वाराणसी: क्या 113 साल पुराने एक कागज का टुकड़ा आज के सरकारी दावों को मात दे सकता है? जी हां, वाराणसी में ऐसा ही हुआ है। मामला एक ऐसी जमीन का है जहां एक तरफ नगर निगम का दावा था कि यह जमीन 'तालाब' है, तो दूसरी तरफ एक कंपनी का कहना था कि यहां दशकों से सिनेमा हॉल चल रहा है। अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस विवाद पर अपनी मुहर लगा दी है और साफ कर दिया है कि जब मौके पर कोई तालाब है ही नहीं, तो सिर्फ पुराने कागजों के आधार पर निर्माण रोकना गलत है।
पूरा मामला वाराणसी के मिसिर पोखरा इलाके का है, जहां मशहूर 'मज़दा सिनेमा' की जमीन (अराजी संख्या 2404) पर एक बड़ा प्रोजेक्ट आने वाला है। मेसर्स नॉट्स इंडिया कारपेट्स प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी यहां करीब 100 करोड़ रुपये का निवेश करके एक आलीशान स्टार होटल बनाना चाहती है।
लेकिन जब कंपनी ने इसके लिए नगर निगम से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) मांगा, तो प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए।
नगर निगम का तर्क बड़ा अजीब था। उन्होंने 24 जनवरी 2026 के एक पत्र में कहा कि फसली वर्ष 1291 (यानी सन् 1884) के राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन तालाब के रूप में दर्ज थी।
इसी आधार पर प्रशासन ने उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम के तहत कार्रवाई शुरू कर दी और होटल के निर्माण पर ब्रेक लगा दिया। लेकिन कंपनी इस बात को मानने को तैयार नहीं थी और मामला हाईकोर्ट पहुंच गया।
बैनामे और टैक्स रिकॉर्ड्स ने पलटा पासा
अदालत में जब दलीलें शुरू हुईं, तो कंपनी ने वह तुरुप का इक्का चला जिसने नगर निगम के दावों की हवा निकाल दी। कंपनी ने सबूत पेश किया कि यह जमीन साल 1913 में नगर पालिका बोर्ड, बनारस ने एक रजिस्टर्ड बैनामे के जरिए महाराजा महिंद्र चंद्र नंदी को बेची थी।
सबसे अहम बात यह थी कि उस 113 साल पुराने बैनामे में ही लिखा था कि इस जमीन पर निर्माण मौजूद है।
कंपनी ने कोर्ट को यह भी बताया कि 1927 से ही यह संपत्ति नगर निगम के रिकॉर्ड में दर्ज है और कंपनी नियमित रूप से हाउस टैक्स और वाटर टैक्स भर रही है। इतना ही नहीं, साल 1954 (फसली 1361) से यह जमीन लगातार 'आबादी' भूमि के रूप में दर्ज है।
यानी दशकों से यहां लोग रह रहे हैं और व्यापार कर रहे हैं, तो अचानक इसे तालाब कैसे मान लिया गया?
IIT-BHU की रिपोर्ट और कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट के आदेश के बाद जब नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव और नगर आयुक्त ने हलफनामा दाखिल किया, तो उन्होंने आईआईटी-बीएचयू की एक रिपोर्ट का सहारा लिया। लेकिन कोर्ट ने पाया कि यह रिपोर्ट याचिका दाखिल होने के बाद आनन-फानन में तैयार कराई गई थी।
मजेदार बात यह रही कि खुद उस रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया कि मौके पर कोई जलाशय (तालाब) मौजूद नहीं है। रिपोर्ट में लिखा था कि जमीन मिट्टी, गाद और मलबे से भरी हुई है।
जस्टिस नीरज तिवारी और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने पाया कि प्रशासन ने फसली वर्ष 1291 के बाद के रिकॉर्ड्स को या तो उपलब्ध नहीं कराया या उन्हें जर्जर बताकर नजरअंदाज कर दिया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि जिस लक्सा क्षेत्र में यह जमीन है, वह बेहद घनी आबादी वाला इलाका है।
कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल याची की जमीन पर कार्रवाई करना और बाकी की 0.688 हेक्टेयर जमीन पर चुप रहना भेदभावपूर्ण है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का सीधा उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ
सुनवाई के दौरान हींच लाल तिवारी और जगपाल सिंह जैसे सुप्रीम कोर्ट के मशहूर फैसलों का जिक्र हुआ, जिनमें तालाबों और सार्वजनिक जमीनों के संरक्षण की बात कही गई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे मामले अलग तथ्यों पर आधारित थे।
इस केस में कोर्ट ने 'राज्य बनाम अल्ट्राटेक सीमेंट (2022)' के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अगर मौके पर वास्तव में कोई जलाशय मौजूद ही नहीं है, तो केवल पुराने अभिलेखों के आधार पर अनुमति रोकना उचित नहीं है।
अदालत ने माना कि नगर निगम ने 113 साल पुराने वैध और रजिस्टर्ड बैनामे की सत्यता को कभी चुनौती नहीं दी, इसलिए अब वह अपनी बात से पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने नगर निगम के उस पत्र को रद्द कर दिया जिसमें NOC देने से इनकार किया गया था और निर्देश दिया कि चार सप्ताह के भीतर याची के आवेदन पर नए सिरे से विचार कर निर्णय लिया जाए।

