टेक डेस्क: दुनिया की दो सबसे बड़ी टेक कंपनियों, एपल और माइक्रोसॉफ्ट के बीच की 'टक्कर' किसी हॉलीवुड फिल्म की कहानी से कम नहीं है. एक तरफ थे अपनी धुन के पक्के स्टीव जॉब्स, और दूसरी तरफ थे बिजनेस की दुनिया के माहिर खिलाड़ी बिल गेट्स. इन दोनों की प्रतिद्वंद्विता सालों तक चली, और इस दौरान एक बार जॉब्स साहब ने माइक्रोसॉफ्ट पर ऐसा तीखा वार किया था कि वो आज भी टेक इतिहास के पन्नों में दर्ज है.
साल 1995 की बात है, स्टीव जॉब्स ने साफ-साफ कह दिया था कि माइक्रोसॉफ्ट के पास 'टेस्ट' नाम की कोई चीज़ है ही नहीं! ये बयान उन्होंने किसी छोटी-मोटी बहस में नहीं दिया था, बल्कि PBS की एक मशहूर डॉक्यूमेंट्री 'ट्रायम्फ ऑफ द नर्ड्स' के लिए दिए एक इंटरव्यू में कहा था. उनका कहना था कि माइक्रोसॉफ्ट सिर्फ दूसरों के बनाए रास्तों पर चलती है, खुद का कोई नया रास्ता नहीं बनाती.
जॉब्स ने तब जो कहा था, वो शब्द-दर-शब्द कुछ ऐसा था: "माइक्रोसॉफ्ट के साथ एक ही दिक्कत है कि उनके पास बिलकुल भी टेस्ट नहीं है. बिलकुल भी टेस्ट नहीं है.
और मैं इसे हल्के में नहीं कह रहा हूं, मैं इसे बड़े मायने में कह रहा हूं, इस अर्थ में कि वो कोई ओरिजिनल आइडिया नहीं सोचते, और अपने प्रोडक्ट्स में ज्यादा कल्चर नहीं लाते."
सोचिए, ये सिर्फ डिजाइन या रंग-रूप की बात नहीं थी, बल्कि जॉब्स का मानना था कि माइक्रोसॉफ्ट के प्रोडक्ट्स में 'आत्मा' नहीं है. उनमें कोई मौलिकता नहीं, कोई नयापन नहीं, बस जो चल रहा है, उसे ही थोड़ा-बहुत बदलकर पेश कर देना.
माइक्रोसॉफ्ट को 'मैकडॉनल्ड्स' क्यों कहा था?
स्टीव जॉब्स यहीं नहीं रुके. उन्होंने तो माइक्रोसॉफ्ट की तुलना उस वक्त की मशहूर फास्ट फूड चेन मैकडॉनल्ड्स से कर डाली थी.
अब आप कहेंगे, एक टेक कंपनी और मैकडॉनल्ड्स? ये क्या बात हुई? लेकिन जॉब्स का इशारा बिलकुल साफ था. जैसे मैकडॉनल्ड्स हर जगह है, उसके बर्गर हर कोने में मिलते हैं, लेकिन क्या आप उसे खाने के बेहतरीन अनुभव के लिए याद रखते हैं? शायद नहीं.
मैकडॉनल्ड्स अपनी व्यापकता और पहुंच के लिए जानी जाती है, न कि अपने स्वाद या मौलिकता के लिए.
यही बात जॉब्स माइक्रोसॉफ्ट के लिए कह रहे थे. उनका मतलब था कि माइक्रोसॉफ्ट ने पूरी दुनिया में अपने पैर पसारे, लेकिन उनके प्रोडक्ट्स में एपल जैसी वो 'आत्मा', वो 'डिजाइन सेंस', वो 'यूजर एक्सपीरियंस' कभी नहीं आया.
उनके उत्पाद बस काम चलाऊ होते थे, उनमें कोई 'स्पिरिट' नहीं होती थी, जैसा कि जॉब्स ने खुद कहा था. उन्हें 'बहुत ही सामान्य' (very pedestrian) उत्पादों की श्रेणी में रखा गया था.
माइक्रोसॉफ्ट की कामयाबी के पीछे क्या था जॉब्स का नजरिया?
स्टीव जॉब्स ने माइक्रोसॉफ्ट की इस बेतहाशा कामयाबी के पीछे एक बहुत बड़ी वजह भी बताई थी. उन्होंने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट का इतना फैलना और सफल होना दरअसल IBM नाम के एक 'सैटर्न-5 बूस्टर' की वजह से था.
याद कीजिए, शुरुआती दिनों में IBM ने अपने पहले पर्सनल कंप्यूटर (PC) के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने का काम माइक्रोसॉफ्ट को आउटसोर्स किया था. इसी से MS-DOS का जन्म हुआ.
बिल गेट्स ने तब एक ऐसा कमाल किया था, जो उनकी बिजनेस समझदारी का लोहा मनवाता है. उन्होंने IBM को MS-DOS बेचने के बजाय, उसे लाइसेंस पर दिया और उसके लाइसेंसिंग राइट्स अपने पास ही रखे.
जॉब्स ने इसे बिल गेट्स की 'और मौके बनाने' (create more opportunity) वाली चाल कहा था. गेट्स का यह कदम मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ, क्योंकि जैसे-जैसे PC का बाजार फैला, माइक्रोसॉफ्ट ने हर PC निर्माता को MS-DOS लाइसेंस कर भारी कमाई की.
जॉब्स ने बिजनेस के इस पहलू के लिए बिल गेट्स की तारीफ भी की. उन्होंने माना कि माइक्रोसॉफ्ट अपनी सफलता की हकदार है, लेकिन उनका जोर हमेशा इस बात पर रहा कि इस कंपनी ने ब्रॉड इकोसिस्टम में कोई मौलिकता नहीं जोड़ी.
उनके लिए यूजर एक्सपीरियंस कोई मायने नहीं रखता था, बस प्रोडक्ट्स को किसी तरह बाजार में उतारना उनकी प्राथमिकता थी. यह एक बड़ा अंतर था दोनों कंपनियों की सोच में.
फिर आखिर कैसे बदल गई ये 'दुश्मनी'?
कहते हैं ना, वक्त हर घाव भर देता है, और बड़ी-बड़ी दुश्मनियाँ भी समय के साथ फीकी पड़ जाती हैं. बिल गेट्स और स्टीव जॉब्स के बीच दशकों तक चली यह तनातनी आखिर में खत्म हुई.
जॉब्स के 2013 में निधन से पहले, दोनों के रिश्तों में काफी सुधार आया था. वे एक-दूसरे के प्रति पहले जैसा 'दुश्मनी' का भाव नहीं रखते थे.
कई मौकों पर दोनों को एक साथ देखा गया और उन्होंने एक-दूसरे के काम की तारीफ भी की.
यह 'दुश्मनी से दोस्ती' का सफर टेक जगत के इतिहास का एक अहम हिस्सा बन गया. यह दिखाता है कि कैसे दो धुर विरोधी भी आखिर में एक-दूसरे के प्रति सम्मान विकसित कर सकते हैं, भले ही उनकी व्यावसायिक फिलॉसफी कितनी ही अलग क्यों न रही हो.
स्टीव जॉब्स का वो बयान आज भी टेक दुनिया में एक यादगार रेफरेंस पॉइंट है, जो बताता है कि जब दो दिग्गज टकराते हैं तो चिंगारी कैसे निकलती है!

































