वाराणसी: बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी, जिसे बनारस भी कहते हैं, अपने घाटों, गंगा और मस्ती भरे माहौल के लिए जानी जाती है। लेकिन बीते कुछ दिनों से यहां के लोग धूप और पसीने से बेहाल थे। गर्मी की तपिश ऐसी थी कि लोग बस एक ही आस लगाए बैठे थे—बारिश की। और फिर बुधवार की सुबह, ऐसा लगा जैसे सावन की पहली फुहार आ ही गई! शहर के कई इलाकों में हल्की बूंदाबांदी हुई। सुबह-सुबह हुई इस बारिश ने मौसम को कुछ पल के लिए बड़ा सुहावना बना दिया। ठंडी हवा चली, सड़कों पर हल्की नमी दिखी और लोगों के चेहरे पर थोड़ी मुस्कान भी आई।
लेकिन बनारस के मौसम का मिजाज भी कुछ अलग है। जिस राहत की उम्मीद में लोग थे, वो पल भर में काफूर हो गई।
हल्की फुहार रुकते ही सूरज फिर तेवर दिखाने लगा और उमस ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया। सोचिए, एक तरफ तो हल्की बारिश से माहौल खुशनुमा हुआ था, लेकिन चंद ही मिनटों में चिपचिपी गर्मी ने लोगों को फिर से पसीना-पसीना कर दिया।
खासकर जो सैलानी दूर-दूर से बनारस घूमने आए थे या गंगा घाटों पर पुण्य कमाने पहुंचे श्रद्धालु, उन्हें इस उमस भरी गर्मी से काफी परेशानी हुई। जैसे ही हल्की बारिश रुकी, आसमान में फिर से बादलों की आवाजाही तेज़ हो गई, लेकिन उनसे सिर्फ उम्मीद ही बँधी रही, बरसने का नाम नहीं लिया।
मानसून की दस्तक; पर असली जोर कब?
पिछले 48 घंटों से वाराणसी के आसमान में बादलों का डेरा तो है, लेकिन अच्छी और झमाझम बारिश अभी तक हुई नहीं है। ये बादल सिर्फ उम्मीदें जगा रहे हैं, बरस नहीं रहे।
मौसम विभाग की मानें तो अब इंतज़ार खत्म होने वाला है। उन्होंने अनुमान लगाया है कि अगले 24 घंटे के भीतर वाराणसी में मानसून पूरी तरह से अपनी पकड़ बना लेगा।
इसका मतलब है कि अब शहर में अच्छी बारिश होने की पूरी-पूरी संभावना है, जिससे लोगों को लंबे समय से चली आ रही गर्मी से सच्ची राहत मिल सकेगी। इस खबर से किसानों के चेहरे पर भी खुशी की लहर दौड़ गई है, जो अपनी फसलों के लिए बारिश का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
वाराणसी में सुबह हुई हल्की बूंदाबांदी का असर गंगा घाटों पर भी खूब देखने को मिला। दशश्वमेध घाट हो या अस्सी घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट हो या कोई और प्रमुख घाट, सुबह के समय यहां आम दिनों के मुकाबले ज्यादा चहल-पहल थी।
स्थानीय लोगों के साथ-साथ बड़ी संख्या में पर्यटक भी मौसम का लुत्फ़ उठाने पहुंचे। बादल और हल्की फुहारों के बीच गंगा की लहरें देखना एक अलग ही अनुभव दे रहा था।
लोग घाटों पर बैठकर, गंगा में डुबकी लगाकर या बस टहलते हुए इस मौसम का आनंद ले रहे थे। सुबह का माहौल बेहद खुशनुमा और जीवंत था।
हालांकि, जैसा कि हमने बताया, उमस बढ़ने के बाद लोगों को जितनी राहत की उम्मीद थी, उतनी मिली नहीं और गर्मी का एहसास फिर से हावी हो गया।
पूर्वांचल में मानसून का सफर और वाराणसी की आस
मौसम विभाग के ताजा अपडेट के मुताबिक, मानसून अब पूर्वांचल के 19 जिलों में अपनी दस्तक दे चुका है। इनमें आजमगढ़, मऊ, बलिया, गाजीपुर, चंदौली, सोनभद्र, देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर जैसे जिले शामिल हैं।
वाराणसी भी इसी लिस्ट में है, जहां मानसून ने एंट्री तो ले ली है, लेकिन अभी उसे पूरी तरह सक्रिय होना बाकी है। अगले 24 घंटों में इसके पूरी तरह से सक्रिय होने की उम्मीद है, जिसके बाद झमाझम बारिश का दौर शुरू हो सकता है।
बुधवार को वाराणसी का अधिकतम तापमान 36.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से 1.
2 डिग्री ज्यादा था। यानी अभी भी गर्मी का असर बना हुआ है, लेकिन उम्मीद की किरण मजबूत हो रही है।
मौसम वैज्ञानिक प्रो. मनोज श्रीवास्तव ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि वातावरण में नमी लगातार बढ़ रही है और मौसम की परिस्थितियां पूरी तरह से मानसून के अनुकूल बन चुकी हैं।
उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले एक दिन के भीतर वाराणसी में अच्छी बारिश होने की पूरी संभावना है। यह जानकारी उन सभी लोगों के लिए राहत भरी है जो गर्मी और उमस से जूझ रहे हैं, खासकर उन किसानों के लिए जिनकी खेती बारिश पर निर्भर करती है।
15 साल का सूखा: जून में सबसे कम बारिश ने बढ़ाई चिंता
जहां एक तरफ मानसून आने की खुशी है, वहीं दूसरी तरफ इस साल जून महीने में हुई बारिश के आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है। मौसम विभाग के आंकड़े डराते हैं।
1 जून से 30 जून के बीच वाराणसी में सिर्फ 6.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है।
सोचिए, इस अवधि में सामान्य तौर पर 95.1 मिलीमीटर बारिश होती है।
इसका मतलब ये हुआ कि इस बार सामान्य से करीब 93 प्रतिशत कम बारिश हुई है। यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि एक गंभीर संकेत है।
अगर हम पिछले 15 सालों के आंकड़ों पर नज़र डालें – यानी वर्ष 2011 से लेकर अब तक के डेटा को खंगालें – तो यह इस अवधि में जून महीने की सबसे कम बारिश है। इससे पहले, वर्ष 2019 में जून के दौरान 23.
9 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी, जो कम थी, लेकिन इस बार का आंकड़ा तो उसे भी पीछे छोड़ गया है। वहीं, वर्ष 2020 में तो रिकॉर्डतोड़ 366.
9 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जिससे अंदाजा लगता है कि इस बार कितनी बड़ी कमी आई है। बारिश की इतनी भारी कमी का सीधा असर कई चीजों पर पड़ने की आशंका है।
इसका खामियाजा खेती को भुगतना पड़ सकता है, भूजल स्तर और नीचे जा सकता है और शहर व ग्रामीण इलाकों के जल स्रोतों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह सिर्फ मौसम की बात नहीं, बल्कि पानी की समस्या से जुड़ी एक बड़ी चुनौती भी है।
किसानों के लिए उम्मीद की किरण: धान की रोपाई की सलाह
इस बीच, काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के ग्रामीण कृषि मौसम सेवा ने किसानों के लिए एक अहम सलाह जारी की है। नोडल अधिकारी प्रो.
रविशंकर सिंह और तकनीकी अधिकारी व मौसम वैज्ञानिक शिवमंगल सिंह ने किसानों से कहा है कि अगले तीन से चार दिनों तक आसमान में बादल छाए रहने और कई स्थानों पर हल्की से मध्यम बारिश होने की संभावना है। ऐसे में किसानों को अब धान की रोपाई शुरू कर देनी चाहिए।
यह उनके लिए एक बड़ी राहत की खबर है, क्योंकि बारिश की कमी के कारण वे अब तक धान की बुवाई और रोपाई शुरू नहीं कर पा रहे थे। उम्मीद है कि आने वाली बारिश से किसानों की मेहनत रंग लाएगी और खेतों में हरियाली लौटेगी।
यह सलाह उस उम्मीद को जगाती है कि जून में हुई कमी की भरपाई मानसून के सक्रिय होने के बाद हो पाएगी, जिससे कृषि क्षेत्र को राहत मिल सकेगी।

