लंदन: सोचिए, कोई प्रोजेक्ट ऐसा हो कि उसे लोकल अथॉरिटी से मंजूरी लेने की जरूरत ही न पड़े, सीधे केंद्र सरकार से हरी झंडी मिल जाए! जी हां, ऐसा ही कुछ धांसू फैसला ब्रिटिश सरकार ने डेटा सेंटरों को लेकर लिया है। अब डेटा सेंटरों को 'राष्ट्रीय महत्व' यानी 'नेशनल इंपोर्टेंस' का दर्जा मिल पाएगा, जिसका मतलब है कि वे स्थानीय बिल्डिंग रेगुलेशंस और काउंसिल की निगरानी से बच सकते हैं।
ये सब मुमकिन हुआ है 'नेशनली सिग्निफिकेंट इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स' (NSIP) स्कीम के तहत। पहले ये स्टेटस सिर्फ बिजली उत्पादन, सड़कें, रेलवे और समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली केबल्स जैसी बेहद जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को मिलता था।
अब डेटा सेंटरों के लिए भी रास्ता साफ कर दिया गया है।
इतना ही नहीं, ब्रिटिश सरकार ने इस महीने से लागू होने वाले एक नए कानून में, NSIP परियोजनाओं के लिए प्री-एप्लीकेशन कंसल्टेशन की कानूनी जरूरत को भी खत्म कर दिया है। इससे आवेदनों पर कार्रवाई का समय एक साल तक कम हो सकता है।
यानी, डेटा सेंटरों के लिए काम फटाफट होगा, बिना ज्यादा रोक-टोक के।
तो आखिर डेटा सेंटरों को ये 'स्पेशल स्टेटस' क्यों?
सरकार का तर्क है कि नई टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते दौर में डेटा सेंटरों की भूमिका बहुत अहम हो गई है। इन्हें जल्द से जल्द तैयार करना जरूरी है, ताकि देश टेक्नोलॉजी के रेस में पीछे न रह जाए।
एक तरह से यह भविष्य की तैयारी है।
बता दें कि अमेरिका में डेटा सेंटरों को लेकर स्थानीय स्तर पर काफी विरोध देखा गया है। वहां अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट्स लोकल विरोध की वजह से अटके पड़े हैं।
ब्रिटिश सरकार शायद ऐसे हालात से बचना चाहती है, इसीलिए उसने ये 'फास्ट-ट्रैक' रास्ता निकाला है। इसका मकसद है कि डेटा सेंटरों का निर्माण तेज़ी से हो, बिना किसी लोकल अड़चन के।
एक और बड़ी बात ये है कि सरकार यूके को नई टेक्नोलॉजीज का हब बनाना चाहती है। देश भर में 'रीजनल साइबर हब' बनाए जा रहे हैं, जैसे कि चेल्टेनहैम का साइबर हब, जिसे सरकारी संचार मुख्यालय (GCHQ) के पास रणनीतिक रूप से स्थापित किया गया है।
ये सब नवाचार, विकास और टैलेंट को बढ़ावा देने के लिए है। डेटा सेंटरों को 'राष्ट्रीय महत्व' का दर्जा देना इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है।
लेकिन क्या हर डेटा सेंटर को ये दर्जा मिल जाएगा?
अब सवाल उठता है कि क्या कोई भी डेटा सेंटर ये 'राष्ट्रीय महत्व' वाला दर्जा ले सकता है? फिलहाल, इस बारे में कोई आधिकारिक गाइडेंस नहीं है कि किस डेटा सेंटर को NSIP माना जाएगा। यह पूरी तरह से सरकार के विवेक पर निर्भर करेगा।
लॉ फर्म वोम्बल बॉन्ड डिकिंसन ने 'द रजिस्टर' से बात करते हुए बताया कि, “डेटा सेंटरों को अपने आप NSIP के रूप में मंजूरी नहीं मिलेगी। बल्कि, NSIP व्यवस्था डेवलपर्स के लिए एक 'ऑप्ट-इन' आधार पर काम करती है।
” इसका मतलब है कि डेवलपर्स को खुद आवेदन करना होगा।
फर्म ने आगे कहा, “एक डेटा सेंटर प्रोजेक्ट को NSIP व्यवस्था में तभी डायरेक्ट किया जा सकता है जब राज्य सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) इसे राष्ट्रीय महत्व का मानते हों और वे प्लानिंग एक्ट 2008 की धारा 35 के तहत निर्धारित वैधानिक परीक्षणों को पूरा करते हों।” यानी, मामला सिर्फ आवेदन करने भर से नहीं सुलझेगा, बल्कि सरकार को भी उसमें 'राष्ट्रीय महत्व' दिखना चाहिए।
कुल मिलाकर, सरकार का यह फैसला साफ तौर पर दिखाता है कि वह डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर को कितनी प्राथमिकता दे रही है। यह कदम निश्चित रूप से देश में 'एआई ग्रोथ ज़ोन' के निर्माण को तेज़ करेगा और ब्रिटेन को टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में और भी मजबूत बनाएगा।



































