प्रयागराज: गंगा किनारे बसी पवित्र धरती प्रयागराज, जहां सदियों से शिक्षा और संस्कृति का संगम होता रहा है। इसी शहर के छोटा बघाड़ा इलाके में, धरहरिया नाम की एक बस्ती है। यहां अमूमन दोपहर में बच्चे खेलने कूदने में लगे रहते हैं, लेकिन पिछले चार दिनों से इस बस्ती में एक अलग ही रौनक थी। शोर-शराबा तो था, पर वो किसी झगड़े का नहीं, बल्कि बच्चों की हंसी, उनके सीखने और कुछ नया करने की उमंग का था। ये रौनक लेकर आया था ‘दिशा छात्र संगठन’ का ‘बाल सृजनात्मक शिविर’। शनिवार की शाम जब ये चार दिवसीय शिविर खत्म हुआ, तो माहौल में एक हल्की उदासी थी, लेकिन बच्चों की आँखों में भविष्य के सपने और कुछ कर दिखाने का जज्बा साफ दिख रहा था। ये सिर्फ एक शिविर नहीं था, ये एक कोशिश थी बच्चों की रचनात्मकता को पंख देने की और उनके भीतर तार्किकता का बीज बोने की।
शिविर का मुख्य मकसद बच्चों के भीतर छिपी क्रिएटिविटी को बाहर निकालना और उन्हें तार्किक सोच वाला व्यक्तित्व देना था। आजकल की दुनिया में जहां मोबाइल स्क्रीन और टीवी की चमक बच्चों की आंखों पर कब्ज़ा कर रही है, ऐसे में दिशा छात्र संगठन ने तय किया कि वे बच्चों को कुछ ऐसा देंगे जो उनकी कल्पनाओं को उड़ान दे, उन्हें सोचने पर मजबूर करे और उन्हें समाज से जोड़े।
इस शिविर में बच्चों को सिर्फ मनोरंजन नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें ऐसी चीजें सिखाई गईं जो उनके पूरे व्यक्तित्व को गढ़ने में मदद करें।
पिछले चार दिनों में, सुबह से शाम तक बच्चों ने यहां कई चीजें सीखीं – कुछ ऐसी, जो उन्हें स्कूल की किताबों में शायद ही मिलें। कहानी सुनाने की कला से लेकर नुक्कड़ नाटक के जरिए अपनी बात कहने तक, कविताएं लिखने और पढ़ने से लेकर अपने विचारों को भाषण का रूप देने तक।
इन बच्चों के लिए ये किसी जादुई पाठशाला से कम नहीं था, जहां हर दिन एक नई चुनौती और एक नया पाठ होता था। संगठन के कार्यकर्ताओं ने बड़ी मेहनत और लगन से बच्चों को हर एक एक्टिविटी में शामिल किया, ताकि हर बच्चे को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले।
बाल कलाकारों का रंगमंच और देशभक्ति का जज्बा
समापन समारोह का दिन था। छोटा बघाड़ा का धरहरिया इलाका आज पूरी तरह उत्सव के रंग में रंगा हुआ था।
बच्चों के अभिभावक, मोहल्ले के लोग और दिशा छात्र संगठन के कार्यकर्ता, सभी बड़ी संख्या में मौजूद थे। मंच तैयार था और दर्शक दीर्घा में हर कोई अपने बच्चों को देखने को आतुर था।
कार्यक्रम की शुरुआत एक ऐसे गीत से हुई, जिसने हर दिल में देशभक्ति का जोश भर दिया – "मेरा रंग दे बसंती चोला"। बच्चों ने जब एक सुर में ये गीत गाया, तो पूरे माहौल में ऊर्जा भर गई।
उन छोटी-छोटी आवाजों में एक ऐसी ताकत थी, जो सुनने वाले को भावुक कर गई।
इसके बाद एक-एक करके बच्चों ने अपने हुनर का प्रदर्शन करना शुरू किया। किसी ने धाराप्रवाह भाषण दिया, जिसमें आत्मविश्वास साफ झलक रहा था।
किसी ने अपने नन्हे कदमों से ऐसी नृत्य प्रस्तुति दी कि सभी वाह-वाह करने लगे। वहीं, कई बच्चों ने अपनी लिखी या याद की हुई कविताएं सुनाईं, जिनमें उनके मासूम मन के विचार और कल्पनाएं गूंज रही थीं।
अभिभावक अपने बच्चों को मंच पर देखकर फूले नहीं समा रहे थे। उनकी आँखों में गर्व और खुशी के आंसू साफ देखे जा सकते थे।
यह सब चार दिन की कड़ी मेहनत और दिशा छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों का ही नतीजा था।
'देश को आगे बढ़ाओ' नुक्कड़ नाटक: भ्रष्टाचार पर बच्चों का वार
कार्यक्रम का सबसे खास और शायद सबसे प्रभावशाली हिस्सा था नुक्कड़ नाटक 'देश को आगे बढ़ाओ'। ये नाटक बच्चों ने खुद तैयार किया था और इसका मंचन भी उन्हीं ने किया।
नाटक का विषय बहुत गंभीर था – समाज में फैला भ्रष्टाचार और नेताओं द्वारा जनता की गाढ़ी कमाई की लूट। इन छोटे बच्चों ने अपनी अदाकारी से इन ज्वलंत मुद्दों को इतनी सहजता और मजबूती से उठाया कि बड़े-बड़ों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।
नाटक में दिखाया गया कि कैसे भ्रष्टाचार दीमक की तरह हमारे समाज को खोखला कर रहा है और कैसे आम आदमी इससे जूझ रहा है। बच्चों ने नेताओं के खोखले वादों और उनके कुकर्मों पर तीखा व्यंग्य किया।
उनके संवादों में सच्चाई और गुस्सा था, जो दर्शकों के दिल तक पहुंच रहा था। इस प्रस्तुति ने दिखा दिया कि बच्चे सिर्फ खेलने-कूदने वाले नहीं, बल्कि समाज के प्रति जागरूक और बदलाव लाने की क्षमता रखने वाले भी हो सकते हैं।
मोबाइल की दुनिया से बाहर; तार्किक और संवेदनशील भविष्य की ओर
समापन समारोह में दिशा छात्र संगठन के सदस्य जय ने बच्चों और अभिभावकों को संबोधित किया। उनका संबोधन सिर्फ उपदेश नहीं था, बल्कि एक गहरी चिंता और एक मजबूत उम्मीद का मिश्रण था।
जय ने कहा, "आजकल बच्चे हिंसक फिल्मों, फूहड़ गीतों और मोबाइल गेम्स में घंटों लगे रहते हैं। ये चीजें उनके चरित्र और व्यक्तित्व के विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही हैं।
" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे रचनात्मक प्रयास, जैसे कि यह शिविर, बच्चों के लिए बहुत जरूरी हैं। ये उन्हें एक बेहतर और सकारात्मक माहौल देते हैं, जहां वे कुछ सीख सकें, कुछ गढ़ सकें और अपनी पहचान बना सकें।
जय ने आगे बताया कि दिशा छात्र संगठन का उद्देश्य केवल मनोरंजन देना नहीं है, बल्कि बच्चों में कुछ बुनियादी मानवीय मूल्यों को विकसित करना है। इन मूल्यों में तार्किकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, न्यायप्रियता और संवेदनशीलता शामिल हैं।
संगठन का मानना है कि आज के बच्चों को सिर्फ अच्छे नंबर लाने की मशीन नहीं बनना चाहिए, बल्कि उन्हें ऐसा इंसान बनना चाहिए जो सवाल पूछ सके, सही-गलत का फर्क समझ सके और दूसरों के प्रति सहानुभूति रख सके। जब बच्चे तार्किक होंगे, तभी वे किसी भी बात को आँख मूंदकर स्वीकार नहीं करेंगे।
जब उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण होगा, तभी वे अंधविश्वासों से दूर रहेंगे। और जब वे न्यायप्रिय व संवेदनशील होंगे, तभी वे एक बेहतर समाज के निर्माण में अपना योगदान दे पाएंगे।
इस संबोधन के बाद, सभी बच्चों को शिविर में उनकी सक्रिय भागीदारी के लिए प्रमाणपत्र वितरित किए गए। बच्चों के चेहरों पर इन प्रमाणपत्रों को पाने की खुशी साफ झलक रही थी।
अभिभावकों ने भी दिशा छात्र संगठन के प्रयासों की खूब सराहना की। इस पूरे चार दिवसीय आयोजन को सफल बनाने में दिशा छात्र संगठन के कार्यकर्ता अमन, जय, सौम्या, टिया, ऐंजल, प्रियांशी, गौरी, चंद्र प्रकाश और अनुराग ने दिन-रात एक कर दिया था।
उनकी अथक मेहनत और लगन के बिना यह शिविर इतना सफल नहीं हो पाता। जब शाम ढली और धरहरिया की बस्ती में शिविर की चहल-पहल शांत हुई, तो पीछे छूट गए थे बच्चों के मन में बोए गए नए सपने और एक बेहतर कल की उम्मीद।


































