प्रयागराज: कहानी साल 1968-69 के आकलन वर्ष की है, जब देश में कई चीजें करवट ले रही थीं और शायद लोग आज से ज़्यादा जुगाड़ में यकीन रखते थे। इसी दौर में मिर्ज़ापुर का एक मामला है जो अब जाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने ऐसा खुला कि निचली अदालत का एक पुराना फैसला बदल गया। मामला आयकर विभाग और एक व्यापारी के बीच का है, जहाँ 'प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट' का सहारा लेकर दी गई राहत को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। ये फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ा सबक हो सकता है, जो सोचते हैं कि आयकर से जुड़े अपराधों में भी उम्र या पुरानी बातों का हवाला देकर बच निकला जा सकता है। हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि अगर आपने आयकर से जुड़ा कोई अपराध किया है, तो आपको इस राहत वाले कानून का फायदा नहीं मिलेगा।
ये पूरा मामला सिर्फ एक व्यापारी की कहानी नहीं, बल्कि कानून की बारीक पेचीदगियों और समय के साथ बदलते न्याय के सिद्धांतों की एक मिसाल है। सोचिए, 1968-69 में हुए एक अपराध पर, 1982 में निचली अदालत से फैसला आता है, और अब 2024 में हाईकोर्ट उस फैसले को पलट देता है।
इस लंबी कानूनी लड़ाई में क्या हुआ, क्यों हुआ और इसका क्या मतलब है, आइए एक-एक बात समझते हैं।
पुराना मामला, बड़ी गड़बड़
बात शुरू होती है मिर्ज़ापुर से, जहाँ के आयकर अधिकारी ने कमरुद्दीन अंसारी और अजीमुल्लाह अंसारी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। ये दोनों सज्जन भदोही की एक फर्म, 'मेसर्स मोहम्मद इब्राहिम अजीमुल्लाह' के पार्टनर थे।
आरोप कोई छोटा-मोटा नहीं था, बल्कि सीधा-सीधा टैक्स चोरी का था। शिकायत में कहा गया कि इन लोगों ने 26 अक्टूबर 1968 को अपना आयकर विवरणी दाखिल करते हुए 1,15,470 रुपये की आय छिपाई थी।
ये पैसा उन्हें 'मेसर्स दामोदर दास एंड अदर्स' नाम की फर्म से मिला था। उस दौर में सवा लाख रुपये की ये रकम आज के करोड़ों के बराबर मानी जा सकती है।
आयकर विभाग को लगा कि ये साफ तौर पर इनकम टैक्स एक्ट की धारा 277 का उल्लंघन है, जिसमें गलत स्टेटमेंट या गलत जानकारी देने पर सज़ा का प्रावधान है।
अदालती पेच और एक आरोपी का निधन
मामले की सुनवाई शुरू हुई। लेकिन कानूनी प्रक्रियाएं अक्सर लंबी होती हैं और कभी-कभी तो इतनी लंबी कि सुनवाई पूरी होने से पहले ही कहानी में ट्विस्ट आ जाते हैं।
इस मामले में भी यही हुआ। जब केस चल रहा था, तभी आरोपी अजीमुल्लाह अंसारी का निधन हो गया।
अब मुकदमा सिर्फ कमरुद्दीन अंसारी के खिलाफ चलता रहा। कमरुद्दीन अंसारी ने बाद में अपने अपराध को स्वीकार कर लिया।
उन्होंने अदालत को बताया कि 50,810 रुपये की राशि हाईकोर्ट के एक आदेश से पहले ही कम कर दी गई थी, और बची हुई 61,460 रुपये की राशि पर उन्होंने अपना कर और जुर्माना, दोनों जमा कर दिए थे। अपराध स्वीकार करना अक्सर सजा में नरमी की उम्मीद जगाता है, और इस मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ।
निचली अदालत की नरमी और 'प्रोबेशन एक्ट' का सहारा
करीब डेढ़ दशक बाद, 28 अप्रैल 1982 को, मिर्ज़ापुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) ने इस मामले में अपना फैसला सुनाया। उन्होंने कमरुद्दीन अंसारी को आयकर अधिनियम की धारा 277 के तहत दोषी करार दिया।
यानी, ये साफ हो गया कि उन्होंने आय छिपाई थी और टैक्स चोरी की थी। लेकिन, यहाँ से कहानी में वो मोड़ आया, जिस पर बाद में हाईकोर्ट ने सवाल उठाए।
निचली अदालत ने कमरुद्दीन अंसारी को दोषी तो ठहराया, पर उन्हें सीधे जेल भेजने की बजाय 'प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट' के तहत रिहा कर दिया। इस एक्ट का मकसद छोटे-मोटे अपराधों में पहली बार दोषी पाए जाने वाले अपराधियों को जेल भेजने की बजाय समाज में सुधार का मौका देना होता है।
CJM ने अपने फैसले में कुछ वजहें बताईं: पहला, मामला बहुत पुराना हो चुका था (करीब 14 साल पुरानी बात); दूसरा, आरोपी के पिता का निधन हो चुका था; और तीसरा, उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था। इन मानवीय आधारों पर निचली अदालत ने कमरुद्दीन को एक तरह से राहत दे दी।
आयकर विभाग को नागवार गुज़रा ये फैसला
हालांकि, मिर्ज़ापुर के आयकर अधिकारी को निचली अदालत का ये फैसला बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्हें लगा कि आयकर अधिनियम के तहत किए गए गंभीर अपराधों में इस तरह की नरमी का कोई मतलब नहीं है।
इसलिए, उन्होंने तुरंत इस आदेश को चुनौती देने का फैसला किया और इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर दी। आयकर विभाग की तरफ से अधिवक्ता अभिषेक शुक्ला ने अपना पक्ष रखा।
उन्होंने कोर्ट को समझाया कि आयकर अधिनियम की धारा 292ए इस मामले में बहुत साफ है। ये धारा कहती है कि इस अधिनियम के तहत दोषी पाए गए किसी भी व्यक्ति पर धारा 360 सीआरपीसी (दंड प्रक्रिया संहिता) या 'प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट' लागू नहीं होगा।
इस नियम का एक ही अपवाद है - अगर दोषी व्यक्ति 18 साल से कम उम्र का हो। और इस मामले में कमरुद्दीन अंसारी निश्चित रूप से 18 साल से ऊपर थे, क्योंकि यह अपराध 1968-69 का है और फैसला 1982 में आया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का सहारा
आयकर विभाग के वकील ने अपनी बात को और मज़बूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का भी हवाला दिया। उन्होंने माननीय सुप्रीम कोर्ट के 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम ममता सेठी' और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के 'कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स बनाम ओंकार नाथ' जैसे मामलों का जिक्र किया।
इन फैसलों में भी ठीक इसी तरह के सिद्धांत स्थापित किए गए थे कि आयकर से जुड़े अपराधों में 'प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट' का लाभ नहीं दिया जा सकता। इन नज़ीरों ने आयकर विभाग के तर्क को और भी पुख्ता बना दिया।
सुनवाई के दौरान एक और बात हुई, प्रतिवादी कमरुद्दीन अंसारी की तरफ से कोई भी कोर्ट में पेश नहीं हुआ, जबकि उन्हें सूचना दी गई थी। ऐसे में मामले की सुनवाई एकतरफा तरीके से हुई, यानी हाईकोर्ट ने सिर्फ अपीलकर्ता (आयकर विभाग) का पक्ष सुना।
हाईकोर्ट का दो टूक फैसला: निचली अदालत का आदेश रद्द
न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की पीठ ने पूरे मामले पर गौर किया। उन्होंने पाया कि मिर्ज़ापुर की निचली अदालत ने आयकर अधिनियम की धारा 292ए में दिए गए स्पष्ट प्रतिबंध को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया था।
ये वो धारा है जो साफ-साफ कहती है कि आयकर अपराधों में प्रोबेशन एक्ट लागू नहीं होगा। निचली अदालत ने मानवीय आधारों पर जो नरमी दिखाई थी, वो आयकर अधिनियम के विशेष प्रावधानों के आगे टिक नहीं पाई।
हाईकोर्ट ने इसे एक बड़ी चूक मानते हुए, 28 अप्रैल 1982 को निचली अदालत द्वारा पारित आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया।
अपील स्वीकार करते हुए, हाईकोर्ट ने संबंधित अदालत को ये निर्देश भी दिया कि वह इस मामले पर नए सिरे से आदेश पारित करे। ये नया आदेश सिर्फ सजा के बिंदु पर होना चाहिए।
साथ ही, हाईकोर्ट ने निचली अदालत को ये भी सुनिश्चित करने को कहा कि दोनों पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाए। इसका मतलब है कि अब कमरुद्दीन अंसारी को अपनी सजा का सामना फिर से करना पड़ सकता है, और इस बार शायद उन्हें 'प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट' की वो राहत नहीं मिलेगी।
ये फैसला दिखाता है कि कानून की नज़र में हर अपराध के अपने नियम होते हैं, और कुछ खास कानूनों के तहत किए गए अपराधों में सामान्य राहत के प्रावधान लागू नहीं होते।




































