दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यानी AI की बातें आजकल हर तरफ हैं। लगता है बस इसी के दम पर दुनिया आगे बढ़ेगी और सब कुछ आसान हो जाएगा। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे छुपी एक 'टेंशन' अब धीरे-धीरे सामने आ रही है। ये टेंशन है AI को चलाने में आने वाली लागत की, जो आईटी लीडर्स का सिरदर्द बनती जा रही है। एक ताजा रिसर्च ने तो इसके चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं, जो बताते हैं कि AI के साथ चलना इतना भी सस्ता नहीं, जितना हम सोचते हैं।
IDC का अनुमान है कि साल 2027 तक, दुनिया की टॉप 1000 कंपनियों (ग्लोबल 1000) में AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाला खर्च मौजूदा बजट से पूरे 30% ज़्यादा हो जाएगा। अब आप सोच रहे होंगे कि ये आंकड़ा इतना खास क्यों है? दरअसल, ये गैप सीधा-सीधा इस बात की तरफ इशारा करता है कि AI के पायलट प्रोजेक्ट्स और असल प्रोडक्शन के बीच ज़मीन-आसमान का फर्क है।
जिस हिसाब से कंपनियां शुरुआती प्लानिंग करती हैं, असल में AI का काम-काज उससे कहीं ज़्यादा खर्चीला साबित होता है।
आखिर क्यों बढ़ रहा है AI का खर्च, पायलट प्रोजेक्ट में क्या छिपा रहता है?
अक्सर कंपनियां किसी भी नए AI मॉडल को टेस्ट करने के लिए एक कंट्रोल माहौल में पायलट प्रोजेक्ट चलाती हैं। इसमें डेटासेट छोटा होता है, यूज़र्स भी चंद ही होते हैं और रिक्वेस्ट-रिस्पांस का तरीका वैसा ही होता है, जैसा किसी वेब एप्लीकेशन में होता है।
ऐसे में सब कुछ बहुत स्मूथ लगता है और बजट भी उसी हिसाब से बना लिया जाता है। लेकिन असल दुनिया, यानी प्रोडक्शन में, तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है।
जब यही AI सिस्टम असली काम में उतरता है, तब बिल उम्मीद से कहीं ज़्यादा बढ़ जाता है। और यहीं से आती है वो 30% की एक्स्ट्रा लागत, जो किसी ने सोची भी नहीं होती।
यह एक ऐसा पैटर्न है जो लगभग हर इंडस्ट्री में देखने को मिल रहा है, और यही चीज़ आईटी लीडर्स की नींद उड़ा रही है।
तो फिर असली खर्चा आता कहां है, मॉडल के साइज़ में या कुछ और?
बहुत से लोगों को लग सकता है कि AI का सारा खर्च मॉडल के साइज़ या उसे चलाने में इस्तेमाल होने वाले 'टोकन्स' पर आता होगा। ये बात कुछ हद तक सही भी है, लेकिन एक्सपर्ट्स की मानें तो असली पैसा वहां नहीं जाता।
श्रीनिवासन शेषाद्री, जो Aerospike के चीफ इनोवेशन ऑफिसर हैं, बताते हैं कि सारा खर्च 'डेटा लेयर' में छुपा है।
यानी, सिस्टम कितनी बार डेटा रीड कर रहा है, कितने अलग-अलग सर्विसेज से जुड़ रहा है और ये सारे ऑपरेशंस कितनी लगातार, बिना रुके चल रहे हैं, यहीं से सारा खेल बिगड़ता है। डेटा के इस लगातार मूवमेंट और मैनेजमेंट में ही सबसे ज़्यादा खर्च आता है, जिसकी हम अक्सर अनदेखी कर देते हैं।
एक यूज़र की रिक्वेस्ट, कैसे बन जाती है बड़ी 'डेटा पार्टी'?
आइए, एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए, आपने एक जेनरेटिव AI कस्टमर सपोर्ट एजेंट को काम पर लगाया है।
प्रोडक्शन में, जब एक यूज़र सिर्फ एक सवाल पूछता है, तो वो AI एजेंट फौरन एक साथ कई जगह डेटा खंगालना शुरू कर देता है। इसमें यूज़र की पिछली एक्टिविटी, CRM रिकॉर्ड्स, इन्वेंटरी सिस्टम, प्रोडक्ट से जुड़े मैनुअल्स और दूसरे कई सोर्स शामिल होते हैं।
और ये सब काम 100 मिलीसेकंड से भी कम समय में होना चाहिए ताकि यूज़र को तुरंत जवाब मिल सके। सोचिए, सबसे धीमी डेटा लुकअप भी पूरे प्रोसेस को धीमा कर सकती है।
तो एक छोटी सी यूज़र क्वेरी, पीछे से कितने बड़े 'डेटा-गेम' को जन्म देती है, जहां एक साथ कई छोटी-छोटी लुकअप्स चलती हैं।
'एजेंटिक वर्कफ्लो' कैसे बढ़ा रहा है लागत का बोझ?
अब इसमें 'एजेंटिक वर्कफ्लो' को भी जोड़ दीजिए। इसका मतलब है कि एक यूज़र की रिक्वेस्ट को AI पहले एक 'प्लान' में तोड़ता है, फिर उसे कई 'स्टेप्स' में बांटता है।
हर स्टेप अपनी अलग-अलग लुकअप करता है, बीच में कुछ डेटा लिखता है (जिसे इंटरमीडिएट स्टेट कहते हैं) और फिर उसे वापस रीड करता है।
जो बात एक सामान्य इन्फ्रेंस से शुरू होती है, वो देखते ही देखते दर्जनों या सैकड़ों डेटा एक्सेस में बदल जाती है। सिस्टम को इस पूरे प्रोसेस के दौरान यूज़र का सेशन और उसकी 'मेमोरी स्टेट' भी होल्ड करके रखनी पड़ती है।
ऐसे में जो खर्च प्रोफाइल बनता है, वो पायलट प्रोजेक्ट में लगाए गए अनुमान से बिल्कुल अलग होता है, और कई गुना ज़्यादा होता है।
कहां से आ रहा है ये 30% का एक्स्ट्रा खर्च?
दरअसल, ये अतिरिक्त 30% खर्च उन 'डिफेंसिव चॉइस' के कारण आता है, जो टीमें अनिश्चितता के माहौल में करती हैं। जब टीमों को यह साफ-साफ नहीं पता होता कि डेटा एक सिंगल रिक्वेस्ट के ज़रिए कैसे फ्लो करेगा, तो वे 'ओवर-प्रोविजनिंग' करते हैं।
यानी, अचानक बढ़ने वाले लोड या 'स्पाइक्स' को झेलने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा रिसोर्स लगा देते हैं।
इसी तरह, जब टीमें यह अनुमान नहीं लगा पातीं कि बदलते हुए कॉन्टेक्स्ट में 'कैश बिहेवियर' कैसा होगा, तो वे निर्भरता के रिस्क को कम करने के लिए डेटा को कई सिस्टम्स में डुप्लीकेट कर देती हैं। ये सभी 'सेफ्टी मेजर्स' आखिरकार लागत को बढ़ा देते हैं।
कुल मिलाकर, AI इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती लागतें आईटी लीडर्स के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई हैं, जिस पर उन्हें गंभीरता से विचार करना होगा।



































