प्रयागराज: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU), देश के उन चुनिंदा प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक है, जहाँ डॉक्टर बनना और पढ़ाना दोनों ही बड़े सम्मान की बात मानी जाती है। चिकित्सा शिक्षा और रिसर्च के क्षेत्र में इसकी अपनी एक अलग पहचान है। लेकिन आजकल इसी विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल अस्पताल में मेडिकल सुपरिंटेंडेंट (MS) पद की भर्ती प्रक्रिया पर एक ऐसा ग्रहण लग गया है, जिसने यहाँ की पारदर्शिता और नियमावली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप इतने गंभीर हैं कि अगर वे सही साबित हुए, तो एक नहीं, बल्कि कई नियमों और स्थापित प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ती दिखेंगी। मामला अब सीधे इलाहाबाद हाई कोर्ट तक जा पहुँचा है और फिलहाल सबकी निगाहें न्यायपालिका पर टिकी हैं कि इस पूरे विवाद पर क्या रुख अपनाया जाता है।
दरअसल, MS का पद किसी भी अस्पताल में रीढ़ की हड्डी के समान होता है। यह सिर्फ़ एक प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि अस्पताल के सुचारू संचालन, मरीज़ों की बेहतर देखभाल, स्टाफ के समन्वय और भविष्य की योजनाओं को आकार देने वाला एक अहम ओहदा है।
ऐसे में इस पद पर किसी अनुभवी और योग्य व्यक्ति की नियुक्ति न केवल अस्पताल की कार्यप्रणाली के लिए, बल्कि वहाँ इलाज कराने वाले हज़ारों मरीज़ों और पूरे विश्वविद्यालय की साख के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। यही वजह है कि जब इसकी भर्ती प्रक्रिया पर गड़बड़ी के आरोप लगे, तो हंगामा होना लाज़मी था।
यह पूरा विवाद तब खड़ा हुआ, जब छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी ने इस भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की। उनकी याचिका में सीधे तौर पर आरोप लगाया गया है कि विश्वविद्यालय ने इस महत्त्वपूर्ण पद के लिए विज्ञापन में जो शर्तें रखी थीं, उन्हें खुद ही दरकिनार कर दिया।
विज्ञापन में स्पष्ट रूप से यह अनिवार्य पात्रता निर्धारित की गई थी कि MS पद के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थी के पास 300 या उससे अधिक बेड वाले किसी बड़े अस्पताल में वरिष्ठ पद पर न्यूनतम 7 वर्ष का व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए। यह कोई 'हो तो अच्छा' वाली वांछनीय योग्यता नहीं थी, बल्कि इसे 'आवश्यक योग्यता' (Mandatory Eligibility) की श्रेणी में रखा गया था, जिसका मतलब है कि इसके बिना आवेदन वैध ही नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन याचिका के मुताबिक, विश्वविद्यालय ने इस अनिवार्य शर्त की अनदेखी की है। आरोप है कि शॉर्टलिस्ट किए गए कुल 14 अभ्यर्थियों में से ज़्यादातर के पास ऐसा स्पष्ट और अपेक्षित अनुभव नहीं है।
इसके बजाय, विश्वविद्यालय ने एक चाल चली और विभागाध्यक्ष (HoD), नोडल अधिकारी या प्रोफेसर इंचार्ज के तौर पर किए गए काम के अनुभव को ही पूरे अस्पताल के प्रशासन के समकक्ष मान लिया। अब ज़रा सोचिए, एक विभाग का मुखिया होना और पूरे मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल की जटिल प्रशासनिक व्यवस्था को संभालना, क्या ये दोनों अनुभव एक ही हो सकते हैं? अस्पताल प्रशासन की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ डॉक्टर्स और मरीज़ों तक सीमित नहीं होती, इसमें पैरामेडिकल स्टाफ, नर्स, विभिन्न विभागों का समन्वय, उपकरण ख़रीद, बजट प्रबंधन, आपातकालीन सेवाओं का संचालन और व्यापक गुणवत्ता नियंत्रण शामिल होता है, जिसके लिए एक वृहद और विशिष्ट अनुभव की आवश्यकता होती है।
चयन प्रक्रिया पर सवाल और आंतरिक उम्मीदवारों को तरजीह
याचिका में केवल अनुभव की अनदेखी का ही आरोप नहीं है, बल्कि चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। मृत्युंजय तिवारी की याचिका में कहा गया है कि शॉर्टलिस्ट किए गए कुल 14 उम्मीदवारों में से 13 तो BHU के ही 'अपने लोग' यानी आंतरिक (इन-हाउस) अभ्यर्थी हैं।
यह आँकड़ा अपने आप में नियमों में शिथिलता बरतने और 'अंदरूनी' लोगों को तरजीह देने की ओर साफ-साफ इशारा करता है, जिससे बाहरी योग्य उम्मीदवारों के लिए प्रतिस्पर्धा का मैदान असमान हो गया। यदि ऐसा ही होना था, तो बाहर के उम्मीदवारों के लिए विज्ञापन निकालने का औचित्य ही क्या था?
इससे भी बढ़कर, याचिका में यह भी कहा गया है कि यह पूरी भर्ती प्रक्रिया राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के नियामक ढाँचे का सीधा उल्लंघन है। साथ ही, यह भारत सरकार और BHU के बीच हुए एक महत्वपूर्ण 'त्रिपक्षीय समझौते' का भी उल्लंघन है।
इस समझौते के तहत IMS-BHU को एम्स (AIIMS) मॉडल पर विकसित किया जाना था, ताकि इसकी पहचान और गुणवत्ता देश के शीर्ष चिकित्सा संस्थानों जैसी हो सके। यदि नियुक्तियों में ही ऐसे समझौते और नियमों का उल्लंघन होगा, तो 'एम्स मॉडल' का सपना कैसे साकार हो पाएगा और BHU अपनी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय साख कैसे बरकरार रख पाएगा?
याचिकाकर्ता मृत्युंजय तिवारी ने अपने दायर किए गए मामले में तर्क दिया है कि विज्ञापन में साफ-साफ शर्तें निर्धारित होने के बावजूद, बाद में उन्हें नज़रअंदाज़ करना 'चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियम बदलने' जैसा है, जो न्याय और पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट से इस पूरी भर्ती प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा करने और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की गुहार लगाई है।
अब सबकी निगाहें हाई कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है – क्या BHU को अपनी प्रक्रिया में सुधार करने का आदेश मिलेगा, या फिर अदालत इस याचिका को खारिज कर देगी? आने वाले समय में ये तय हो पाएगा कि योग्यता और नियमों का राज चलता है, या फिर कुछ और ही पैमाने कायम रहते हैं।




































