बेंगलुरु: क्या आपने कभी सोचा है कि एक चमकती-दमकती नौकरी, मोटा सालाना पैकेज और बड़े शहर की सारी सुख-सुविधाएं पाकर भी कोई इंसान खालीपन महसूस कर सकता है? और क्या ये भी सोचा है कि यही इंसान, जब इन सब को छोड़कर एक बिल्कुल अलग राह पर चले, तो उसे असली सुकून मिल जाए? जी हां, ऐसी ही एक दिलचस्प कहानी है IIT कानपुर से पढ़े आर्जव मोदी की, जो बेंगलुरु की भागमभाग भरी ज़िंदगी और 40 लाख के सालाना पैकेज को बाय-बाय बोलकर अब पहाड़ों की वादियों में अपना घर बसा चुके हैं। उनकी लिंक्डइन पोस्ट आजकल सोशल मीडिया पर ख़ूब चर्चा बटोर रही है, क्योंकि इसमें उन्होंने 'आज के प्रोफेशनल' की दो अलग-अलग तस्वीरों को सामने रखा है।
आखिर क्यों 40 लाख का पैकेज छोड़ दिया?
आर्जव मोदी, जो खुद बेंगलुरु में एक मार्केटिंग प्रोफेशनल रह चुके हैं, ने अपनी पोस्ट में 27 साल के दो काल्पनिक प्रोफेशनल्स की तुलना की है। पहला प्रोफेशनल बेंगलुरु में रहता है, साल में करीब 40 लाख रुपये कमाता है।
आने-जाने के लिए उबर करता है और किराने का सामान क्विक-कॉमर्स ऐप्स से मंगवाता है। सुनने में ये एक 'सफल' ज़िंदगी लगती है, है ना? लेकिन आर्जव बताते हैं कि इस आर्थिक सफलता के बावजूद, यह व्यक्ति लगातार एक अजीब-सी बेचैनी में जी रहा होता है।
ज़रा सोचिए, जब आप अपने आसपास 21-22 साल के ऐसे युवाओं को देखते हैं, जो आपसे ज़्यादा पैसे कमा रहे हैं, जिन्होंने कम उम्र में ही अपनी स्टार्टअप कंपनी शुरू कर दी है या फिर किसी बड़ी पोजीशन पर पहुंच गए हैं। ऐसे में अक्सर तुलना का कीड़ा मन में कुलबुलाने लगता है।
आर्जव के शब्दों में, "आप अपने आस-पास बहुत कम उम्र के लोगों को देखते हैं। आपको लगता है कि आपके ज़िंदगी के सबसे अच्छे साल बीत चुके हैं।
आप 21 साल के युवाओं की तुलना में ज़िंदगी में खुद को पीछे महसूस करते हैं। आप अकेलापन और उदासी महसूस करते हैं।
" ये एक आम शहरी समस्या है, जहाँ हर कोई रेस में आगे निकलने की होड़ में लगा रहता है और अपनी उपलब्धियों को छोटा समझने लगता है।
पहाड़ों में कैसी है ज़िंदगी की दूसरी तस्वीर?
इसके उलट, आर्जव ने एक दूसरी तस्वीर पेश की। ये तस्वीर है उसी 27 साल के प्रोफेशनल की, जो अब एक छोटे से पहाड़ी शहर में रह रहा है।
यहाँ उसकी कमाई आधी से भी कम है, वो एक साधारण घर में रहता है, आने-जाने के लिए स्कूटर या पैदल चलता है। लेकिन यहाँ कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट आता है।
आर्जव बताते हैं कि यह व्यक्ति अपने पार्टनर के साथ शाम को सूर्यास्त देखते हुए सब्ज़ियां खरीदता है। ये फर्क सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक भी है।
इस माहौल में, आर्जव के मुताबिक, "आप अपने आस-पास 30 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों को देखते हैं। वे जिंदगी में बहुत अच्छा कर रहे हैं।
वे खुश और उत्साहित हैं। वे आपको अपनापन और सहज महसूस कराते हैं।
" नतीजतन, ये एहसास पूरी तरह बदल जाता है। शहर की दौड़ में खुद को पीछे समझने वाला इंसान अब महसूस करता है, "आपको लगता है कि ज़िंदगी के सबसे अच्छे साल असल में आपके सामने हैं।
" सोचिए, ये कितना बड़ा बदलाव है! एक जगह उदासी और अकेलापन, दूसरी जगह उम्मीद और ख़ुशी।
तो क्या हमें सबको पहाड़ों पर चले जाना चाहिए?
आर्जव ने साफ़ किया कि ये बातें उनके अपने अनुभवों पर आधारित हैं। पिछले चार महीनों से वह एक छोटे से पहाड़ी शहर में रह रहे हैं और अब इसे अपना घर कहने लगे हैं।
उनकी पोस्ट वायरल हुई तो कई लोगों ने समझा कि वह प्रोफेशनल्स को शहर छोड़कर पहाड़ों पर बसने के लिए कह रहे हैं। लेकिन आर्जव ने इस ग़लतफ़हमी को दूर किया।
उन्होंने कहा, "इस पोस्ट का मकसद यह कहना नहीं है कि पहाड़ों पर चले जाओ।" उनका पॉइंट कुछ और ही था।
आर्जव की असल सीख नज़रिए और बेमतलब की तुलनाओं से बचने के बारे में थी। उन्होंने कहा, "जब भी आप खुद को कमतर समझने या आत्मविश्वास खोने के चक्कर में पड़ें — तो उन लोगों के बारे में सोचें जिन्होंने आपके 5-10-15 साल बाद जबरदस्त काम किए हैं।
" ये बात बहुत गहरी है। अक्सर हम उन लोगों से अपनी तुलना करते हैं, जो हमसे कम उम्र में या कम समय में बहुत आगे निकल गए होते हैं।
ऐसे में हम अपनी यात्रा को भूलकर बस दूसरों की मंजिल देखते रहते हैं, और इसका नतीजा होता है निराशा।
मीडिया की भूमिका पर क्या कहा आर्जव ने?
आर्जव ने मीडिया और समाज पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि मीडिया अक्सर बहुत कम उम्र में मिली कामयाबी की कहानियों को तो खूब बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है, जैसे कोई 22 साल का लड़का करोड़ों की कंपनी बना दे या कोई स्टार्टअप रातोंरात पॉपुलर हो जाए।
लेकिन इस चकाचौंध में जिंदगी की दूसरी तरह की खुशियों और संतुष्टि को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। हर किसी की राह अलग होती है और हर किसी को अपनी खुशी अपनी शर्तों पर ढूंढनी चाहिए, न कि दूसरों की सफलता के पैमाने पर खुद को तोलना चाहिए।
आर्जव मोदी की ये कहानी हमें सिखाती है कि असली ख़ुशी शायद पैसे और दिखावे में नहीं, बल्कि सुकून और सही नज़रिए में छिपी होती है।






































