर ज्यादा का सोना विदेश से खरीदा है।
सोने को अक्सर बुरे वक्त का साथी माना जाता है, लेकिन इसका इतना ज्यादा आयात होना, कहीं न कहीं हमारी विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव डालता है।
इस पूरे मामले पर वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने भी अपनी बात रखी है। उन्होंने बताया कि जून में पश्चिम एशियाई देशों को भारत का निर्यात 7.29 प्रतिशत बढ़कर 5 अरब डॉलर हो गया है।
ये एक अच्छी खबर है कि कुछ खास बाजारों में हमारी पैठ बढ़ रही है। लेकिन कुल आयात बढ़ने के पीछे कुछ और बड़े कारण हैं, जिन पर ध्यान देना जरूरी है।
आखिर किन चीजों ने बढ़ाया देश का आयात बिल?
राजेश अग्रवाल के मुताबिक, देश का कुल आयात बढ़ने के पीछे कई चीजें जिम्मेदार हैं। इनमें सबसे ऊपर कच्चे तेल का नाम आता है।
आप जानते ही हैं कि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक कच्चे तेल के आयात पर निर्भर हैं। जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं या हम ज्यादा तेल खरीदते हैं, तो हमारा आयात बिल भी बढ़ जाता है।
कच्चे तेल के अलावा, इलेक्ट्रॉनिक्स सामान, मशीनरी और कीमती धातुएं भी आयात बढ़ने की बड़ी वजहों में से हैं। आजकल हर घर में स्मार्टफोन्स, लैपटॉप्स और बाकी गैजेट्स की डिमांड तेजी से बढ़ रही है।
इन सब चीजों के लिए हमें कई कंपोनेंट्स या पूरे-पूरे प्रोडक्ट्स ही विदेश से मंगवाने पड़ते हैं। इसी तरह, औद्योगिक विकास के लिए हमें मशीनरी की जरूरत होती है, और कीमती धातुओं का भी अपना बाजार है।
जब इन सब चीजों की डिमांड बढ़ती है और हम इन्हें अपने देश में पर्याप्त मात्रा में नहीं बना पाते, तो आयात करना हमारी मजबूरी बन जाती है।
कुल मिलाकर, जून और पहली तिमाही के ये आंकड़े सरकार के लिए एक चैलेंज पेश कर रहे हैं। निर्यात बढ़ाने की कोशिशों के साथ-साथ, हमें आयात को नियंत्रित करने और देश में ही उन चीजों का उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर देना होगा, जिनकी डिमांड ज्यादा है।
तभी हम इस बढ़ते व्यापार घाटे को कम कर पाएंगे और अपनी अर्थव्यवस्था को और मजबूत बना पाएंगे।





































