दिल्ली-एनसीआर: जब कोई आम आदमी अपने खून-पसीने की कमाई से घर का सपना देखता है, तो उसकी उम्मीदें सिर्फ एक छत तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि वो अपना भविष्य और अपने बच्चों का कल देखता है। लेकिन सोचिए, अगर वही सपना एक झटके में चकनाचूर हो जाए, तो क्या होगा? कुछ ऐसा ही बड़ा एक्शन केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दिल्ली-एनसीआर में लिया है, जहां बड़े-बड़े बिल्डरों के खिलाफ ताबड़तोड़ छापेमारी हुई है।
मामला करोड़ों की धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग का है, जिसमें हजारों होमबायर्स के साथ कथित तौर पर धोखा हुआ है। बुधवार, 8 जुलाई 2026 को ED की दिल्ली जोनल ऑफिस (DLZO-I) की टीमों ने दिल्ली-एनसीआर के 5 ठिकानों पर एक साथ छापा मारा।
ये छापेमारी ऐसे समय हुई है, जब घर खरीदारों का सब्र जवाब दे चुका था और वे सालों से अपने आशियाने का इंतज़ार कर रहे थे।
जांच एजेंसी के अधिकारियों ने बिल्डरों के दफ्तरों और उनसे जुड़े लोगों के ठिकानों पर ताले तोड़े और घंटों तक कागजात खंगाले। बता दें, ये कार्रवाई होमबायर्स के साथ हुई धोखाधड़ी, पैसों के गोलमाल यानी फंड डायवर्जन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े तीन अलग-अलग मामलों की जांच के सिलसिले में की गई है।
मतलब साफ है कि ED इन बिल्डरों के पूरे खेल को समझना चाहती है कि आखिर होमबायर्स का पैसा कहां गया और कैसे उसे इधर-उधर किया गया?
किन बिल्डरों पर ED का शिकंजा कस रहा है?
CNBC Awaaz की एक रिपोर्ट में इस कार्रवाई से जुड़े कुछ बड़े नाम सामने आए हैं। ED के अनुसार, जिन प्रमुख रियल एस्टेट कंपनियों और उनसे जुड़े लोगों पर जांच की तलवार लटकी है, उनमें M/s CHD Developers Ltd, M/s Ninex Developers Ltd और M/s Manju J Homes (India) Ltd शामिल हैं।
इनके अलावा, कुछ अज्ञात आरोपी और कंपनियों के निदेशक भी ED की रडार पर हैं। ये वो कंपनियां हैं, जिन पर हजारों घर खरीदारों के साथ वित्तीय धोखाधड़ी का आरोप है और अब केंद्रीय एजेंसी इसकी बारीकी से जांच कर रही है।
सोचिए, कितने होमबायर्स ने इन कंपनियों पर भरोसा किया होगा, अपनी जिंदगी भर की कमाई लगाई होगी, शायद कर्ज भी लिया होगा, और अब उनकी मेहनत की कमाई पर सवाल खड़ा हो गया है।
‘नो ईएमआई टिल पजेशन’ स्कीम का पूरा खेल क्या था?
जांच एजेंसियों के मुताबिक, इन बिल्डरों ने भोले-भाले खरीदारों को फंसाने के लिए एक ऐसा जाल बुना, जो सुनने में तो बड़ा आकर्षक लगता था। इन्होंने ‘No EMI Till Possession’ (पजेशन मिलने तक कोई EMI नहीं) और ‘Subvention Scheme’ जैसी लुभावनी योजनाएं चला रखी थीं।
इन स्कीम्स के तहत लोगों को बैंकों से होम लोन लेकर फ्लैट बुक कराने के लिए मोटिवेट किया गया। बिल्डरों ने वादा किया कि जब तक उन्हें फ्लैट का कब्जा नहीं मिल जाता, तब तक ईएमआई की टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है।
अब हुआ ये कि खरीदारों ने बैंकों से लोन लिया और प्रोजेक्ट्स में पैसा लगा दिया। लेकिन सालों बीत गए, ना फ्लैट का कब्जा मिला और ना ही ईएमआई का झंझट खत्म हुआ।
नतीजा क्या हुआ? हजारों परिवारों पर एक नहीं, बल्कि दोहरी मार पड़ गई। एक तरफ बैंक की ईएमआई भरनी पड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ किराए के घर में रहने का बोझ भी झेलना पड़ रहा है।
ये स्थिति किसी भी मिडिल क्लास परिवार के लिए किसी बड़े आर्थिक संकट से कम नहीं है। अब आप खुद सोचिए, एक परिवार के लिए अपना घर ना मिलना और साथ ही ईएमआई और किराया दोनों का बोझ उठाना कितना मुश्किल होता होगा!
कैसे शुरू हुई इस पूरे मामले की जांच?
इस पूरे मामले की कहानी की जड़ें थोड़ी पुरानी हैं। ED की जो वर्तमान जांच चल रही है, वो Prevention of Money Laundering Act (PMLA), 2002 के तहत दर्ज ECIR (प्रवर्तन केस सूचना रिपोर्ट) पर आधारित है।
लेकिन, ED खुद से सीधे कूद नहीं पड़ी। यह मामला दरअसल केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा 28 जुलाई 2025 को दर्ज की गई तीन एफआईआर से जुड़ा है।
और तो और, सीबीआई ने भी अपनी ये एफआईआर यूं ही दर्ज नहीं की थीं। बल्कि, 29 अप्रैल 2025 को देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कुछ सख्त निर्देश दिए थे।
उन्हीं निर्देशों का पालन करते हुए सीबीआई ने शुरुआती जांच की, जिसमें बिल्डरों द्वारा पैसों की गड़बड़ी और खरीदारों को गुमराह करने के गंभीर आरोप सामने आए थे। साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही इस पूरे नेक्सस पर कानूनी कार्रवाई की तलवार लटकी है।
होमबायर्स का पैसा आखिर गया कहां?
जांच एजेंसियों का सबसे बड़ा आरोप यही है कि बिल्डरों ने होमबायर्स और बैंकों से जो करोड़ों रुपये जुटाए, उनका सही इस्तेमाल नहीं किया। मतलब, ये पैसा उन हाउसिंग प्रोजेक्ट्स को पूरा करने में नहीं लगाया गया, जिनके लिए इसे लिया गया था।
बल्कि, आरोप है कि इस पैसे को दूसरी परियोजनाओं और अपनी निजी व्यावसायिक गतिविधियों में डायवर्ट कर दिया गया। इसी को आसान भाषा में 'फंड डायवर्जन' कहते हैं, यानी जिस काम के लिए पैसा लिया, उसमें ना लगाकर कहीं और लगा देना।
ED अब इसी फंड डायवर्जन और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं की गहराई से जांच कर रही है। एजेंसी ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि होमबायर्स की गाढ़ी कमाई कहां-कहां लगाई गई, क्या इससे कोई बेनामी संपत्ति खरीदी गई, और किस तरह इस पैसे को सिस्टम में सफेद करने की कोशिश की गई।
इस जांच का मकसद सिर्फ दोषियों को सजा दिलाना नहीं, बल्कि उन हजारों होमबायर्स को भी न्याय दिलाना है, जो सालों से अपने घर के सपने को सच होने का इंतजार कर रहे हैं। उम्मीद है कि ED की इस कार्रवाई से सच सामने आएगा और पीड़ितों को राहत मिलेगी।




































