तकनीकी डेस्क: वीडियो गेम की दुनिया में आजकल एक अजीब सी बहस छिड़ी हुई है. पहले तो लोग सिर्फ़ 'क्या खरीदें' और 'कौन सा गेम बेहतर है' पर लड़ते थे, लेकिन अब सवाल ये उठ रहा है कि जो खरीद लिया, क्या वो हमेशा अपना रहेगा? सोनी (Sony) ने हाल ही में ऐलान किया है कि 2028 से उसकी प्लेस्टेशन (PlayStation) गेम्स की फिजिकल डिस्क (Physical Disc) बनना बंद हो जाएंगी. ये खबर आते ही गेमर्स के बीच हड़कंप मच गया है, और तो और, गेमिंग इंडस्ट्री के कई पुराने खिलाड़ी भी इस फैसले से खासे नाराज दिख रहे हैं.
सोनी के इस 'ऑल-डिजिटल' भविष्य की घोषणा को लेकर ऑनलाइन हजारों लोग अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं. कई इंडी गेम डेवलपर्स (Indie Game Developers) भी इस फैसले के खिलाफ खड़े हो गए हैं, या कम से कम फिजिकल मीडिया के समर्थन में अपनी आवाज उठा रहे हैं.
लेकिन सबसे तीखी प्रतिक्रिया जिस शख्सियत से आई है, वो कोई और नहीं बल्कि ओरिजिनल एक्सबॉक्स (Xbox) की फाउंडिंग मेंबर लॉरा फ्रायर (Laura Fryer) हैं.
फ्रायर ने सोनी के इस कदम को गेम ओनरशिप (Game Ownership) के लिए एक बड़ा खतरा बताया है. उनका साफ कहना है कि ये फैसला गेमर्स से उनके खेलने के अधिकार को छीन लेगा.
लेकिन क्यों, आखिर क्या वजह है कि एक दिग्गज कंपनी के इस फैसले पर इतना हंगामा हो रहा है?
सोनी के डिजिटल प्लान पर इतना बवाल क्यों मचा है?
लॉरा फ्रायर, जिन्हें एक्सबॉक्स के शुरुआती दिनों की आर्किटेक्ट्स में से एक माना जाता है, ने सोनी के इस ऐलान की कड़ी निंदा की है. उन्होंने साफ-साफ कहा है कि फिजिकल डिस्क का अंत गेमर्स के लिए बेहद खतरनाक होगा, खासकर जब 2028 आएगा.
ये बात इसलिए भी ज्यादा गंभीर हो जाती है क्योंकि खबरें ये भी हैं कि माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) भी अपनी अगली एक्सबॉक्स कंसोल (Xbox Console) के साथ कुछ ऐसे ही कदम उठा सकता है.
फ्रायर ने अपनी बात को समझाते हुए कहा, "डिजिटल तब तक सुविधाजनक है जब तक कोई और ये तय न कर ले कि आपने काफी देख लिया या खेल लिया, और कुछ गेम्स और फिल्में ऐसी होती हैं जिनसे मैं कभी बोर नहीं हो सकती." उनका ये बयान काफी हद तक सही लगता है, खासकर यह देखते हुए कि सोनी ने हाल ही में अपने यूजर्स की लाइब्रेरी से 500 से ज्यादा खरीदी हुई फिल्में अचानक हटा दी थीं.
इससे पहले भी कई बार ऐसा देखा गया है कि डिजिटल कंटेंट को कंपनियों ने बिना किसी पूर्व सूचना के हटा दिया है, जिससे यूजर्स को भारी नुकसान उठाना पड़ा है.
क्या रॉकस्टार को जानबूझकर आगे किया गया?
अगर आपको याद हो, तो हाल ही में रॉकस्टार गेम्स (Rockstar Games) ने अपने मच-अवेटेड गेम जीटीए 6 (GTA 6) के प्री-ऑर्डर खोले थे. उस वक्त भी एक बड़ी खबर सामने आई थी कि जीटीए 6 की कोई फिजिकल कॉपी नहीं होगी, यानी गेम पूरी तरह से डिजिटल ही उपलब्ध होगा.
फ्रायर इस घटना को सोनी की बड़ी प्लानिंग का एक अहम हिस्सा मानती हैं.
वो कहती हैं कि सोनी ने चालाकी से रॉकस्टार को पहले आगे किया, ताकि सारी 'गर्मी' यानी लोगों का गुस्सा रॉकस्टार झेल ले. और अब, जब माहौल बन चुका है, तो सोनी खुद इस रास्ते पर पूरा उतर गया है ताकि डिजिटल-ओनली गेमिंग को नया 'नॉर्मल' बनाया जा सके.
ये रणनीति साफ तौर पर दिखाती है कि कैसे बड़ी कंपनियां धीरे-धीरे गेमर्स को फिजिकल मीडिया से दूर धकेल रही हैं.
गेम ओनरशिप का असली मतलब क्या है?
बहुत से गेमर्स के लिए फिजिकल डिस्क सिर्फ एक प्लास्टिक की गोल सीडी नहीं होती, बल्कि वो उनके कलेक्शन का हिस्सा होती है. इसे आप दोस्तों को खेलने के लिए दे सकते हैं, पुरानी दुकानों पर बेच सकते हैं या फिर जब मन करे तब बिना इंटरनेट के खेल सकते हैं.
डिजिटल गेम्स में ये आजादी नहीं मिलती. आप सिर्फ 'लाइसेंस' खरीदते हैं, गेम के असली मालिक नहीं होते.
इसका मतलब ये है कि कंपनी जब चाहे आपके गेम तक पहुंच को खत्म कर सकती है. न तो आप उसे बेच सकते हैं, न ही किसी को दे सकते हैं और अगर सर्वर बंद हो गए तो आप उसे फिर कभी नहीं खेल पाएंगे.
ये एक बड़ा चैलेंज है उन लोगों के लिए जो अपने गेम्स को एक संपत्ति की तरह देखते हैं.
एक्स-प्लेस्टेशन बॉस डॉन मैट्ट्रिक (Don Mattrick) का भी इस बारे में एक बड़ा बयान सामने आया था. उन्होंने सोनी के फिजिकल डिस्क उत्पादन बंद करने की योजना को 'काफी नाटकीय' बताया था और उस समय को याद किया था जब 'डिजिटल बिक्री शून्य प्रतिशत थी क्योंकि हमारे पास डिजिटल बाजार नहीं था.
' उनके अनुसार, बाजार में यह बदलाव कितना बड़ा है, ये सोचने वाली बात है.
आगे क्या होगा?
अब सवाल ये उठता है कि 2028 के बाद गेमिंग का भविष्य कैसा होगा? क्या सभी कंपनियां सोनी के नक्शे कदम पर चलकर फिजिकल डिस्क को अलविदा कह देंगी? अगर ऐसा होता है, तो गेमर्स के पास अपने पसंदीदा गेम्स को 'सच में ओन' करने का कोई तरीका नहीं बचेगा. यह उन लोगों के लिए खास तौर पर चिंता का विषय है जो अपनी पुरानी गेम लाइब्रेरी को सहेज कर रखना चाहते हैं, या जिनके पास हमेशा एक मजबूत इंटरनेट कनेक्शन नहीं रहता.
कुल मिलाकर, सोनी का ये फैसला गेमिंग इंडस्ट्री में एक बड़ी बहस छेड़ गया है. एक तरफ जहां कंपनियां 'सुविधा' और 'नए जमाने' की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ गेमर्स और इंडस्ट्री के दिग्गज अपने अधिकारों और गेम ओनरशिप को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.
आने वाले समय में देखना होगा कि इस डिजिटल 'क्रांति' का क्या अंजाम होता है और क्या गेमर्स अपने पसंदीदा गेम्स को हमेशा के लिए अपना कह पाएंगे या नहीं.



































