गुरुग्राम: एक तरफ चमचमाती कॉर्पोरेट बिल्डिंग्स, दूसरी तरफ महंगी लाइफस्टाइल का शोर। इसी शोरगुल के बीच गुरुग्राम से एक कहानी निकली है, जिसने सोशल मीडिया पर भूचाल ला दिया है। कहानी है एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की, जो सालाना 26 लाख रुपये कमाता है, लेकिन फिर भी कहता है कि उसकी बचत ना के बराबर है। और इस सब के बीच उसने अपनी पत्नी को लेकर कुछ ऐसा कह दिया है, जिसने बहस को और गरमा दिया है।
ये कोई मामूली बात नहीं है, ये आज के मिडिल क्लास परिवारों की उस 'हिडन टेंशन' की पोल खोल रही है, जहां अच्छी कमाई के बावजूद फाइनेंशियल स्टेबिलिटी एक चुनौती बनी हुई है। PayU जैसी बड़ी टेक कंपनी में काम करने वाले इस इंजीनियर ने अपनी आपबीती साझा की, और वो ऐसी वायरल हुई कि हर कोई अपनी राय देने पर उतर आया।
आखिर क्या है इस इंजीनियर का 'दर्द'?
मामला गुरुग्राम के एक 34 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर का है। जनाब की सैलरी स्लिप देखें तो आंखें फटी रह जाएं – सालाना 26 लाख रुपये! यानी, टैक्स वगैरह कटने के बाद हर महीने हाथ में लगभग 1.75 लाख रुपये आते हैं।
अब आप सोचेंगे, इतनी सैलरी में तो लाइफ सेट हो जाती है। लेकिन इंजीनियर साहब का कहना है कि इतने पैसे आने के बाद भी महीने के आखिर में उनकी जेब में सिर्फ 15 हजार रुपये ही बच पाते हैं।
यही है उनका 'दर्द' जो उन्होंने खुलकर बताया है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि परिवार में अकेले कमाने वाले सदस्य होने का प्रेशर बहुत ज्यादा होता है। मानसिक और आर्थिक, दोनों तरह से।
इस दबाव ने उन्हें इतना परेशान कर दिया कि उन्होंने अपनी पत्नी को लेकर भी कुछ बातें कह दीं, जिसने बहस को नया मोड़ दे दिया।
क्यों 26 लाख रुपये भी पड़ रहे हैं कम?
अब सवाल उठता है कि इतनी मोटी सैलरी आखिर जाती कहां है? इंजीनियर साहब ने अपनी मंथली 'खर्चों की लिस्ट' भी शेयर की है, जिसे देखकर आप भी समझ जाएंगे कि गुरुग्राम में जिंदगी कितनी 'महंगी' है।
- सबसे पहले बात किराए की। गुरुग्राम के सेक्टर-56 में एक 2BHK फ्लैट का किराया करीब 40 हजार रुपये महीना है। सिर्फ रहने का खर्चा ही बजट का बड़ा हिस्सा खा जाता है।
- इसके बाद आते हैं घर के रोजमर्रा के खर्चे – राशन, बिजली का बिल, डोमेस्टिक हेल्प (घर के काम के लिए मदद) और बाकी छोटे-मोटे खर्च। ये सब मिलाकर लगभग 30 हजार रुपये तक पहुंच जाते हैं।
- कार की EMI भी इसमें शामिल है, जो करीब 16 हजार रुपये है। आज के समय में कार भी जरूरत बन गई है, और उसकी किस्त भी बजट पर असर डालती है।
- और हां, अपने माता-पिता को भी कौन भूल सकता है? रांची में रहने वाले अपने माता-पिता को वो हर महीने 20 हजार रुपये भेजते हैं। ये भी एक बड़ा खर्च है, जो उनकी जिम्मेदारियों को दिखाता है।
बेटी की परवरिश में कितना खर्च?
इंजीनियर साहब के खर्चों की लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती। सबसे बड़ा और सबसे इमोशनल खर्च उनकी बेटी की परवरिश पर होता है।
उन्होंने बताया कि बेटी की स्कूल फीस, उसके नए कपड़े, खिलौने, अगर कोई मेडिकल इमरजेंसी आ जाए तो उसका खर्च, और हॉबी क्लास जैसी चीजों पर हर महीने करीब 50 हजार रुपये खर्च हो जाते हैं।
ये सुनकर वाकई आप समझ सकते हैं कि बच्चे की अच्छी परवरिश का सपना देखने वाले माता-पिता के लिए यह कितना बड़ा फाइनेंशियल चैलेंज होता है। उनका कहना है कि इन सारी जिम्मेदारियों को एक साथ संभालते हुए, वो अक्सर खुद को दबाव में महसूस करते हैं।
पत्नी को लेकर कही गई बात, जिससे शुरू हुई असली बहस
इंजीनियर साहब ने अपनी पत्नी निशा की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी एक बहुत अच्छी मां हैं और अपनी बेटी की बहुत अच्छी तरह देखभाल करती हैं।
लेकिन इसके बाद उन्होंने जो कहा, उसने सोशल मीडिया पर आग लगा दी।
उन्होंने बताया कि शादी से पहले उनकी पत्नी निशा अमिटी यूनिवर्सिटी से MBA कर रही थीं। लेकिन शादी के बाद वो अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाईं।
इंजीनियर ने उम्मीद जताई थी कि शादी के बाद उनकी पत्नी कोई कोर्स पूरा करेंगी, शायद नौकरी करेंगी, या घर से कोई छोटा-मोटा काम शुरू करेंगी जिससे परिवार में आर्थिक मदद मिल सके। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
उनका सीधा-सीधा कहना था कि कभी-कभी उन्हें लगता है कि काश उन्होंने ऐसे पार्टनर से शादी की होती, जो लाइफ में आगे बढ़ने और आर्थिक योगदान देने को लेकर थोड़ा ज्यादा महत्वाकांक्षी होता। इस एक बयान ने पूरे इंटरनेट को दो फाड़ कर दिया।
क्या पार्टनर का आर्थिक योगदान जरूरी है? सोशल मीडिया पर मचा संग्राम
इंजीनियर के इस 'मन की बात' को लेकर सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। कुछ लोग इंजीनियर का समर्थन कर रहे हैं।
उनका कहना है कि आज के जमाने में जब खर्च आसमान छू रहे हैं, तो पति-पत्नी दोनों का वर्किंग होना एक जरूरत बन गया है। वे मानते हैं कि इंजीनियर अपनी परेशानी सही बता रहा है और पत्नी को भी परिवार की आर्थिक गाड़ी खींचने में हाथ बटाना चाहिए।
वहीं, दूसरी तरफ कुछ लोग इंजीनियर की आलोचना कर रहे हैं। उनका तर्क है कि एक पत्नी का घर संभालना, बच्चों की परवरिश करना भी एक बड़ा 'योगदान' है, जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती।
वे कह रहे हैं कि इंजीनियर को अपनी पत्नी की महत्वाकांक्षा पर सवाल नहीं उठाना चाहिए था, खासकर जब वो एक अच्छी मां हैं। इस ग्रुप का मानना है कि इंजीनियर का यह बयान महिलाओं के घर के काम को कम आंक रहा है।
कई यूजर्स ने तो यहां तक कहा कि अगर इंजीनियर को 'वर्किंग पार्टनर' ही चाहिए था, तो शादी से पहले यह बात साफ कर लेनी चाहिए थी। कुछ लोगों ने तो यह भी कहा कि अगर 26 लाख की सैलरी भी कम पड़ रही है, तो यह सैलरी की नहीं बल्कि 'फाइनेंशियल प्लानिंग' की दिक्कत है।
कुल मिलाकर, इस कहानी ने शादी, रिश्तों में उम्मीदों, आर्थिक जिम्मेदारियों और पार्टनर के रोल को लेकर एक बड़ी चर्चा छेड़ दी है। यह सिर्फ एक इंजीनियर की कहानी नहीं है, बल्कि आज के कई परिवारों की कहानी है, जहां कमाई के साथ-साथ खर्च भी बेतहाशा बढ़ रहे हैं और लोग एक 'बैलेंस' बनाने की जद्दोजहद में लगे हैं।





































