नई दिल्ली: आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का क्रेज जबरदस्त है। हर जगह इसकी ही बातें हो रही हैं। कंपनियों में AI पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। बोर्डरूम में बड़े-बड़े सवाल उठ रहे हैं कि AI में इतना पैसा क्यों लगाया जा रहा है, और जवाब में आंकड़े पेश हो रहे हैं – इतने टोकन खर्च हुए, इतने प्रॉम्प्ट काउंट हुए, इतने कोपायलट डिप्लॉय कर दिए। सुनने में तो ये सब बहुत अच्छा लगता है, लगता है कि कंपनी कितनी तरक्की कर रही है। लेकिन जनाब, असली कहानी कुछ और है। ये आंकड़े दरअसल एक 'साइलेंट फेलियर मोड' की तरफ इशारा कर रहे हैं, एक ऐसी खामोश विफलता की ओर जो आपके AI प्रोग्राम को अंदर से खोखला कर सकती है।
आपको बता दें कि ज़्यादातर कंपनियों ने इन आंकड़ों पर इसलिए भरोसा कर लिया है क्योंकि इन्हें ट्रैक करना आसान है और ये रिपोर्ट्स में भी खूब चमकते हैं। लेकिन यहीं पर असली पेच फंस जाता है।
ये नंबर्स सिर्फ एक्टिविटी यानी गतिविधियों को मापते हैं, नतीजों को नहीं। ये बस इतना बताते हैं कि AI का कितना इस्तेमाल हो रहा है, ये नहीं कि इसे लागू करने के बाद कंपनी को बिज़नेस में वाकई कितना फायदा हुआ है।
क्या है यह 'टोकन मैक्सिंग' का पूरा चक्कर?
अब आप सोच रहे होंगे कि ये टोकन मैक्सिंग आखिर बला क्या है? सीधे शब्दों में कहें तो, यह एक ऐसा ट्रेंड है जहां संगठन उन लोगों को ज़्यादा इनाम देना शुरू कर देते हैं जो AI का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, बजाय इसके कि AI असल में क्या डिलिवर कर रहा है। यानी, अगर किसी ने खूब सारे प्रॉम्प्ट मारे, खूब सारे टोकन खर्च किए, तो उसे शाबाशी मिल गई।
लेकिन क्या उसके उन प्रॉम्प्ट्स से कंपनी का टर्नओवर बढ़ा, क्या कस्टमर सर्विस बेहतर हुई, क्या कोई नई एफिशिएंसी आई? इस पर कोई ध्यान नहीं देता। यह ठीक वैसे ही है जैसे आप किसी धावक को सिर्फ इसलिए इनाम दे दें क्योंकि उसने ट्रैक पर सबसे ज़्यादा चक्कर लगाए, भले ही वह फिनिश लाइन तक पहुंचा ही न हो या उसकी दौड़ से टीम को कोई फायदा न हुआ हो।
असल में, AI में भारी-भरकम इन्वेस्टमेंट हो रहा है। बजट आसमान छू रहे हैं।
लेकिन जब बोर्डरूम में सवाल होते हैं, तो जवाब में हमें टोकन कॉस्ट, प्रॉम्प्ट काउंट और कोपायलट डिप्लॉयमेंट जैसे आंकड़े मिलते हैं। ये सिर्फ 'एक्टिविटी लॉग्स' हैं, यानी क्या-क्या काम हुआ उसकी लिस्ट।
ये बिज़नेस मैट्रिक्स नहीं हैं। बिज़नेस मैट्रिक्स वो होते हैं जो बताते हैं कि कंपनी के बिज़नेस पर असल में क्या पॉजिटिव या नेगेटिव असर पड़ा।
सोचिए जरा, अगर आपका AI प्रोग्राम हर रोज़ लाखों प्रॉम्प्ट जनरेट कर रहा है और लाखों टोकन खर्च कर रहा है, तो क्या इसका मतलब यह है कि आपकी कंपनी तेजी से तरक्की कर रही है? शायद नहीं। हो सकता है कि ये प्रॉम्प्ट्स कोई काम के ही न हों, या फिर वे सिर्फ दोहराव वाले काम कर रहे हों जिनसे कोई नया वैल्यू ऐड नहीं हो रहा।
सिर्फ "कितना इस्तेमाल हुआ" यह देखना उतना ही अधूरा है जितना किसी कर्मचारी को सिर्फ इसलिए अच्छा मान लेना कि वह सबसे ज्यादा घंटे ऑफिस में बैठा, भले ही उसने कोई प्रोडक्टिव काम न किया हो।
क्यों सिर्फ एक्टिविटी पर फोकस करना गलत साबित हो सकता है?
अगर हम गलत चीज़ों को ऑप्टिमाइज कर रहे हैं, तो हम चुपचाप अपने AI प्रोग्राम्स को फेल होने के लिए सेट कर रहे हैं। जिस चीज़ को हम मापते हैं, उसी को हम बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं।
अगर हमारी माप का पैमाना सिर्फ इस्तेमाल की मात्रा है, तो लोग सिर्फ इस्तेमाल की मात्रा बढ़ाएंगे, चाहे उससे कंपनी को फायदा हो या न हो। यह एक तरह का 'सिस्टम फेलियर' है जो अंदर ही अंदर पनपता रहता है और एक दिन पूरा ढांचा ध्वस्त कर देता है।
आपको याद है क्लाउड कंप्यूटिंग के शुरुआती दिन? तब भी कुछ ऐसा ही था। लोग सिर्फ यह देखते थे कि कितनी वर्चुअल मशीनें चल रही हैं, कितना स्टोरेज इस्तेमाल हो रहा है।
लेकिन धीरे-धीरे कंपनियों को समझ आया कि असली रेस तो ऑपरेशनल एफिशिएंसी और बिज़नेस वैल्यू क्रिएशन की है। क्लाउड से हमें कितनी फ्लेक्सिबिलिटी मिली, कितनी तेज़ी से हम नए प्रोडक्ट्स लॉन्च कर पाए, इन सब पर ध्यान देना शुरू किया गया।
AI के साथ भी ठीक वैसा ही हो रहा है। अभी हम क्लाउड के शुरुआती दौर वाले 'नंबर्स' पर अटके हुए हैं।
तो फिर AI की सफलता को मापने के लिए हमें क्या देखना चाहिए?
सवाल उठता है कि अगर ये आंकड़े गलत हैं, तो सही क्या है? हमें उन मैट्रिक्स पर ध्यान देना चाहिए जो सीधे तौर पर बिज़नेस के नतीजों से जुड़े हों। मसलन, क्या AI के इस्तेमाल से हमारी बिक्री बढ़ी है? क्या ग्राहक सेवा बेहतर हुई है? क्या हमारे ऑपरेशनल खर्च कम हुए हैं? क्या हम अपने प्रोडक्ट्स को तेज़ी से मार्केट में ला पा रहे हैं? क्या हमारे कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी बढ़ी है और वे ज़्यादा वैल्यू-एडेड काम कर पा रहे हैं? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब हमें AI इन्वेस्टमेंट के सही रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) को समझने में मदद करेंगे।
मिसाल के तौर पर, अगर एक AI टूल ग्राहक सेवा के लिए इस्तेमाल हो रहा है, तो सिर्फ यह देखना काफी नहीं कि कितने सवालों के जवाब AI ने दिए। बल्कि यह देखना चाहिए कि क्या ग्राहक की संतुष्टि बढ़ी है? क्या उनकी शिकायतों का समाधान तेज़ी से हुआ है? क्या AI के कारण इंसानी एजेंट कम समय में ज़्यादा ग्राहकों को संभाल पा रहे हैं? ये असली बिज़नेस आउटकम्स हैं।
कंपनियों को अब टोकन कॉस्ट, प्रॉम्प्ट काउंट जैसी चीज़ों से हटकर 'बिजनेस इंपैक्ट' पर फोकस करना होगा। उन्हें एक ऐसा फ्रेमवर्क बनाना होगा जहां AI का इस्तेमाल सीधे तौर पर कंपनी के स्ट्रैटेजिक गोल्स से जुड़ा हो।
जब हम AI को इस नज़रिए से देखेंगे, तभी हम उसकी पूरी क्षमता का इस्तेमाल कर पाएंगे और उसे सिर्फ एक महंगा 'खिलौना' बनने से बचा पाएंगे। वरना, ये AI प्रोग्राम्स अंदर ही अंदर, बिना शोर किए फेल होते रहेंगे, और कंपनियों को पता भी नहीं चलेगा कि कहां गलती हो गई।
इस चुनौती को समझने और सही दिशा में कदम उठाने का वक्त आ गया है।






































