बेंगलुरु: सोचिए, एक शख्स जिसने अपनी जिंदगी के 18 साल अमेरिका में बिताए हों। टेक इंडस्ट्री के सबसे बड़े नाम Meta में एक सीनियर पोस्ट पर काम करता हो। एक शानदार करियर बना लिया हो, लेकिन फिर अचानक एक दिन वो सब छोड़कर अपने वतन वापस आ जाए। परिवार के लिए, जड़ों से जुड़ने के लिए। ये सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि हजारों भारतीय प्रोफेशनल्स की कहानी है जो विदेश में सब कुछ पाकर भी अपने देश का खिंचाव महसूस करते हैं। ऐसी ही कहानी है Meta के सीनियर इंजीनियरिंग लीडर बालाजी गुरुराजन की, जिन्होंने 18 साल बाद अमेरिका से बेंगलुरु वापसी का बड़ा फैसला लिया है।
बालाजी का ये कदम आजकल सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोर रहा है। लोग उनकी कहानी से खुद को जोड़ पा रहे हैं।
उन्होंने साफ किया कि उनका ये बदलाव सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं था, बल्कि परिवार के और करीब आने और जिंदगी के उन अनमोल पलों को साथ जीने की इच्छा थी, जिन्हें वो अमेरिका में रहते हुए शायद मिस कर रहे थे। उनका ये फैसला उन सभी भारतीयों को सोचने पर मजबूर करता है, जो विदेशों में बसे हैं और अपने परिवार के पास लौटने का मन बना रहे हैं।
आखिर क्या हुआ जो लौटना पड़ा?
बालाजी गुरुराजन ने खुद अपने लिंक्डइन (LinkedIn) प्रोफाइल पर इस वापसी की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने उन्हें एक शानदार करियर दिया, बेशकीमती दोस्त दिए और टेक्नोलॉजी व लीडरशिप को समझने का एक नया नजरिया भी दिया।
वो अपने उन सभी सहयोगियों और मेंटर्स का दिल से शुक्रिया अदा करते नहीं थके, जिन्होंने उनके इस लंबे सफर को यादगार बनाने में मदद की। लेकिन, कहते हैं ना कि घर की बात ही कुछ और होती है! कहीं न कहीं, परिवार की नजदीकी और अपने माता-पिता के साथ ज्यादा समय बिताने की चाहत ने उन्हें भारत वापस खींच लिया।
बालाजी की इस पोस्ट के साथ एक तस्वीर भी थी। उसमें ढेर सारे सूटकेस नजर आ रहे थे, जो उनकी 18 साल की जिंदगी को समेटे हुए थे।
उन्होंने लिखा कि ये अनुभव सचमुच बेहद भावुक करने वाला है। 18 साल की जिंदगी को समेटकर एक नए सफर पर निकलना, ये सोचकर ही दिल भर आता है।
बेंगलुरु वापस आने के बाद अब उनके सामने नई चुनौतियां हैं। घर संभालना, बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम करना और रोजमर्रा की जिंदगी को एक नए सिरे से व्यवस्थित करना, ये सब उनके लिए एक बिल्कुल नया चैलेंज बन गया है।
बदलाव सिर्फ जगह का नहीं, जिंदगी का भी है?
बालाजी ने इस बात पर जोर दिया कि किसी दूसरे देश में सालों रहने के बाद अपने वतन वापस लौटना सिर्फ आपका पता बदलना नहीं होता, बल्कि जीवन जीने का तरीका ही बदल जाता है। आदतें बदल जाती हैं, रूटीन बदल जाता है और यहां तक कि सोचने का नजरिया भी बदल जाता है।
उन्होंने माना कि ये बदलाव आसान नहीं है, इसमें मुश्किलें भी हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने इसे बेहद सकारात्मक और सीखने वाला अनुभव भी बताया। यानी वो इस नई शुरुआत को पूरी तरह से गले लगाने को तैयार हैं, चाहे रास्ते में कितनी भी अड़चनें आएं।
उनकी वापसी की कहानी हजारों लोगों को प्रेरणा देती है जो विदेश में रहकर अपने देश और परिवार को याद करते हैं। ये बताता है कि तरक्की और पैसा भले ही विदेश में मिल जाए, लेकिन अपनेपन का सुख अपने घर में ही मिलता है।
भारत लौटकर क्या नया कर रहे हैं बालाजी?
नई शुरुआत के साथ बालाजी सिर्फ अपने घर-परिवार तक ही सीमित नहीं रहे हैं। उन्होंने एक कमाल का साइड प्रोजेक्ट भी लॉन्च किया है, जिसका नाम है ‘भविष्यता’ (Bhavitta)।
अब आप सोच रहे होंगे कि ये क्या है? तो बता दें, ये एक ऐसा ऐप है जो उन लोगों के लिए बनाया गया है, जिन्हें अलग-अलग देशों, करेंसियों और टैक्स सिस्टम के बीच अपनी आर्थिक योजनाएं संभालने में दिक्कत आती है। यानी जो लोग विदेशों से भारत लौटे हैं या कई देशों में जिनके असेट्स हैं, उनके लिए ये ऐप वरदान साबित हो सकता है।
बालाजी ने बताया कि इस ऐप को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मॉडल क्लाउड (Claude) की मदद से तैयार किया गया है। ये दिखाता है कि भले ही वो देश लौट आए हों, लेकिन तकनीक और इनोवेशन से उनका जुड़ाव कम नहीं हुआ है, बल्कि वो अब अपने देश में रहते हुए भी कुछ नया और उपयोगी करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
इस वापसी पर सोशल मीडिया क्या कहता है?
बालाजी की लिंक्डइन पोस्ट पर लोगों की बाढ़ सी आ गई। हजारों प्रोफेशनल्स ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दीं।
कई लोगों ने अपने अनुभव साझा किए, जहां उन्होंने भी अमेरिका से भारत लौटने का फैसला अपने माता-पिता और परिवार के लिए लिया था। उनका कहना था कि विदेश में सालों-साल करियर बनाने के बाद देश वापसी सिर्फ भावनात्मक ही नहीं, बल्कि जीवनशैली में भी एक बहुत बड़ा बदलाव लेकर आती है।
लोग मानते हैं कि ये एक ऐसा फैसला है जो जिंदगी की दिशा ही बदल देता है।
हालांकि, हर प्रतिक्रिया हमेशा सकारात्मक ही हो, ऐसा जरूरी नहीं। कुछ लोगों ने इस 'माता-पिता के लिए लौटने' वाली सोच पर सवाल भी खड़े किए।
उनका तर्क था कि जब माता-पिता को सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब तो लोग विदेश चले जाते हैं, और जब वो बूढ़े हो जाते हैं, तब लौटने की बात करते हैं। खैर, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।
कुल मिलाकर, बालाजी की वापसी की कहानी ने एक नई बहस छेड़ दी है, जो सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हजारों प्रवासी भारतीयों की भावनाओं और फैसलों को दर्शाती है।


































