एटा: कल्पना कीजिए कि आप पर एक ऐसा आरोप लगा हो जिसके लिए आपको उम्रकैद की सजा सुनाई गई, और फिर करीब 36 साल बाद पता चले कि वह फैसला ही गलत था। मामला उत्तर प्रदेश के एटा जिले का है, जहाँ एक पुराने अपहरण और जालसाजी के केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने चार लोगों को बरी कर दिया है, जिन्हें निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
यह पूरा मामला 1986 का है, जो करीब चार दशकों तक कानूनी दांव-पेच में फंसा रहा। राम किशोर, राम भरोसे, भूदेव और दिनेश सिंह—ये वो चार लोग थे जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने दोषी माना था।
लेकिन अब हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के उस फैसले को पूरी तरह पलट दिया है और चारों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है।
क्या था पूरा मामला
मामले की शुरुआत 8 मार्च 1986 को हुई थी। थाना जैथरा (एटा) में फूलश्री नाम की एक महिला ने शिकायत दर्ज कराई थी।
आरोप यह था कि आरोपी उनके भाई राम दुलारे को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गए थे। शिकायत के मुताबिक, आरोपियों ने एक साजिश रची और राम दुलारे की जगह किसी और व्यक्ति को खड़ा कर उसकी जमीन का फर्जी बैनामा दिनेश के नाम करा लिया।
इसके बाद राम दुलारे को गायब कर दिया गया।
इस गंभीर आरोप के बाद पुलिस ने कार्रवाई की और आईपीसी की धारा 364 (अपहरण), 420 (धोखाधड़ी), 468 (दस्तावेजों की जालसाजी) और 471 के तहत मुकदमा चलाया गया। 9 अक्टूबर 1990 को एटा की सत्र अदालत ने चारों आरोपियों को दोषी पाया।
उन्हें धारा 364 में आजीवन कारावास, धारा 420 में पांच साल और धारा 468 में सात साल की सख्त सजा सुनाई गई थी।
हाईकोर्ट ने क्यों पलटा फैसला
जब यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, तो न्यायमूर्ति जे.जे.
मुनीर और न्यायमूर्ति की पीठ ने गवाहों के बयानों की बारीकी से जांच की। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के तीन मुख्य गवाह—कृपाल सिंह, फूलश्री और महावीर—के बयानों में काफी विरोधाभास था।
यानी, गवाहों की बातें एक-दूसरे से मेल नहीं खा रही थीं।
कोर्ट ने 'लास्ट सीन टुगेदर' (अंतिम बार साथ देखे जाने) के सिद्धांत पर भी गौर किया। कानून में यह सिद्धांत तब काम करता है जब यह साबित हो कि पीड़ित आखिरी बार आरोपी के साथ ही देखा गया था।
लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि अन्य पुख्ता सबूत मौजूद न हों। इस मामले में ऐसे कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले।
दस्तावेजों की जालसाजी पर कानूनी पेंच
एक और बड़ा मोड़ जमीन के बैनामे को लेकर आया। ट्रायल कोर्ट ने माना था कि बिक्री-पत्र फर्जी था, लेकिन हाईकोर्ट ने इस टिप्पणी को गलत ठहराया।
कोर्ट ने कहा कि कोई भी आपराधिक अदालत किसी दस्तावेज़ को तब तक फर्जी घोषित नहीं कर सकती, जब तक कि सक्षम सिविल न्यायालय (Civil Court) साक्ष्यों की जांच के बाद ऐसा निष्कर्ष न दे।
इसके अलावा, कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाए कि एफआईआर दर्ज कराने में करीब एक महीने की देरी क्यों हुई। अभियोजन पक्ष इस देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बता पाया, जिससे पूरा मामला संदेहास्पद हो गया।
इन तमाम कानूनी कमियों और सबूतों के अभाव को देखते हुए हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के फैसले को साक्ष्यों के विपरीत माना और चारों अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया। चूंकि ये चारों पहले से ही जमानत पर थे, इसलिए कोर्ट ने उन्हें आत्मसमर्पण से छूट देते हुए उनके जमानत बॉन्ड रद्द कर दिए।

