प्रयागराज: उत्तर प्रदेश पुलिस में एक समय 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' के नाम से मशहूर रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रेम प्रकाश ने सियासत की नई राह पकड़ ली है। जिस भाजपा के साथ वो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जुड़े थे, अब उस पार्टी का दामन छोड़कर उन्होंने चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) का हाथ थाम लिया है। ये फैसला उन्होंने ऐसे वक्त में लिया है जब यूपी की राजनीति में नए समीकरण बनने की अटकलें तेज हैं। प्रयागराज में एडीजी पद से रिटायर हुए इस कड़क अफसर के इस कदम ने कई भौंहें चढ़ा दी हैं।
प्रेम प्रकाश ने सीधे-सीधे ऐलान कर दिया है कि वो 2027 का विधानसभा चुनाव आजाद समाज पार्टी के टिकट पर लड़ेंगे। पार्टी में शामिल होते ही उन्होंने ये भी साफ कर दिया कि प्रदेशभर में संगठन को मजबूत करने में वो पूरी ताकत लगा देंगे।
सोमवार शाम करीब 6 बजे नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद की मौजूदगी में उन्होंने आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) की सदस्यता ली। राजनीति के गलियारों में अब इस बात पर खूब चर्चा हो रही है कि आखिर एक कड़क पुलिस अफसर जिसने कभी यूपी की कानून-व्यवस्था संभाली, अब सियासी रण में कूदकर क्या नया करेगा।
कौन हैं पूर्व IPS प्रेम प्रकाश और कैसा रहा उनका सफर?
दिल्ली के रहने वाले प्रेम प्रकाश 1993 बैच के तेज-तर्रार आईपीएस अफसर हैं। उन्होंने बीटेक जैसी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद पुलिस मैनेजमेंट में एमडी (मास्टर इन डिप्लोमा) का कोर्स भी किया था।
उनका लंबा प्रशासनिक अनुभव रहा है और उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई बड़े और संवेदनशील जिलों में अपनी सेवाएं दी हैं। पुलिस महकमे में उनकी पहचान एक बेहद सख्त और कड़क अधिकारी के रूप में रही है।
उनके करियर के दौरान अपराधियों के खिलाफ ताबड़तोड़ कार्रवाई के चलते उन्हें 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' के तौर पर भी जाना जाता रहा है, जो अपने आप में उनकी कार्यशैली का एक बड़ा प्रमाण है।
अपनी सेवा के दौरान उन्होंने मेरठ, आगरा, मुरादाबाद और कानपुर जैसे जिलों में कानून-व्यवस्था की बागडोर संभाली। ये वो जिले हैं जहां अक्सर चुनौतियां बड़ी होती हैं।
12 जुलाई 2009 को उन्होंने राजधानी लखनऊ में डीआईजी/एसएसपी का पदभार संभाला था, जो उस वक्त एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी। रिटायरमेंट से पहले वो प्रयागराज में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) के पद पर तैनात थे और 31 दिसंबर 2022 को इसी पद से वो सेवानिवृत्त हुए।
कड़क अफसर और 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' की छवि
प्रेम प्रकाश के करियर में कई ऐसे मौके आए जब उनकी सख्ती और फैसले लेने की क्षमता की खूब चर्चा हुई। साल 2019 में जब देश में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) के विरोध में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे थे, तब कानपुर भी इससे अछूता नहीं था।
ऐसे संवेदनशील माहौल में कानपुर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में उन्होंने बेहद अहम भूमिका निभाई थी। उनकी उस वक्त की कार्यशैली ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं और उनकी प्रशंसा भी हुई थी।
कानपुर जोन में उनकी तैनाती के दौरान उनके नेतृत्व में पुलिस ने अपराधियों के खिलाफ करीब 67 मुठभेड़ों को अंजाम दिया था। ये आंकड़े अपने आप में बताते हैं कि उनकी अपराधियों के खिलाफ क्या नीति रही होगी।
इसी वजह से उन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस के उन गिने-चुने अधिकारियों में शुमार किया जाता है, जिनकी गिनती चर्चित 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' के तौर पर होती रही है। उनकी इस छवि ने उन्हें पुलिस महकमे में एक अलग ही पहचान दिलाई।
सियासी गलियारों से रिश्ता: भाजपा में एंट्री और अब आजाद समाज पार्टी का दामन
प्रेम प्रकाश का राजनीतिक गलियारों से रिश्ता भी पुराना रहा है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के शासनकाल के दौरान, जब मायावती मुख्यमंत्री थीं, प्रेम प्रकाश उनके बेहद करीबी और भरोसेमंद अधिकारियों में गिने जाते थे।
कहा जाता है कि मायावती उन पर काफी भरोसा करती थीं। लेकिन, जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार आई, तो उन्हें किनारे कर दिया गया और महत्वपूर्ण पदों से हटाकर अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण भूमिकाओं में रखा गया।
हालांकि, 2017 में जब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, तो प्रेम प्रकाश को फिर से अहम जिम्मेदारियां मिलीं। साल 2024 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले, उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी।
उस समय डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने उन्हें पार्टी में शामिल कराया था। लेकिन, भाजपा में उनकी सक्रिय भूमिका देखने को नहीं मिली और अब वह भारतीय जनता पार्टी से अलग हो गए हैं।
मुख्तार अंसारी केस में भी अहम भूमिका
उनके करियर का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब कुख्यात गैंगस्टर मुख्तार अंसारी को पंजाब की रोपड़ जेल से उत्तर प्रदेश की बांदा जेल लाया जाना था। इस हाई-प्रोफाइल मामले में प्रेम प्रकाश की भूमिका को बेहद अहम माना जाता है।
उस वक्त वे प्रयागराज में एडीजी के पद पर ही तैनात थे और इस पूरे ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम देने में उनकी रणनीति और नेतृत्व की खूब सराहना हुई थी। ये घटना उनकी पेशेवर क्षमता और सरकार के भरोसे का एक और उदाहरण थी।
अब, भाजपा का दामन छोड़कर चंद्रशेखर आजाद के साथ आने का उनका फैसला यूपी की राजनीति में क्या रंग लाएगा, ये तो वक्त ही बताएगा। लेकिन एक बात तय है कि एक कड़क और अनुभवी पूर्व आईपीएस अधिकारी का चुनावी मैदान में उतरना प्रदेश की सियासी हवा में नई हलचल ज़रूर पैदा करेगा।
उनकी नजर 2027 के विधानसभा चुनाव पर है और उन्होंने संगठन को मजबूत करने की बात कहकर अपनी मंशा साफ कर दी है।

