नई दिल्ली: ज़रा सोचिए, आपकी आवाज़, जो आपकी पहचान है, उसे कोई चंद मिनटों में कॉपी कर ले और फिर उसका इस्तेमाल गलत तरीके से करने लगे? सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं, है ना? लेकिन ये कोई दूर की कौड़ी नहीं, आज की कड़वी सच्चाई है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में अब ये सब मुमकिन हो चुका है. और इसी खतरे को भांपते हुए दुनिया की जानी-मानी सिंगर टेलर स्विफ्ट अपनी आवाज बचाने के लिए मैदान में उतर आई हैं. उन्होंने कुछ खास फ्रेजेस को ट्रेडमार्क करवा लिया है, ताकि कोई उनकी आवाज़ का गलत इस्तेमाल न कर पाए. अब ऐसे में सवाल ये है कि जब टेलर स्विफ्ट जैसी सेलेब्रिटी को भी अपनी आवाज की सुरक्षा की चिंता सता रही है, तो हम जैसे आम लोगों का क्या होगा? हमारी आवाज़ पर हमारा कितना हक है, और कौन इसे बचाएगा?
साल की शुरुआत में ही टेलर स्विफ्ट ने कुछ ट्रेडमार्क एप्लीकेशंस फाइल की थीं. ये एप्लीकेशंस 'हे, इट्स टेलर' और 'हे, इट्स टेलर स्विफ्ट' जैसे फ्रेजेस के लिए थीं.
दरअसल, ये वो रिकॉर्डिंग्स हैं, जो उनकी आवाज़ और उनके पर्सनल ब्रांड से सीधे तौर पर जुड़ी हैं. उनकी मंशा साफ है – अपनी पहचान और अपनी आवाज़ को AI के गलत इस्तेमाल से बचाना.
इसी दौरान हॉलीवुड के मशहूर एक्टर मैथ्यू मैकोनहे भी अपनी कुछ खास कैचफ्रेजेस को ट्रेडमार्क प्रोटेक्शन दिलवाने में लगे थे. ये मामले AI के इस नए दौर में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करते हैं कि आखिर किसी व्यक्ति को अपनी आवाज़ पर कितने अधिकार हैं? क्या हमारी आवाज़ हमारी संपत्ति है, जिसे कोई AI चुरा नहीं सकता?
क्या ये सिर्फ सेलेब्रिटीज़ का ही मामला है?
बहुत से लोगों को लगता है कि AI की बात आती है, तो इमेज और वीडियो जनरेशन ही बड़ा चैलेंज है. लेकिन, AI वॉयस क्लोनिंग टूल्स अब किसी भी इंसान की आवाज़ को सिर्फ कुछ ही मिनट के ऑडियो से हूबहू बना सकते हैं.
ElevenLabs और Suno जैसे प्लेटफॉर्म्स ने तो सिंथेटिक वॉयस और AI-जनरेटेड ऑडियो को हर किसी के लिए और भी आसान बना दिया है. इसका मतलब है कि अब आप सोचिए, कोई आपकी आवाज़ का इस्तेमाल करके कुछ भी बोलवा दे, और वो भी बिना आपकी परमिशन के!
सेलेब्रिटीज़ के लिए तो दांव बहुत ऊंचे हैं, ये बात बिल्कुल साफ है. एक खास और पहचानने योग्य आवाज़ उनके पर्सनल ब्रांड का एक बेहद कीमती हिस्सा होती है.
इसी आवाज़ से वो करोड़ों कमाते हैं, विज्ञापन करते हैं और फैंस से जुड़ते हैं. अगर उनकी आवाज़ को कोई AI कॉपी करके गलत तरीके से इस्तेमाल करे, तो उनका करियर और उनकी पहचान, दोनों खतरे में पड़ सकती हैं.
आम आदमी के लिए कितना खतरा है?
लेकिन ऐसा नहीं है कि ये टेक्नोलॉजी सिर्फ पब्लिक फिगर्स को ही प्रभावित करती है. अब कोई भी ऐसा इंसान जिसकी ऑडियो रिकॉर्डिंग ऑनलाइन मौजूद है, उसकी आवाज़ को कॉपी, क्लोन या नकल किया जा सकता है.
हो सकता है आपने किसी पॉडकास्ट में अपनी आवाज़ दी हो, या सोशल मीडिया पर कोई वॉइस नोट शेयर किया हो, या फिर किसी वीडियो में आपकी आवाज़ हो – ये सब AI के लिए डेटा बन सकता है.
यहां असली प्रॉब्लम वो है, जिसकी चर्चा हम AI से जुड़ी अपनी हर खबर में करते आए हैं. वो ये कि टेक्नोलॉजी इतनी तेज़ी से भाग रही है और कानून अभी भी उसकी धूल फांक रहा है.
कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, प्राइवेसी और पब्लिसिटी राइट्स से जुड़े जो मौजूदा कानून हैं, वो ज़्यादातर तब बनाए गए थे जब AI-जेनरेटेड आवाज़ें बड़े पैमाने पर मुमकिन ही नहीं थीं.
क्या कानून AI को रोक पाएगा?
नतीजा ये है कि आज के दौर में AI से जुड़े ज़्यादातर बड़े सवालों के सीधे और साफ जवाब नहीं मिलते. इतना ही नहीं, नियम-कानून भी इस बात पर बहुत हद तक निर्भर करते हैं कि आप दुनिया के किस हिस्से में रहते हैं.
एक देश में जो कानून लागू होगा, वो दूसरे में नहीं. इससे कानूनी पेंच और भी उलझ जाता है.
तो फिर, अभी हम कहां खड़े हैं? अगर किसी आम इंसान की आवाज़ को क्लोन कर लिया जाए या बिना परमिशन के इस्तेमाल किया जाए, तो उसके पास क्या कानूनी प्रोटेक्शन है? और क्या हमारे कानून बनाने वाले अब इस नई दुनिया के हिसाब से खुद को ढालने की कोशिश कर रहे हैं, जहां आवाज़ को मिनटों में रेप्लिकेट किया जा सकता है?
इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमने टेक्नोलॉजी, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और AI कानून के एक्सपर्ट्स से बात की है. उनका कहना है कि ये मामला अभी ग्रे एरिया में है.
हालांकि कुछ देश और संगठन इस पर काम कर रहे हैं, लेकिन एक पुख्ता और ग्लोबल लीगल फ्रेमवर्क बनने में अभी वक्त लगेगा. तब तक सेलेब्रिटीज़ और आम लोगों, दोनों को अपनी आवाज़ और पहचान को लेकर सतर्क रहना होगा, क्योंकि AI की ताकत बढ़ती ही जा रही है और कानून अभी भी इससे एक कदम पीछे है.







































