वाराणसी: आप सोचिए, क्या हो अगर आपके इलाके में एक पार्षद 31 साल से चुनाव जीतता आ रहा हो, लेकिन आपके मोहल्ले की गलियां बदहाल हों, सीवर का गंदा पानी सड़कों पर बह रहा हो, और पीने के साफ पानी के लिए आप तरस रहे हों? वाराणसी के वार्ड-68, जिसे कोनिया वार्ड भी कहते हैं, वहां के लोग ऐसी ही बदहाली में जी रहे हैं। दशकों का लंबा इंतज़ार, लेकिन समस्याओं का अंबार जस का तस खड़ा है। यहां की सड़कें अक्सर पानी में डूबी रहती हैं, सीवर का पानी उफनकर गलियों में तालाब बना देता है और नल से बदबूदार, गंदा पानी आता है, जिसे पीना तो दूर, छूने से भी लोग कतराते हैं।
हालत इतनी खराब है कि कई परिवारों को नहाने के लिए दूसरे मोहल्लों तक जाना पड़ता है, और पीने का पानी या तो खरीदना पड़ता है, या फिर दूर से लाना पड़ता है। रहमतनगर जैसे इलाके तो पिछले 16 साल से पानी की इस किल्लत को झेल रहे हैं।
धोबीघाट में नई सड़क और सीवर बनने के बाद लोगों के घर इतने नीचे चले गए हैं कि थोड़ी सी बारिश में घर के भीतर पानी भर जाता है। वहीं, विजयीपुरा में तो लोग प्यास बुझाने के लिए पैसे खर्च कर पानी खरीदने को मजबूर हैं।
वार्ड में विकास के दावों की पड़ताल
जब हमारी टीम इस वार्ड की पड़ताल करने निकली, तो लोगों ने विकास के दावों की बखिया उधेड़ दी। स्थानीय निवासियों का कहना है कि विकास सिर्फ कुछ चुनिंदा गलियों और प्रभावशाली लोगों के घरों तक ही सीमित है।
बाकी बस्तियों में तो 'वोट के बाद भूल जाओ' वाली पुरानी राजनीति चल रही है। करीब 50 हजार की आबादी वाले इस वार्ड की तस्वीर इतनी धुंधली है कि यहां बच्चों के लिए एक भी प्राइमरी स्कूल नहीं है, और न ही कोई सार्वजनिक पार्क, जहां लोग शाम को टहल सकें या बच्चे खेल सकें।
रहमतनगर में तो कई महीनों से सड़क पर सीवर का पानी बहना आम बात हो गई है। लोगों ने बताया कि यहां की मुख्य सीवर लाइन काफी ऊंची है, जिसकी वजह से पानी निकल ही नहीं पाता और गलियों में यूँ ही सड़ता रहता है।
रहमतनगर पोखरी (जिसे लोग ताड़ीखाना भी कहते हैं) के पास की स्थिति तो और भी दयनीय है। यहां सड़क को इतना ऊंचा बना दिया गया है कि आसपास के कई मकान करीब दो फीट नीचे चले गए हैं।
इसका नतीजा ये होता है कि बारिश के मौसम में इन घरों में पानी भर जाता है और लोगों का जीना मुहाल हो जाता है।
बिजली और स्ट्रीट लाइट की बदहाल व्यवस्था
समस्याएं सिर्फ पानी और सीवर तक ही सीमित नहीं हैं। मोहन कटरा में आज भी बिजली के तार बांस की बल्लियों के सहारे लटके हुए हैं।
ये नजारा देखकर लगता है जैसे हम किसी दूरदराज के गांव में आ गए हों, न कि वाराणसी जैसे स्मार्ट सिटी के एक वार्ड में। इसके अलावा, वार्ड की कई गलियों में स्ट्रीट लाइट तक नहीं लगी है, जिससे रात होते ही यहां अंधेरा पसर जाता है और लोगों को आने-जाने में डर लगता है।
पेयजल का गहराता संकट
वार्ड के लोगों के लिए पेयजल की समस्या सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। विजयीपुरा, रहमतनगर और धोबीघाट जैसे मोहल्लों में या तो पानी बहुत कम आता है, या फिर इतना गंदा और बदबूदार होता है कि उसे इस्तेमाल करना असंभव है।
कई परिवारों ने बताया कि उन्हें या तो बोतल बंद पानी खरीदना पड़ता है, या फिर पानी लाने के लिए कई किलोमीटर दूर दूसरे मोहल्लों तक जाना पड़ता है। वर्षों से स्थानीय प्रशासन और पार्षद से शिकायतें की जा रही हैं, लेकिन अभी तक इस समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।
लोग कहते हैं, "प्यास लगती है तो पानी तो चाहिए ही, कहां से लाएं?"
उफनते सीवरों से नारकीय हालात
रहमतनगर में नई सीवर लाइन बिछाने के बाद भी हालात सुधरे नहीं हैं, बल्कि कई जगहों पर तो और बिगड़ गए हैं। जगह-जगह सीवर का गंदा पानी सड़क पर बहता रहता है।
स्थानीय लोग बताते हैं कि नई सीवर लाइन का स्तर भी ऊंचा रखा गया है, जिसकी वजह से पानी की निकासी ठीक से नहीं हो पाती। यह गंदा पानी न सिर्फ गलियों को नारकीय दलदल में बदल रहा है, बल्कि लगातार मकानों की नींव को भी कमजोर कर रहा है, जिससे घरों को खतरा बना रहता है।
सड़क निर्माण से बढ़ती समस्याएं
वार्ड में सड़क और सीवर निर्माण का काम चल रहा है, लेकिन कई स्थानों पर यह लोगों के लिए राहत की जगह नई मुसीबतें लेकर आया है। ताड़ीखाना और धोबीघाट में सड़कों को इतना ऊंचा बना दिया गया है कि आसपास के मकान नीचे दब गए हैं।
बारिश में इन घरों में पानी भरने से लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। इसके अलावा, कई जगहों पर नई सड़क बनने के कुछ ही दिनों बाद उसे फिर से खोद दिया जाता है, जिससे धूल-मिट्टी और गड्ढों की समस्या बनी रहती है, और लोगों को आवाजाही में परेशानी होती है।
सफाई व्यवस्था की अनदेखी
कोनिया वार्ड के कई इलाकों में खाली प्लॉटों पर कूड़े के ढेर देखने को मिले। स्थानीय निवासियों ने शिकायत की कि कई मोहल्लों में सफाईकर्मी हफ्ते में सिर्फ एक या दो बार ही आते हैं।
कूड़ा भी अलग-अलग करके नहीं उठाया जाता, जिससे गंदगी और बदबू का माहौल बना रहता है। नालियों की सफाई भी ठीक से नहीं होती, जिसकी वजह से उनमें कचरा जमा रहता है और जलभराव की समस्या बनी रहती है।
वार्ड-68 की यह कहानी सिर्फ एक वार्ड की नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की है जो शहरी विकास की दौड़ में पीछे छूट गए हैं, और बुनियादी सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहे हैं। कब तक उन्हें इस बदहाली में जीना पड़ेगा, यह सवाल प्रशासन और चुने हुए प्रतिनिधियों से पूछा जाना चाहिए।


