वाराणसी: उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी से एक ऐसी खबर आई जिसने सिर्फ़ गलियों में नहीं, बल्कि सीधे पुलिस महकमे के गलियारों में भी तहलका मचा दिया। मामला है सिधौरा थाना क्षेत्र के मझांवा का, जहाँ रंजिश और ज़मीन के झगड़े में सौरभ सिंह नाम के एक नौजवान की हत्या हो गई। लेकिन इस हत्याकांड से ज़्यादा जिसने सुर्खियां बटोरी, वो थी पुलिस की कार्यप्रणाली। आरोप लगे कि थाना सिधौरा की पुलिस ने शिकायतें मिलने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, जिससे हत्यारों के हौसले बुलंद हुए और आख़िरकार सौरभ की जान चली गई। इस पूरे घटनाक्रम के बाद पुलिस की इतनी फजीहत हुई कि मामला सीधे पुलिस कमिश्नर तक जा पहुँचा और फिर जो एक्शन हुआ, उसने सबको चौंका दिया।
कहानी शुरू होती है एक ज़मीनी विवाद से, जो धीरे-धीरे रंजिश में बदल गया। इलाक़े के लोग बताते हैं कि सौरभ सिंह और कुछ लोगों के बीच लंबे समय से ज़मीन को लेकर तनातनी चल रही थी।
ये ऐसी रंजिशें होती हैं, जो अक्सर छोटी-छोटी बातों से शुरू होकर बड़े अंजाम तक पहुँच जाती हैं, और इस बार नतीजा बेहद दर्दनाक रहा – एक हत्या। सौरभ सिंह की हत्या के बाद, जब पुलिस जाँच में जुटी, तो कई गंभीर सवाल उठे।
सबसे बड़ा सवाल था – क्या पुलिस पहले से इस विवाद को जानती थी? क्या उन्हें शिकायतें मिली थीं? और अगर हाँ, तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
पुलिस की लापरवाही पर कमिश्नर का कड़ा रुख
पुलिस महकमे में सौरभ हत्याकांड को लेकर जिस तरह की बातें हो रही थीं, वो 'किरकिरी' शब्द से भी ज़्यादा गंभीर थी। आम जनता के मन में ये सवाल उठने लगे कि अगर पुलिस ही समय पर कार्रवाई नहीं करेगी, तो लोग कहाँ जाएँगे? ये सारी बातें पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल तक पहुँचीं।
शुक्रवार रात 10 बजे का वक्त था। पुलिस कमिश्नर ने अपने सभी राजपत्रित अधिकारियों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई।
इस बैठक में तीनों ज़ोन की समयबद्ध विवेचना, अपराध नियंत्रण और सक्रिय पुलिसिंग पर समीक्षा की जा रही थी। एजेंडे में सबसे ऊपर था सिंधौरा क्षेत्र में हुई इस सनसनीखेज हत्या का मामला।
मीटिंग शुरू हुई और सीधे सिंधौरा हत्याकांड पर बात आई। पुलिस कमिश्नर ने अधिकारियों से पूछा कि इस वारदात में पुलिस की क्या भूमिका रही? उन्होंने साफ़-साफ़ सवाल दागे कि जब थानेदार और दरोगा को लगातार शिकायतें मिल रही थीं, तो उन्होंने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? डीसीपी गोमती और अन्य अधिकारियों ने पूरे मामले के तथ्य सामने रखे, और ये बात तो स्पष्ट हो गई कि पुलिस से गंभीर चूक हुई थी।
जो कार्रवाई अपेक्षित थी, वो हुई नहीं। सीपी मोहित अग्रवाल ने इसे प्रथम दृष्टया लापरवाही माना और तुरंत कार्रवाई करने का फैसला किया।
थानाध्यक्ष पर गिरी गाज, नए अधिकारी की तैनाती
पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल ने इस लापरवाही को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया। उन्होंने तत्काल प्रभाव से थाना प्रभारी इंस्पेक्टर ज्ञानेन्द्र कुमार त्रिपाठी को लाइन हाजिर करने का आदेश दे दिया।
इसका मतलब ये हुआ कि अब ज्ञानेन्द्र कुमार त्रिपाठी थाने की ज़िम्मेदारी से हटकर पुलिस लाइन में आमद कराएंगे। ये एक बड़ा संदेश था कि लापरवाही करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
इसके साथ ही, नगर निगम थाना सिगरा के चौकी प्रभारी दरोगा पंकज कुमार को तत्काल प्रभाव से सिंधौरा थाने का नया थानाध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। पंकज कुमार को तुरंत अपना पदभार संभालने के निर्देश दिए गए।
डीसीपी गोमती से इस पूरे मामले पर विस्तृत रिपोर्ट भी माँगी गई है, ताकि और गहरे तक जाँच हो सके और आगे की कार्रवाई तय की जा सके।
चार आरोपी गिरफ्तार, लेकिन मुख्य शूटर फरार
एक तरफ़ पुलिस महकमे में ये बड़े बदलाव हो रहे थे, वहीं दूसरी तरफ़ सिंधौरा पुलिस ने सौरभ सिंह हत्याकांड के आरोपियों की धरपकड़ भी तेज़ कर दी। हत्याकांड में कुल छह लोग नामजद थे।
पुलिस ने अपनी दबिश में चार आरोपियों को धर दबोचा। इनमें रिशु सिंह, देवी सिंह, राजेश सिंह और गोलू सिंह शामिल हैं।
इन चारों को गिरफ्तार कर लिया गया है और उनसे पूछताछ जारी है।
लेकिन कहानी में ट्विस्ट ये है कि दो नामजद आरोपी, बबलू सिंह और हरिओम सिंह, अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। बबलू सिंह को इस मामले का मुख्य शूटर बताया जा रहा है।
पुलिस का कहना है कि उनकी गिरफ्तारी के लिए लगातार दबिश दी जा रही है और जल्द ही उन्हें भी पकड़ लिया जाएगा। ये देखना होगा कि फरार आरोपी कब तक पुलिस के शिकंजे से दूर रह पाते हैं।
लापरवाही पर एक और कार्रवाई: चौकी प्रभारी निलंबित
पुलिस कमिश्नर की ये मीटिंग सिर्फ़ सिंधौरा हत्याकांड तक सीमित नहीं थी। उन्होंने पूरे पुलिसिंग सिस्टम की समीक्षा की।
इस बैठक में विवेचनाओं के समयबद्ध निस्तारण में गंभीर लापरवाही का एक और मामला सामने आया। चौकी प्रभारी सरैयां जैतपुरा, दरोगा सत्यदेव गुप्ता ने 05 विवेचनाओं को निर्धारित अवधि के बाद भी क्रमशः 23 दिन, 826 दिन, 884 दिन, 939 दिन और 1060 दिन तक लंबित रखा था।
यानी कुछ मामलों को तो लगभग तीन साल से ज़्यादा समय तक लटकाए रखा गया था। इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए पुलिस कमिश्नर ने दरोगा सत्यदेव गुप्ता को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।
ये कार्रवाई बताती है कि पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल सिर्फ़ बड़े मामलों में ही नहीं, बल्कि हर स्तर पर सक्रियता और जवाबदेही चाहते हैं। वाराणसी पुलिस अब 'सक्रिय पुलिसिंग' के मोड में आ चुकी है, जहाँ अपराध नियंत्रण के साथ-साथ आंतरिक अनुशासन और कार्यप्रणाली में सुधार पर भी ज़ोर दिया जा रहा है।
सौरभ सिंह हत्याकांड में हुई ये कार्रवाई एक नज़ीर पेश करती है कि शिकायतों को नज़रअंदाज़ करने और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा। अब देखना ये है कि फरार शूटर बबलू सिंह और हरिओम सिंह कब तक पुलिस के हाथों आते हैं और सौरभ सिंह के परिवार को पूरा न्याय कब मिलता है।

