पूर्णिया: सुबह का वक्त था, मिथिलेश यादव अपनी भैंसों को लेकर खेत की तरफ जा रहे थे। ये उनकी रोज की दिनचर्या थी, लेकिन किसे पता था कि आज का दिन उनकी जिंदगी में एक भयंकर आफत लाने वाला है। पूर्णिया जिले के सरसी इलाके में मौसम ने अचानक ऐसी करवट ली कि पल भर में एक आसमानी बिजली गिरी और मिथिलेश दर्द से कराह उठे। उनकी दो हष्ट-पुष्ट भैंसें वहीं खेत में ढेर हो गईं। यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक किसान की बदकिस्मती और उसके परिवार पर आई मुसीबत की कहानी है, जो कुदरत के एक झटके में सबकुछ बदल गई।
धमदाहा प्रखंड की चंपावती पंचायत के वार्ड संख्या 13 के रहने वाले मिथिलेश यादव, एक आम किसान की तरह ही अपनी मेहनत से परिवार का पेट पालते थे। उनकी आजीविका का बड़ा हिस्सा उनके पशुधन पर निर्भर करता था।
रोज की तरह आज भी वह अपने मवेशियों को लेकर चरवाही के लिए खेत में गए थे। मिथिलेश नहीं जानते थे कि आज का दिन उनके लिए कितना भारी पड़ने वाला है, जब उनकी आँखों के सामने उनका सबकुछ खत्म होने वाला था।
खेत में सब कुछ सामान्य चल रहा था। भैंसें शांति से घास चर रही थीं और मिथिलेश उन पर नजर रखे हुए थे।
तभी आसमान में काले बादल घिरने लगे। हवा तेज हुई और कुछ देर बाद ही बिजली कड़कने लगी।
ग्रामीण इलाकों में ऐसे मौसम बदलाव आम होते हैं, खासकर मानसून के आस-पास, लेकिन इस बार ये बदलाव अपने साथ मौत और तबाही लेकर आया था।
आसमान से आई आफत और पल भर में सब खाक
एक अचानक और तेज़ चमक के साथ आसमानी बिजली मिथिलेश और उनकी भैंसों पर आ गिरी। धमाका इतना ज़ोरदार था कि आसपास के खेतों में काम कर रहे लोग भी सहम गए और कुछ पल के लिए उनकी सांसें थम गईं।
जब तक कोई कुछ समझ पाता, मिथिलेश ज़मीन पर गिर चुके थे और उनकी दो हष्ट-पुष्ट भैंसें तड़पकर दम तोड़ चुकी थीं। यह मंज़र बेहद दिल दहला देने वाला था।
मिथिलेश का शरीर बुरी तरह झुलस गया था और वे दर्द से छटपटा रहे थे। उनकी आँखों के सामने उनके दो मवेशी बेजान पड़े थे, जो उनकी आजीविका का अहम हिस्सा थे।
यह सिर्फ पशु नहीं थे, बल्कि उनके परिवार के लिए रोटी का जरिया थे, एक तरह से उनकी जमापूंजी थे, जो एक झटके में ख़त्म हो गई।
ग्रामीणों ने बचाई जान, अस्पताल में जिंदगी की जंग
बिजली गिरने की आवाज़ सुनकर और धुएँ का गुबार देखकर आसपास के ग्रामीण तुरंत मौके पर पहुंचे। उन्होंने देखा कि मिथिलेश बुरी तरह झुलस गए थे और बेहोशी की हालत में जमीन पर पड़े थे।
बिना देर किए, ग्रामीणों ने इंसानियत दिखाते हुए मिथिलेश को उठाया और आनन-फानन में स्थानीय अस्पताल पहुंचाया। वहाँ डॉक्टरों ने उनकी गंभीर हालत को देखते हुए तुरंत इलाज शुरू किया।
एक ग्रामीण ने इस घटना के बारे में बात करते हुए बताया, “अगर मिथिलेश उस समय भैंस पर बैठे होते, जैसा कि अक्सर चरवाहे करते हैं, तो शायद उनकी जान भी नहीं बच पाती। ये तो भगवान का शुक्र है कि वो ज़मीन पर थे।
” उनकी हालत इतनी गंभीर थी कि डॉक्टरों ने उन्हें सघन निगरानी में रखा है, और अभी भी वे खतरे से बाहर नहीं बताए जा रहे हैं। मिथिलेश के परिवार वाले अस्पताल में चिंता में डूबे हैं, हर पल उनके ठीक होने की दुआ कर रहे हैं और उनके पास आस-पास कोई भी ऐसी जानकारी नहीं है जिससे उन्हें राहत मिल सके।
दो भैंसों की मौत से आर्थिक कमर टूटी
इस घटना ने मिथिलेश यादव को सिर्फ शारीरिक पीड़ा ही नहीं दी, बल्कि उनके परिवार पर आर्थिक संकट का दोहरा वार किया है। दो भैंसों की मौत का मतलब है कि उनके घर की आय का एक बड़ा ज़रिया रातों-रात खत्म हो गया।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्व किसी से छिपा नहीं है। ये पशु सिर्फ दूध या खेती में मदद ही नहीं करते, बल्कि परिवार की बचत और बुरे वक्त के साथी भी होते हैं।
इनकी कीमत हजारों में होती है, और एक झटके में इतनी बड़ी आर्थिक क्षति ने परिवार की कमर तोड़ दी है।
परिवार के एक सदस्य ने भारी मन से बताया कि “हमें समझ नहीं आ रहा कि अब कैसे गुज़ारा होगा। मिथिलेश जी की तबियत इतनी खराब है और ऊपर से ये भैंसें भी चली गईं।
अब क्या करें?” यह दर्द सिर्फ मिथिलेश के परिवार का नहीं, बल्कि ऐसे कई किसानों का है जो मौसम की मार और प्राकृतिक आपदाओं के आगे बेबस हो जाते हैं। एक किसान के लिए उसका पशुधन उसकी सारी पूंजी होता है और जब वो चला जाए तो सब कुछ खो जाने जैसा लगता है।
प्रशासन की कार्यवाही और सहायता की उम्मीद
इस दर्दनाक घटना की जानकारी स्थानीय पुलिस और प्रशासन को दे दी गई है। सरसी थानाध्यक्ष राहुल कुमार ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया, “आकाशीय बिजली से दो भैंसों की मौत हुई है और उनके मालिक मिथिलेश यादव गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
हमने घटना की सूचना आपदा प्रबंधन विभाग को दे दी है।”
उन्होंने आगे कहा कि, “घायल किसान और मृत पशुओं के लिए सरकारी सहायता के लिए आवेदन की प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है।” आपदा प्रबंधन विभाग ऐसी प्राकृतिक आपदाओं में पीड़ितों को आर्थिक सहायता प्रदान करता है, ताकि उनके नुकसान की कुछ भरपाई हो सके।
परिवार को अब इस सरकारी सहायता का बेसब्री से इंतज़ार है, जो शायद उनके कुछ घावों पर मरहम लगा सके और उन्हें इस मुश्किल घड़ी से निकलने में मदद करे। मिथिलेश यादव अभी भी अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
उनका परिवार उनके ठीक होने और जल्द से जल्द घर लौटने की उम्मीद लगाए बैठा है। वहीं, इस घटना ने एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं की भयावहता और ग्रामीण जीवन पर उनके गहरे प्रभाव को उजागर कर दिया है।


