दिल्ली: भैया, जब से मानसून आता है ना, मन खुश हो जाता है। गर्मी से राहत, चारों तरफ हरियाली, और वो ठंडी-ठंडी फुहारें... आहा! लेकिन इस सुहाने मौसम के साथ एक चोर भी आता है, एक ऐसा चोर जो चुपचाप हमारे पैरों पर वार कर सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जिनकी जिंदगी में 'शुगर' यानी डायबिटीज की मिठास कम और चिंता ज्यादा होती है। कहने को तो बारिश का पानी बड़ा साफ लगता है, सड़क पर जमा पानी देखकर लगता है कि क्या ही बिगड़ेगा, लेकिन इसी पानी में न जाने कितने बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और सीवर की गंदगी छिपी होती है। और यही पानी डायबिटीज मरीजों के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।
मामला बड़ा सीधा है: सामान्य लोगों की तुलना में डायबिटीज के मरीजों को पैरों में संक्रमण होने का खतरा कई गुना ज्यादा होता है। उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी कमजोर हो सकती है, और तो और, कई लोगों के पैरों की नसें भी इतनी संवेदनशील नहीं रहतीं, कि उन्हें छोटी-मोटी चोट का तुरंत पता चल सके।
ऐसे में अगर इन छिपे हुए जीवाणुओं से भरा पानी पैरों के संपर्क में आ जाए और कहीं कोई छोटी-सी खरोंच या घाव हो, तो भैया, खेल बिगड़ सकता है। ये छोटी-सी लापरवाही आगे चलकर बहुत बड़ी आफत बन सकती है।
बारिश का पानी: क्यों है डबल खतरा?
अब आप सोचेंगे कि पानी तो पानी है, उसमें क्या खास? लेकिन ये 'खास' ही तो मुसीबत की जड़ है। बारिश के दौरान सड़कों पर जो पानी जमा होता है, वो सिर्फ पानी नहीं होता।
उसमें बैक्टीरिया, वायरस, फंगस, और कई बार तो सीवर का गंदा पानी भी मिला होता है। कल्पना कीजिए कि आपके पैरों में कोई छोटा सा कट है या स्किन थोड़ी-सी छिल गई है और आप इस पानी में चल दिए।
ये सारे हानिकारक सूक्ष्मजीव (माइक्रोब्स) उस छोटे से रास्ते से सीधे आपके शरीर में घुस सकते हैं। और एक बार अंदर गए तो फिर संक्रमण फैलने में देर नहीं लगती।
डायबिटीज के मरीजों में ये खतरा इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि उनका शरीर इन हमलावर जीवाणुओं से लड़ने में उतना सक्षम नहीं होता। ऊपर से, डायबिटीज के चलते खून का दौरा भी धीमा हो जाता है, जिससे घाव भरने की प्रक्रिया और सुस्त पड़ जाती है।
यानी, एक तो हमलावर जल्दी घुसते हैं, ऊपर से शरीर उन्हें जल्दी बाहर निकाल भी नहीं पाता। ये ठीक वैसा ही है जैसे दुश्मन आपके घर में घुस जाए और आप उसे निकालने में देर लगा दें।
डायबिटीज में जल्दी संक्रमण क्यों?
यहां दो बड़ी वजहें काम करती हैं। पहली है 'न्यूरोपैथी'।
भैया, डायबिटीज के बहुत से मरीजों के पैरों की नसें अपनी संवेदनशीलता खो देती हैं। यानी, उन्हें गर्मी, सर्दी, दर्द या हल्की चोट का एहसास ही नहीं होता।
सोचिए, आपके पैर में कोई कांटा चुभ गया, कोई नुकीली चीज लग गई या जूता काटने लगा, और आपको पता ही न चला। ये तो आग से खेलने जैसा है।
जब तक आपको पता चलता है, तब तक छोटी-सी चोट एक बड़े घाव में बदल चुकी होती है।
दूसरी बड़ी वजह है खराब रक्त संचार (ब्लड सर्कुलेशन)। डायबिटीज में खून की नलियां सिकुड़ जाती हैं या उनमें ब्लॉकेज आ जाता है, जिससे पैरों तक खून और ऑक्सीजन ठीक से नहीं पहुंच पाता।
खून ही तो हमारे शरीर का सिपाही है, जो घावों को भरने और संक्रमण से लड़ने में मदद करता है। जब सिपाही ही कमजोर हो या वहां तक पहुंच न पाए, तो घाव भला जल्दी कैसे भरेगा? नतीजा यह होता है कि एक मामूली खरोंच या छाला भी गंभीर संक्रमण का रूप ले लेता है, जिसे 'डायबिटिक फुट अल्सर' कहते हैं।
और ये अल्सर कई बार इतने खतरनाक हो जाते हैं कि डॉक्टर को पैर का कुछ हिस्सा या पूरा पैर ही काटना पड़ सकता है (अंग-विच्छेदन) ताकि संक्रमण शरीर के बाकी हिस्सों में न फैले।
गीले पैर और घर में नंगे पैर: डबल रिस्क!
एक और गलती जो हम अक्सर करते हैं, वो है लंबे समय तक गीले जूते या मोजे पहने रहना। जब पैर ज्यादा देर तक गीले रहते हैं, तो उनकी त्वचा एकदम नरम पड़ जाती है, गलने लगती है।
ऐसे में दरारें पड़ने, छाले होने और घाव बनने की संभावना बढ़ जाती है। खासकर उंगलियों के बीच में नमी जमा होने से फंगल इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है, जो खुजली और जलन पैदा कर सकता है।
इसलिए भैया, बारिश में भीगने के बाद या कहीं से भीग कर घर आने पर सबसे पहला काम होना चाहिए पैरों को सुखाना।
और सिर्फ बाहर ही नहीं, घर के अंदर भी सावधानी बरतनी जरूरी है। बहुत से लोग घर में नंगे पैर घूमते हैं, जो सामान्य लोगों के लिए शायद ठीक हो, लेकिन डायबिटीज मरीजों के लिए ये आदत जोखिम भरी हो सकती है।
फर्श पर कोई नुकीली चीज पड़ी हो, फर्नीचर से पैर टकरा जाए, या कोई और छोटी-मोटी चोट लग जाए, तो न्यूरोपैथी के कारण उन्हें तुरंत एहसास नहीं होता। जब तक वो देखते हैं, तब तक नुकसान हो चुका होता है।
तो घर में भी चप्पल या हल्के जूते पहनना समझदारी है।
बरसात में पैरों की देखभाल का पक्का इंतजाम
तो भैया, अब बात आती है कि करें क्या? घबराने की जरूरत नहीं है, बस थोड़ी-सी समझदारी और कुछ आसान स्टेप्स आपको इस मौसम में सुरक्षित रख सकते हैं।
- पैर धोएं और सुखाएं: जैसे ही आप बारिश में भीगकर या बाहर से घर आएं, सबसे पहले अपने पैरों को गुनगुने पानी और हल्के साबुन से अच्छी तरह धोएं। पैरों की उंगलियों के बीच की जगह को खास तौर पर साफ करें। फिर एक मुलायम तौलिए से पैरों को पूरी तरह सुखा लें, खासकर उंगलियों के बीच में। नमी बिल्कुल नहीं रहनी चाहिए।
- सही फुटवियर चुनें: मानसून में हमेशा बंद और आरामदायक जूते पहनें। लेदर या कपड़े के जूते नमी सोख सकते हैं, इसलिए प्लास्टिक या रबर (वॉटरप्रूफ) के जूते ज्यादा अच्छे रहते हैं। सुनिश्चित करें कि जूते ढीले न हों और न ही इतने कसे हुए कि पैरों पर दबाव डालें। नए जूते पहनने से पहले उन्हें थोड़ा पहनकर देख लें कि वे कहीं काट तो नहीं रहे। सैंडल या चप्पल पहनने से बचें क्योंकि वे पैरों को खुला छोड़ते हैं और चोट लगने या गंदगी के संपर्क में आने का खतरा बढ़ा देते हैं।
- मोजे का कमाल: साफ, सूखे सूती मोजे पहनें। सूती मोजे पसीने को सोख लेते हैं और पैरों को सूखा रखते हैं। सिंथेटिक मोजे नमी को रोक सकते हैं, इसलिए उनसे बचें। दिन में एक बार मोजे जरूर बदलें, खासकर अगर वे गीले हो गए हों।
- नियमित जांच: हर रात सोने से पहले अपने पैरों को ध्यान से देखें। कोई कट, खरोंच, छाला, लाली, सूजन या नाखूनों में बदलाव तो नहीं है? अगर खुद नहीं देख पा रहे तो परिवार के किसी सदस्य की मदद लें। पैरों के निचले हिस्से को देखने के लिए आईने का इस्तेमाल कर सकते हैं।
- त्वचा की नमी: अगर पैरों की त्वचा सूखी या फटी हुई लगे तो डॉक्टर की सलाह से कोई मॉइस्चराइजर लगाएं। लेकिन उंगलियों के बीच में मॉइस्चराइजर न लगाएं क्योंकि इससे नमी जमा हो सकती है।
- नाखूनों का ध्यान: नाखूनों को सीधा काटें और बहुत छोटा न करें। किनारे गोल करने से बचें क्योंकि इससे इनग्रोन टोनेल (नाखून का त्वचा में घुसना) हो सकता है।
- डॉक्टर से सलाह: अगर आपको पैरों में कोई भी बदलाव दिखे – जैसे कोई घाव जो ठीक न हो रहा हो, लाली, सूजन, दर्द या बदबू – तो बिना देर किए डॉक्टर से मिलें। भैया, डायबिटीज में पैर बहुत कीमती होते हैं, उनकी थोड़ी-सी भी लापरवाही भारी पड़ सकती है।
याद रखिए, मानसून का मजा लेना है तो पैरों का ख्याल रखना भी सीखिए। आपकी थोड़ी-सी सावधानी आपको बड़ी मुसीबत से बचा सकती है।
स्वस्थ रहिए, सुरक्षित रहिए!





































