नोएडा: अक्सर हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इतने मशगूल रहते हैं कि हमें आस-पास क्या चल रहा है, इसका ठीक से अंदाजा भी नहीं होता। लेकिन कभी-कभी कुछ कहानियां इतनी सीधी और सच्ची होती हैं कि वो दिल को छू जाती हैं और सोचने पर मजबूर कर देती हैं। ऐसी ही एक कहानी आजकल सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है, जो नोएडा में सामने आई है। ये कहानी सिर्फ एक डिलीवरी पार्टनर की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की पोल खोलती है, जहां अनुभवी होने के बावजूद एक उम्र के बाद नौकरी बचाना मुश्किल हो जाता है।
बात एक ऐसे 56 साल के शख्स की है, जिनकी पूरी जिंदगी कॉर्पोरेट ऑफिस की फाइलों और मीटिंग्स में गुजर गई। उन्होंने एक प्रतिष्ठित कंपनी में 14 साल तक जी-जान लगाकर काम किया, लेकिन अचानक एक दिन उन्हें बताया गया कि अब उनकी जरूरत नहीं है।
कल्पना कीजिए, पचास के पार की उम्र में जब परिवार की जिम्मेदारियां सबसे ज्यादा होती हैं, तब आपकी नौकरी छिन जाए तो कैसा महसूस होगा? ये कहानी उस शख्स की है, जिसने हार नहीं मानी और आज वो लोगों के घर-घर पैकेट पहुंचाकर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहा है।
ये पूरा मामला तब सामने आया जब सोशल एंटरप्रेन्योर किरण वर्मा ने अपने लिंक्डइन अकाउंट पर इस दिल को झकझोर देने वाली मुलाकात का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कैसे एक अर्जेंट लेटर भेजने के लिए उन्होंने सिर्फ 40 रुपये में पोर्टर (Porter) की डिलीवरी सेवा ली थी।
उन्हें लगा था कि ये एक आम डिलीवरी होगी, जैसी रोज होती हैं। लेकिन उस दिन जो उनके दरवाजे पर आया, वो सिर्फ एक डिलीवरी पार्टनर नहीं था, बल्कि वो एक ऐसी कहानी का जीता-जागता सबूत था, जो आज के दौर में कई लोगों की हकीकत है।
जब सीढ़ियां चढ़कर आया अनुभव?
किरण वर्मा बताते हैं कि जब डिलीवरी पार्टनर उनके घर पैकेट लेने आया, तो उन्होंने देखा कि वो एक उम्रदराज शख्स था। किरण फर्स्ट फ्लोर पर रहते हैं और तुरंत नीचे नहीं जा सकते थे, इसलिए उन्होंने डिलीवरी पार्टनर को ऊपर आने के लिए कहा।
धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ते हुए वो बुजुर्ग शख्स उनके पास पहुंचा। उनकी चाल में थोड़ी थकावट तो थी, लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी।
किरण ने उन्हें पानी के लिए पूछा, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया और मुस्कुराते हुए पैकेट थमा दिया।
किरण को उनकी बातचीत का तरीका और उनका पहनावा काफी प्रोफेशनल लगा। आमतौर पर डिलीवरी वाले इतनी अच्छी तरह से बात नहीं करते, लेकिन इस शख्स की पर्सनालिटी कुछ अलग थी।
इसी वजह से किरण ने पैकेट लेने के बाद उन्हें वापस बुलाया और कुछ देर बैठकर बातचीत करने के लिए कहा। शायद किरण को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनकी यह छोटी सी बातचीत उन्हें जीवन के एक ऐसे मोड़ पर ले जाएगी, जहां से समाज और रोजगार की कई परतें खुल जाएंगी।
डिलीवरी पार्टनर ने किरण से कहा, "आज काम ही नहीं था, मैं काम का इंतजार कर रहा था।" ये लाइन छोटी थी, लेकिन इसमें बेरोजगारी और एक मजबूत इंसान की काम करने की चाहत साफ झलक रही थी।
किरण ने उनसे और बातें पूछीं, तब जाकर पता चला कि उनका नाम मनोज है और उनकी उम्र 56 साल है। वो नोएडा के ही रहने वाले हैं और अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट सेक्टर को दे चुके हैं।
14 साल की नौकरी, फिर 'करी पत्ता' वाली बात?
मनोज ने किरण वर्मा को बताया कि साल 2023 में उन्हें छंटनी का सामना करना पड़ा था। इससे पहले, वो लगभग 14 साल तक टाटा एआईए लाइफ इंश्योरेंस (Tata AIA Life Insurance) के प्रशासन (Administration) विभाग में काम करते रहे थे।
सोचिए, एक शख्स जिसने अपनी जिंदगी के इतने महत्वपूर्ण साल एक कंपनी को दिए, अचानक उसे कह दिया गया कि अब उसकी जरूरत नहीं है। यह सुनकर कोई भी इमोशनल हो सकता है, और किरण वर्मा भी इस बातचीत के दौरान काफी भावुक हो गए।
जब किरण ने उनसे इस छंटनी के बारे में और पूछा, तो मनोज ने एक ऐसी बात कही जिसने सबकी आंखें खोल दीं। उन्होंने एक शानदार उदाहरण देते हुए कहा, "बेटा, जब सब्जी बनती है तो करी पत्ता सबसे पहले डाला जाता है, लेकिन जब सब्जी खाई जाती है तो सबसे पहले करी पत्ता ही निकाल दिया जाता है।
" ये बात सिर्फ मनोज की नहीं, बल्कि उन हजारों अनुभवी कर्मचारियों की कहानी कहती है, जिनकी जरूरत काम के दौरान तो होती है, लेकिन बाद में अक्सर उन्हें 'करी पत्ते' की तरह अलग कर दिया जाता है।
इस उम्र में नौकरी ढूंढना किसी बड़े चैलेंज से कम नहीं होता। मनोज ने बताया कि नौकरी जाने के बाद उन्होंने कई जगह हाथ-पैर मारे, इंटरव्यू दिए, लेकिन बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य से जुड़ी छोटी-मोटी परेशानियों की वजह से उन्हें कोई नई नौकरी नहीं मिल सकी।
यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर में उम्रदराज लोगों के लिए नए अवसर मिलना कितना मुश्किल होता जा रहा है। कंपनियां अक्सर युवा और कम अनुभवी लोगों को प्राथमिकता देती हैं, भले ही उनमें अनुभव की कमी क्यों न हो।
क्या 'गिग इकोनॉमी' ही आखिरी सहारा है?
मनोज जैसे लाखों लोग हैं जो उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां उन्हें काम की सबसे ज्यादा जरूरत है, लेकिन सिस्टम उन्हें दरकिनार कर देता है। ऐसे में 'गिग इकोनॉमी' (Gig Economy) ही उनका आखिरी सहारा बनती है।
पोर्टर, जोमैटो, स्विगी या उबर जैसी कंपनियां इन लोगों को कुछ हद तक सहारा तो देती हैं, लेकिन क्या यह उनके 14 साल के कॉर्पोरेट अनुभव के साथ न्याय है? क्या यह उनके सम्मान के लिए सही है?
मनोज का उदाहरण बताता है कि कैसे अनुभवी और मेहनती लोग भी रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका यह जज्बा कि "काम ही नहीं था, मैं काम का इंतजार कर रहा था" साफ दिखाता है कि वो किसी से कोई सहानुभूति नहीं चाहते, बस काम करना चाहते हैं।
समाज को इस बात पर गौर करना चाहिए कि आखिर क्यों इतनी मेहनत और अनुभव के बाद भी लोगों को ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। क्या कॉर्पोरेट सेक्टर को अपनी नीतियों पर दोबारा सोचने की जरूरत नहीं है?
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जिंदगी सिर्फ बड़े पैकेज और ऊंची पोस्ट तक ही सीमित नहीं है। इसमें संघर्ष है, सम्मान है और हर दिन पेट भरने की जद्दोजहद भी है।
मनोज की कहानी ने न सिर्फ किरण वर्मा को इमोशनल किया, बल्कि हजारों सोशल मीडिया यूजर्स को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारे समाज में अनुभव का क्या मोल रह गया है। यह कहानी एक सवाल बनकर खड़ी है, जिसका जवाब हम सभी को मिलकर खोजना होगा।




































