पूर्णिया: बिहार के पूर्णिया से जो खबर आई है, वो सिर्फ सैलरी रुकने की कहानी नहीं, बल्कि 220 परिवारों की टूटती उम्मीदों और खाली होते बर्तनों की दास्तान है। सोचिए, एक तरफ जहाँ देश स्वच्छ भारत की बात करता है, वहीं पूर्णिया के जननायक कर्पूरी ठाकुर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (GMCH) में सफाई का जिम्मा उठाने वाले करीब सवा दो सौ कर्मचारी पिछले तीन महीने से बिना तनख्वाह के गुजारा कर रहे हैं। सोमवार को जब इनकी सब्र का बांध टूटा, तो ये ओपीडी परिसर में हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर धरने पर बैठ गए। अस्पताल की चकाचौंध के बीच इनकी आँखों में गरीबी और बेबसी का स्याह अंधेरा साफ दिख रहा था।
ये वो लोग हैं जो हर दिन अस्पताल को साफ-सुथरा रखते हैं, मरीजों और डॉक्टरों को संक्रमण से बचाने का काम करते हैं। लेकिन आज खुद इनके घर में खाने को लाले पड़े हैं।
इन सफाईकर्मियों का दर्द इतना गहरा था कि उन्होंने खुलकर कहा, "हमारी सेविंग्स खत्म हो चुकी हैं। घर चलाने के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है।
हम रोजाना अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं, लेकिन हमारी मेहनत की कमाई रोक दी गई है।" एक कर्मचारी ने बताया कि बच्चों की फीस, घर का किराया और खाने-पीने का खर्च, सब कुछ ठप्प पड़ गया है।
कई लोगों ने रिश्तेदारों से उधार लिया है, तो कुछ ने महाजन से ऊंची ब्याज दरों पर पैसे उठाए हैं।
मेहनत की कमाई पर ताला और खाली पेट
इन 220 सफाईकर्मियों का काम किसी भी अस्पताल की रीढ़ की हड्डी जैसा होता है। कोरोना काल में भी इन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर काम किया था, जब लोग घरों में दुबके हुए थे।
लेकिन आज इनकी स्थिति ऐसी है कि अस्पताल की दीवारों पर लिखे ‘स्वच्छता’ के नारे इन्हें सिर्फ चिढ़ा रहे हैं। तीन महीने की तनख्वाह अटकने का मतलब है कि लगभग 90 दिन से इनके घरों में चूल्हा ढंग से नहीं जला होगा।
बच्चों के स्कूल की फीस रुकी होगी, दूध-सब्जी का हिसाब गड़बड़ा गया होगा। यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि हर एक सफाईकर्मी की आँखों में दिख रहा दर्द है, जिसे ये बिना किसी शिकवा-शिकायत के झेल रहे थे, जब तक कि पानी सिर से ऊपर नहीं चला गया।
प्रदर्शन कर रहे एक सफाईकर्मी, जिनका नाम उन्होंने नहीं बताया, लेकिन उनकी आवाज में गुस्सा और हताशा साफ थी, उन्होंने कहा, "हम कोई भीख नहीं मांग रहे हैं, अपनी मेहनत का पैसा मांग रहे हैं। सुबह से शाम तक झाड़ू लगाते हैं, कचरा उठाते हैं, वॉशरूम साफ करते हैं, ताकि अस्पताल में आने वाले लोगों को कोई दिक्कत न हो।
लेकिन हमारी दिक्कतों को देखने वाला कोई नहीं।" उन्होंने आगे जोड़ा, "त्योहार आए और चले गए, बच्चों के लिए कुछ खरीद नहीं पाए।
अब तो राशन भी उधार का चल रहा है।"
बार-बार शिकायत, बस झूठे आश्वासन
ये ऐसा नहीं है कि सफाईकर्मियों ने पहली बार आवाज उठाई हो। उनकी मानें तो वेतन भुगतान को लेकर उन्होंने कई बार संबंधित एजेंसी और अस्पताल प्रबंधन के सामने अपनी बात रखी।
हर बार उन्हें सिर्फ "हो जाएगा", "जल्द ही मिलेगा" जैसे खोखले आश्वासन ही मिले। लेकिन आश्वासन, न तो भूख मिटाता है और न ही बच्चों का पेट भरता है।
जब बार-बार की शिकायतों का कोई ठोस नतीजा नहीं निकला, तो उनके पास प्रदर्शन के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा। सोमवार को इकट्ठा होकर उन्होंने अपनी बात जोर-शोर से सबके सामने रखी।
इन कर्मियों का कहना है कि वे इस बात से और भी निराश हैं कि उनकी समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। अस्पताल प्रशासन और जिस ठेका एजेंसी के तहत वे काम करते हैं, दोनों ही एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालते रहते हैं।
इस खींचातानी में पीस कौन रहा है? वही गरीब सफाईकर्मी जो दिन-रात अस्पताल की सेवा में लगे हैं। उनका कहना था कि जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्हें मजबूरन यह कदम उठाना पड़ा।
मनोबल टूटा, आगे की रणनीति
सफाईकर्मियों ने कहा कि समय पर वेतन न मिलने से उनका मनोबल टूट रहा है। लगातार सेवा देने के बावजूद जब मेहनत की कमाई नहीं मिलती, तो काम करने की इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है।
उनका कहना था कि इस मानसिक तनाव का असर उनके काम पर भी पड़ रहा है, लेकिन फिर भी वे अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ रहे हैं। उनकी मुख्य मांग है कि उनका लंबित वेतन तत्काल भुगतान किया जाए।
प्रदर्शन के दौरान इन सफाईकर्मियों ने एक कड़ा संदेश भी दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर उनकी मांगों पर जल्द से जल्द ध्यान नहीं दिया गया और उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो वे अपने आंदोलन को और भी व्यापक बनाएंगे।
उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी स्थिति में होने वाले किसी भी अप्रिय घटना या अव्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी संबंधित एजेंसी और प्रशासन की होगी। यानी, अगर उनकी बात नहीं मानी गई, तो आने वाले दिनों में पूर्णिया GMCH में सफाई व्यवस्था पूरी तरह से ठप्प हो सकती है, जिसका सीधा असर मरीजों और अस्पताल की कार्यप्रणाली पर पड़ेगा।
यह खबर यहीं तक है, अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है और कब इन 220 मेहनतकश हाथों को उनका हक मिलता है।

