काठमांडू: नेपाल की राजनीति में एक ऐसा नाम है, बालेंद्र 'बालेन' शाह, जिन्हें कभी Gen Z का पोस्टर बॉय माना जाता था. ये वो चेहरा था जिसने पारंपरिक राजनीति के धुरंधरों को धूल चटाकर सत्ता की कुर्सी संभाली थी. लेकिन अब पासा पलट गया है. जिन नौजवानों ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाया, आज वही युवा सड़कों पर उतरकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं.
आप सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा क्या हो गया? जिस नेता को नेपाल के युवाओं ने अपनी उम्मीदों का सहारा बनाया था, आज वही उनकी आंखों का किरकिरा क्यों बन गया है? मामला कुछ पेचीदा है, और इसकी जड़ें हाल की कुछ घटनाओं में छिपी हैं, जिन्होंने पूरे नेपाल को झकझोर दिया है.
एक तरफ जहां आत्मदाह की एक दिल दहला देने वाली घटना ने लोगों को हिला दिया, वहीं दूसरी ओर बस्तियों को उजाड़ने और मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन के आरोपों ने भी आग में घी का काम किया है. इन सबने मिलकर युवा पीढ़ी में बालेन शाह सरकार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा भर दिया है.
आखिर क्यों भड़की है युवाओं की आग?
हाल ही में काठमांडू का सिंहदरबार सचिवालय, जो सरकार का गढ़ माना जाता है, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों के नारों से गूंज उठा. ये लोग कोई और नहीं, बल्कि वही युवा थे जिन्होंने बालेन शाह को वोट दिया था.
प्रदर्शनकारी सरकार के भूमिहीन प्रवासियों के खिलाफ चलाए जा रहे बेदखली अभियान की तीखी आलोचना कर रहे थे.
उनका आरोप था कि सरकार मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रही है और युवा कार्यकर्ताओं के साथ गलत बर्ताव किया जा रहा है. ये विरोध प्रदर्शन बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के लिए पहली सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आए हैं.
RSP ने प्रतिनिधि सभा में करीब दो-तिहाई बहुमत के साथ सरकार बनाई थी. अब सवाल ये है कि क्या ये सरकार अपने ही सबसे बड़े समर्थकों को संभाल पाएगी?
कहानी सिर्फ आज की नहीं है, बल्कि पिछले साल सितंबर में Gen-Z रिवोल्यूशन से शुरू हुई थी. तब भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पारंपरिक राजनीतिक दलों से बढ़ते मोहभंग ने युवाओं को सड़कों पर ला दिया था.
उसी आंदोलन की लहर पर सवार होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा था.
और इसी उथल-पुथल के बीच एक नया चेहरा उभरा – बालेंद्र शाह, जो तब तक काठमांडू के मेयर के तौर पर अपनी पहचान बना चुके थे. उनकी पार्टी RSP ने चुनाव जीता और 27 मार्च को बालेन शाह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.
उन्होंने 100 सूत्रीय एजेंडा पेश किया और दावा किया कि वह शासन, अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक संस्थानों में बड़े सुधार लाएंगे.
लेकिन अब सरकार के करीब 100 दिन पूरे होने के बाद, उनके ही युवा समर्थक बड़े पैमाने पर ये मानने लगे हैं कि जमीन पर कोई खास बदलाव नहीं दिख रहा. उनकी चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे उनका विश्वास डगमगा गया है.
'सुकुम्बासी' बस्तियां क्यों बनीं गुस्से की मुख्य वजह?
इस ताजा विरोध प्रदर्शन की सबसे बड़ी और सीधी वजह है काठमांडू में नदियों के किनारों से अनौपचारिक बस्तियों को हटाने का सरकारी अभियान. नेपाली कानून के मुताबिक, 'सुकुम्बासी' वे भूमिहीन लोग होते हैं जिनके पास देश में कहीं भी कोई जमीन नहीं है और वे संपत्ति हासिल करने में असमर्थ हैं.
ये लोग अक्सर नदियों के किनारे या शहर के बाहरी इलाकों में छोटी-छोटी बस्तियां बनाकर रहते हैं. ये उनका घर होता है, उनकी जिंदगी का ठिकाना होता है.
सरकार ने इन बस्तियों को हटाने का अभियान शुरू किया है, जिसके चलते हजारों परिवार बेघर होने के कगार पर खड़े हैं.
यहीं से मानवाधिकारों के उल्लंघन और मानवीय संकट की बातें उठने लगीं. विरोध करने वाले युवाओं का कहना है कि सरकार को इन लोगों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना उन्हें ऐसे ही बेघर नहीं करना चाहिए.
यह एक तरह से उन लोगों पर सीधा हमला है जो पहले से ही समाज के हाशिये पर हैं और जिनके पास अपना कहने को कुछ नहीं है.
क्या यही है वो 'नया नेपाल' जिसका सपना बालेन शाह ने दिखाया था? क्या बड़े-बड़े वादों के बीच आम आदमी की तकलीफें यूं ही दब जाएंगी? ये सवाल सिर्फ प्रदर्शनकारियों के नहीं हैं, बल्कि पूरे देश के युवाओं के मन में घूम रहे हैं, जिन्होंने उम्मीद से उन्हें वोट दिया था.
अब देखना ये होगा कि बालेन शाह सरकार इस मुश्किल चैलेंज से कैसे निपटती है. क्या वह अपने युवा समर्थकों की बात सुनेगी, उनकी चिंताओं पर गौर करेगी, या फिर ये विरोध प्रदर्शन आने वाले समय में एक बड़ी राजनीतिक हलचल का रूप लेंगे? फिलहाल, नेपाल की राजधानी काठमांडू में सियासी पारा चढ़ा हुआ है और Gen Z अपने प्रधानमंत्री से जवाब मांग रहा है.








































