UPTET परीक्षा: वाराणसी में 4000 अभ्यर्थी नदारद; ज्यादातर शिक्षक देने आए इम्तिहान
सारांश
यूपीटीईटी परीक्षा वाराणसी में समाप्त हो गई। जानें कैसे 4000 अभ्यर्थी अंतिम दिन नदारद रहे और क्यों ज़्यादातर पहले से ही कार्यरत शिक्षक इस परीक्षा में शामिल हुए।

यूपीटीईटी परीक्षा वाराणसी में समाप्त हो गई। जानें कैसे 4000 अभ्यर्थी अंतिम दिन नदारद रहे और क्यों ज़्यादातर पहले से ही कार्यरत शिक्षक इस परीक्षा में शामिल हुए।

वाराणसी: बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी में पिछले तीन दिनों से चल रही उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET) शनिवार को खत्म हो गई। ये परीक्षा सिर्फ़ एक इम्तिहान नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में सरकारी मास्टर बनने का सपना पाले हज़ारों नौजवानों के लिए उम्मीदों की एक सीढ़ी है। लेकिन इस बार का UPTET अपने साथ कुछ दिलचस्प आंकड़े भी लाया। आख़िरी दिन यानी शनिवार को जब परीक्षा ख़त्म हुई, तो पता चला कि क़रीब 4000 अभ्यर्थी ग़ायब थे। सुनने में यह संख्या भले ही बड़ी लगे, लेकिन यह भी सच है कि परीक्षा में बैठने वाले अधिकांश लोग वे थे जो पहले से ही पढ़ाने-लिखाने के काम से जुड़े हुए हैं – यानी खुद शिक्षक!
वाराणसी में कुल 68 परीक्षा केंद्रों पर यह महफ़िल सजी थी। 2 जुलाई से शुरू होकर ये परीक्षाएँ शनिवार तक चलीं।
पूरे तीन दिन, सुबह से शाम तक, परीक्षार्थियों का तांता लगा रहा। हालांकि, व्यवस्था में कोई कमी न रहे, इसके लिए ज़बरदस्त सुरक्षा इंतज़ाम किए गए थे।
चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात थी और हर गतिविधि पर पैनी नज़र रखी जा रही थी ताकि नकल या किसी भी तरह की धांधली की कोई गुंजाइश न बचे। ये वही UPTET है जिसकी भर्ती प्रक्रियाओं में अक्सर कई पेचीदगियां सामने आती रही हैं, इसलिए इस बार प्रशासन हर लिहाज़ से चौकस था।
यूपीटीईटी यानी उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा, राज्य में प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों में शिक्षक बनने के लिए एक अनिवार्य शर्त है। यह एक ऐसा गेटवे है जिसे पार किए बिना कोई भी व्यक्ति सरकारी शिक्षक बनने का सपना पूरा नहीं कर सकता।
हर साल लाखों की संख्या में युवा इसमें अपनी क़िस्मत आज़माते हैं। यह परीक्षा दो स्तरों पर होती है – पेपर-1 प्राइमरी स्कूलों (कक्षा 1 से 5) में पढ़ाने के लिए और पेपर-2 अपर प्राइमरी स्कूलों (कक्षा 6 से 8) में पढ़ाने के लिए।
अभ्यर्थियों की योग्यता और उनके लक्ष्य के अनुसार वे एक या दोनों पेपर में बैठते हैं। इस परीक्षा का परिणाम न सिर्फ़ व्यक्तिगत अभ्यर्थियों के करियर को दिशा देता है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के शिक्षा परिदृश्य को भी आकार देता है।
राज्य को हर साल हज़ारों नए, योग्य शिक्षकों की ज़रूरत होती है और UPTET इस ज़रूरत को पूरा करने में अहम भूमिका निभाता है।
वाराणसी में आयोजित इस तीन-दिवसीय परीक्षा का आयोजन बेहद सावधानी और पुख़्ता इंतज़ामों के साथ किया गया। 2 जुलाई को परीक्षा शुरू हुई और गुरुवार व शुक्रवार को दो-दो पालियों में ये परीक्षाएं आयोजित की गईं।
सुबह की पाली और दोपहर की पाली में अलग-अलग अभ्यर्थी या अलग-अलग पेपर के लिए उम्मीदवार आते थे। परीक्षा केंद्रों के बाहर सुबह से ही उम्मीदवारों की गहमा-गहमी दिखती थी।
कड़े सुरक्षा बंदोबस्त के तहत, हर केंद्र पर तलाशी के बाद ही अंदर जाने दिया जा रहा था। मेटल डिटेक्टर से लेकर बायोमेट्रिक पहचान तक, हर वो तकनीक इस्तेमाल की जा रही थी जिससे परीक्षा की पवित्रता बनी रहे।
वहीं शनिवार को, यानी परीक्षा के अंतिम दिन, एक पाली में ही परीक्षा का आयोजन हुआ, जिसके बाद परीक्षार्थियों ने राहत की सांस ली। यह प्रशासन की कड़ी निगरानी का ही नतीजा था कि पूरी परीक्षा शांतिपूर्ण और सुचारु रूप से संपन्न हो सकी, कहीं से भी किसी अप्रिय घटना की ख़बर नहीं आई।
अंतिम दिन 4000 अभ्यर्थियों का परीक्षा छोड़ देना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। वैसे तो किसी भी बड़ी प्रतियोगी परीक्षा में कुछ अभ्यर्थी अनुपस्थित रहते ही हैं।
इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं। कुछ उम्मीदवारों को शायद किसी और परीक्षा में सफलता मिल गई हो, इसलिए उन्हें अब इसकी ज़रूरत न महसूस हो।
कुछ की तैयारी पूरी न हो पाई हो या फिर किसी निजी या पारिवारिक कारण से वे परीक्षा केंद्र तक न पहुँच पाए हों। कई बार ऐसा भी होता है कि एक ही उम्मीदवार कई परीक्षाओं के फॉर्म भर देता है और फिर प्राथमिकता के अनुसार कुछ परीक्षाएं छोड़ देता है।
हालांकि, वाराणसी के इन 4000 अभ्यर्थियों की अनुपस्थिति के पीछे कोई विशेष कारण तो सामने नहीं आया है, लेकिन यह आंकड़ा परीक्षा की तैयारियों और उम्मीदवारों की बदलती प्राथमिकताओं की एक झलक ज़रूर पेश करता है।
इस UPTET की एक और बेहद दिलचस्प बात यह थी कि परीक्षा देने वालों में 'ज्यादातर' शिक्षक ही थे। यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि जो लोग पहले से ही पढ़ाने का काम कर रहे हैं, वे फिर से एक शिक्षक पात्रता परीक्षा क्यों दे रहे हैं? इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।
एक संभावना यह है कि ये वे शिक्षक हों जो संविदा पर या शिक्षा मित्र के तौर पर काम कर रहे हैं और अब स्थायी सरकारी शिक्षक बनने की उम्मीद में UPTET पास कर अपने अंकों को बेहतर बनाना चाहते हों। कई बार नए भर्ती विज्ञापन में UPTET के बेहतर अंकों को प्राथमिकता दी जाती है या सिर्फ़ UPTET पास करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि अच्छे स्कोर की भी ज़रूरत होती है।
इसके अलावा, कुछ ऐसे शिक्षक भी हो सकते हैं जो प्राइमरी में पढ़ा रहे हों और अपर प्राइमरी स्तर पर पढ़ाने के लिए UPTET का दूसरा पेपर दे रहे हों। यह दिखाता है कि शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर अवसरों और स्थायी नौकरी की चाह कितनी प्रबल है, और लोग अपने करियर को संवारने के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।
यह प्रवृत्ति राज्य के शिक्षा व्यवस्था में सुधार और शिक्षकों की गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत भी है, क्योंकि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और सिर्फ़ योग्य उम्मीदवार ही इस क्षेत्र में आगे बढ़ पाते हैं।
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