38 साल पुराने हत्याकांड में आरोपी बरी; हाईकोर्ट ने कहा- सबूत बनाए नहीं जाते
सारांश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 के मर्डर केस में बसंत सिंह को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि शक सबूत की जगह नहीं ले सकता और गवाह अविश्वसनीय थे।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 के मर्डर केस में बसंत सिंह को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि शक सबूत की जगह नहीं ले सकता और गवाह अविश्वसनीय थे।

कानपुर देहात: कल्पना कीजिए, एक शख्स को एक ऐसे जुर्म की सजा काटनी पड़ी जिसके सबूतों की बुनियाद ही कमजोर थी। मामला 38 साल पुराना है, साल 1982 की एक खौफनाक रात और एक हत्या। निचली अदालत ने सजा सुनाई, लेकिन अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले की परतें खोलीं और साफ कह दिया कि सबूत बनाए नहीं जाते, बल्कि उन्हें पेश करना होता है। कोर्ट ने आरोपी बसंत सिंह को बरी करते हुए निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह पलट दिया है।
यह पूरी कहानी शुरू होती है 15 अक्टूबर 1982 की रात से। मंगलपुर थाना क्षेत्र में रामाधार त्यागी के बेटे कृष्णाधार उर्फ छोटे की उनके अपने ही ट्यूबवेल पर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।
उस वक्त पुलिस ने जो पहली FIR दर्ज की, उसमें किसी का भी नाम नहीं था, मामला 'अज्ञात' के खिलाफ था। लेकिन कहानी में मोड़ तब आया जब घटना के करीब चार महीने बाद, फरवरी 1983 में रामाधार त्यागी ने एक दूसरी लिखित रिपोर्ट दी।
इस बार उन्होंने उदय कुमार चौबे पर शक जताया।
पुलिस ने इस शक को आधार बनाया और उदय कुमार, धर्मराज, बसंत सिंह और राजाराम समेत कई लोगों के खिलाफ हत्या, साजिश और गैरकानूनी जमावड़े की धाराओं में चार्जशीट दाखिल कर दी। ट्रायल कोर्ट ने इन सबको दोषी माना और उम्रकैद की सजा सुना दी।
लेकिन कानून की लड़ाई लंबी चली और अब हाईकोर्ट ने इस मामले में जो टिप्पणियां की हैं, वो किसी भी जांच एजेंसी के लिए सबक की तरह हैं।
जब यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस जे.जे.
मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने केस की बारीकी से जांच की। कोर्ट ने पाया कि जिन गवाहों के दम पर सजा सुनाई गई थी, उनकी बातें आपस में मेल ही नहीं खा रही थीं।
गवाहों ने दावा किया कि उन्होंने आरोपियों को घटनास्थल की ओर जाते देखा था या उन्हें साजिश की जानकारी थी, लेकिन सवाल यह था कि अगर उन्हें सब पता था, तो उन्होंने महीनों तक न पुलिस को बताया और न ही पीड़ित परिवार को।
कोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि जांच अधिकारी ने इन गवाहों के बयान घटना के तीन-चार महीने बाद दर्ज किए। इसके अलावा, सबसे बड़ी बात यह थी कि जिस हथियार से हत्या हुई, उसकी बरामदगी का कोई ठोस सबूत नहीं था।
कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने केवल गांव की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और पुरानी रंजिश के आधार पर सजा सुना दी थी, जबकि कानूनी तौर पर रंजिश को बिना सबूत के दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही। कोर्ट ने कहा कि 'रंजिश एक दोधारी तलवार की तरह होती है'।
यह एक तरफ अपराध करने का मकसद हो सकती है, तो दूसरी तरफ किसी बेगुनाह को झूठा फंसाने की वजह भी बन सकती है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शक चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, वह कभी भी कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता।
इस मामले में अपील करने वाले अन्य आरोपियों—उदय कुमार, धर्मराज और राजाराम की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए अब केवल बसंत सिंह की सुनवाई बाकी थी। कोर्ट ने माना कि यह पूरी तरह से 'नो एविडेंस' (कोई सबूत नहीं) वाला मामला है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए बसंत सिंह को सभी आरोपों से बरी कर दिया और उनके जमानत बांड रद्द करते हुए आत्मसमर्पण की जरूरत को खत्म कर दिया।
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