कानपुर: सोचिए, कोई 12वीं पास लड़का एक ऐसे शातिर गैंग का सरगना बन जाए, जो लोगों के जिस्म से गुपचुप तरीके से किडनी निकाल कर लाखों-करोड़ों में बेचता हो? ये कहानी किसी फ़िल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं, लेकिन है सोलह आने सच। कानपुर से सामने आए अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट की परतें अब एक-एक करके खुल रही हैं। इसमें एक डॉक्टर दंपत्ति समेत कई नामचीन लोग शामिल हैं और इस पूरे गोरखधंधे का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है, सिर्फ इंटर पास रोहित तिवारी। पुलिस ने इस मामले में 1000 पन्नों की चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी है, जिसमें 40 लोगों को गवाह बनाया गया है। ये सिर्फ किडनी खरीदने-बेचने का मामला नहीं, बल्कि संगठित अपराध का एक ऐसा जाल है, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है।
मामले की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि चार्जशीट में मुजफ्फरनगर की किडनी लेने वाली पारुल तोमर से लेकर बिहार के बेगूसराय के आयुष कुमार चौधरी तक, जो किडनी देने वाला था, सभी का ज़िक्र है। इसमें एसीएमओ रमित रस्तोगी और हैलट अस्पताल व लखनऊ के राममनोहर लोहिया हॉस्पिटल के कुल 10 डॉक्टर भी गवाह बने हैं।
मतलब, मामला सीधा-सीधा डॉक्टरों की मिलीभगत और एक बड़े नेटवर्क की तरफ इशारा कर रहा है। पुलिस ने इस मुकदमे में अब संगठित गिरोह की धाराएं भी बढ़ा दी हैं, जिससे पता चलता है कि ये सिर्फ एक-दो लोगों का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित गिरोह का काम था।
ऐसे हुआ अवैध किडनी रैकेट का खुलासा
इस पूरे मामले की शुरुआत 29 मार्च को हुई थी, जब कानपुर के रावतपुर इलाके में केशवपुरम स्थित आहूजा हॉस्पिटल में अवैध तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट का भंडाफोड़ हुआ। पुलिस को भनक लगी और जब टीम ने छापा मारा, तो कल्याणपुर के मेडलाइफ हॉस्पिटल में बिहार के बेगूसराय का आयुष कुमार चौधरी, जो किडनी देने वाला था, भर्ती मिला।
वहीं, प्रिया अस्पताल के डीलक्स रूम में मुजफ्फरनगर की पारुल तोमर, जिसे किडनी मिलनी थी, भर्ती मिली। पूछताछ में जो कहानी सामने आई, उसने सबको हिला दिया।
23 साल के आयुष से उसकी किडनी 6 लाख रुपए में खरीदी गई थी, जबकि यही किडनी बाद में पारुल तोमर को करीब 80 लाख रुपए में बेच दी गई। जी हां, पूरे 80 लाख रुपए में!
इस पूरे गोरखधंधे का पर्दाफ़ाश तब हुआ, जब किडनी देने वाले छात्र आयुष ने ही पुलिस में शिकायत की। उसकी शिकायत पर ही पुलिस ने मेडलाइफ हॉस्पिटल, आहूजा हॉस्पिटल और प्रिया हॉस्पिटल में एक साथ छापेमारी की और ये पूरा किडनी रैकेट उजागर हो गया।
जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, चौंकाने वाले खुलासे होते चले गए। पता चला कि किडनी ट्रांसप्लांट करने के लिए लखनऊ और दिल्ली से डॉक्टरों की टीमें आती थीं।
देश के अलग-अलग राज्यों से गरीब और जरूरतमंद युवकों को जाल में फंसाकर उनकी किडनी का सौदा किया जाता था। सोचिए, एक तरफ गरीबी का फायदा उठाकर 6 लाख में किडनी ली जा रही है, वहीं दूसरी तरफ मजबूरी का फायदा उठाकर उसी किडनी को 80 लाख में बेचा जा रहा है।
गैंग के सदस्य और पुलिस की कार्रवाई
इस मामले की जांच रावतपुर थाने में तैनात दरोगा मनोज कुमार विश्वकर्मा कर रहे थे। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर इस बड़े रैकेट के कई सदस्यों को दबोचा।
अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट में शामिल आहूजा अस्पताल की डॉ. प्रीति आहूजा और उनके पति डॉ.
सुरजीत आहूजा को पुलिस ने गिरफ्तार किया। इनके साथ-साथ डॉ.
राजेश कुमार, डॉ. राम प्रकाश, डॉ.
नरेंद्र सिंह, एजेंट शिवम अग्रवाल, डॉक्टर रोहित, ओटी मैनेजर राजेश कुमार, ओटी संचालक कुलदीप सिंह राघव और ड्राइवर परवेज सैफी समेत कुल 12 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। ओटी टेक्नीशियन मुदस्सर अली सिद्दीकी उर्फ डॉ.
अली ने तो कोर्ट में सरेंडर कर दिया था।
लेकिन एक नाम और है, जिसने इस मामले को और पेचीदा बना दिया। पारुल तोमर की किडनी ट्रांसप्लांट में 22 लाख रुपए लेकर नोटों की गड्डियों पर लेटने वाले डॉ.
अफ़ज़ाल ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत ले ली थी। हालांकि, पुलिस ने उनके खिलाफ भी आरोप पत्र दाखिल किया है।
डीसीपी वेस्ट एसएम कासिम आबिदी ने बताया कि मुकदमे में अब संगठित गिरोह की धाराएं बढ़ा दी गई हैं, जिससे इन अपराधियों पर और शिकंजा कसा जा सके।
चार्जशीट में 40 गवाह और अहम सबूत
पुलिस ने इस मामले में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। 1000 पन्नों की चार्जशीट में एसीएमओ रमित रस्तोगी, किडनी लेने वाली पारुल तोमर, किडनी देने वाले आयुष कुमार चौधरी, हैलट अस्पताल और राम मनोहर लोहिया अस्पताल के पांच-पांच डॉक्टरों, कल्याणपुर सीएचसी प्रभारी, 20 पुलिसकर्मी और पारुल के पति विकास तोमर व भाई दिव्यांक तोमर समेत 40 लोगों को बतौर गवाह शामिल किया गया है।
ये सभी गवाह कोर्ट में इस मामले को साबित करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
डीसीपी वेस्ट ने यह भी बताया कि आयुष और पारुल, दोनों दो बार ट्रेन के जरिए कानपुर आए थे और उन्होंने अपनी टिकट ऑनलाइन बुक की थी। ये ऑनलाइन टिकट भी पुलिस ने सबूत के तौर पर जुटाए हैं, जो कोर्ट में बेहद अहम साबित होंगे।
ये डिजिटल फुटप्रिंट्स इस बात का पुख्ता प्रमाण देंगे कि कैसे इस गिरोह ने योजनाबद्ध तरीके से इस अपराध को अंजाम दिया। यह मामला सिर्फ कानपुर का नहीं, बल्कि पूरे देश में सक्रिय ऐसे गिरोहों के लिए एक चेतावनी है, और दिखा रहा है कि कैसे कानून की पकड़ से कोई बच नहीं सकता, भले ही वो कितना भी शातिर क्यों न हो।

