ललितपुर: बात आज से करीब 36 साल पहले की है, जब उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में एक ऐसा मामला सामने आया था, जिसने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया। तारीख थी 3 दिसंबर 1986, मेहरौनी थाना क्षेत्र के एक गांव में लोग उस वक्त सन्न रह गए, जब गांव के कुएं से एक नवजात बच्चे का शव बरामद हुआ। किसने फेंका? किसका बच्चा है? ऐसे सवालों के बीच पुलिस ने पहले अज्ञात शख्स के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की। लेकिन, ये महज एक नवजात शिशु की मौत का मामला नहीं रहा, बल्कि जल्द ही इसमें बलात्कार, हत्या और सबूत मिटाने जैसे संगीन आरोप भी जुड़ गए।
कहानी में ट्विस्ट तब आया जब इस मामले में दो नाम सामने आए – देव सिंह और नब्बू। पीड़िता और उसकी मां के बयानों के आधार पर पुलिस ने इन दोनों को बलात्कार, हत्या और सबूत मिटाने के आरोपों में घेरा।
मामला निचली अदालत पहुंचा, कार्यवाही हुई और 1988 में निचली अदालत ने अपना फैसला भी सुना दिया। लेकिन अब, करीब 36 साल बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले पर दोबारा सुनवाई करते हुए एक चौंकाने वाला फैसला सुनाया है, जिसने एक बार फिर इस पुराने केस की फाइल खोल दी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की अदालत ने देव सिंह और नब्बू दोनों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कुछ ऐसी महत्वपूर्ण बातें कहीं, जो इस केस की पूरी दिशा बदल देती हैं।
आखिर क्या था यह पूरा मामला? कैसे शुरू हुआ था ये विवाद? और क्यों हाईकोर्ट को इतने साल बाद इस फैसले को बदलना पड़ा? आइए समझते हैं इस पूरी कहानी की परतें, बिल्कुल सरल शब्दों में, जैसे कोई दोस्त आपको खबर सुना रहा हो।
नवजात का शव और एफआईआर की शुरुआत
मामले की जड़ 3 दिसंबर 1986 को तब पड़ी जब ललितपुर के मेहरौनी थाना क्षेत्र के एक गांव में लोग कुएं से एक नवजात शिशु का शव देखकर हैरान रह गए। गांव में हड़कंप मच गया और पुलिस को सूचना दी गई।
पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की और शुरुआती तौर पर अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया। यह एक सामान्य अपराध की तरह लग रहा था, जिसमें एक बच्चे की मौत की गुत्थी सुलझानी थी।
एफआईआर में उस वक्त बलात्कार का कोई जिक्र नहीं था, न ही किसी व्यक्ति विशेष का नाम। यह सिर्फ नवजात के शव मिलने और उसकी मौत से जुड़ा एक सीधा-सा मामला था।
बदली कहानी और बलात्कार के आरोप
लेकिन, पुलिस की जांच आगे बढ़ने के साथ ही इस केस में नाटकीय मोड़ आया। जैसे-जैसे जांच का शिकंजा कसता गया, पीड़िता और उसकी मां के बयानों ने एक नई कहानी गढ़ दी।
उन्होंने देव सिंह और नब्बू पर बलात्कार का आरोप लगाया। इन बयानों के आधार पर पुलिस ने देव सिंह और नब्बू के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार), हत्या और सबूत मिटाने जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया।
अचानक से नवजात के शव का मामला एक जटिल बलात्कार और हत्या के मामले में बदल गया।
निचली अदालत का फैसला: हत्या से बरी, बलात्कार में सजा
यह मामला ललितपुर की सत्र अदालत में पहुंचा। काफी सुनवाई के बाद, 13 अक्टूबर 1988 को सत्र न्यायाधीश ने अपना फैसला सुनाया।
अदालत ने देव सिंह और नब्बू को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया, यानी उन्हें बच्चे की हत्या का दोषी नहीं पाया गया। लेकिन, उन्हें बलात्कार के आरोप में दोषी ठहराया गया।
धारा 376 (बलात्कार) के तहत, दोनों को तीन साल के कठोर कारावास और 250-250 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई। इस फैसले के बाद, देव सिंह और नब्बू ने निचली अदालत के इस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की, जिसकी सुनवाई सालों बाद अब हुई है।
हाईकोर्ट की पड़ताल: उम्र और सहमति का पेच
हाईकोर्ट में अपील पर सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की अदालत ने पूरे मामले की गहराई से पड़ताल की। अदालत ने पाया कि निचली अदालत ने एक बड़ी चूक की थी।
निचली अदालत ने पीड़िता की उम्र बिना किसी पुख्ता सबूत के 15 साल मान ली थी। जबकि, चिकित्सकीय जांच, जिसमें एक्स-रे रिपोर्ट भी शामिल थी, उसमें पीड़िता की उम्र 16 से 18 साल के बीच आंकी गई थी।
यह एक बहुत अहम बिंदु था, क्योंकि उस समय लागू कानून के अनुसार, सहमति से संबंध बनाने की उम्र 16 वर्ष थी। यदि पीड़िता 16 या उससे अधिक उम्र की थी, तो सहमति से बने संबंधों को बलात्कार नहीं माना जा सकता था।
बदलाव वाले बयान और एफआईआर की खामियां
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि शुरुआत में दर्ज हुई एफआईआर में बलात्कार का कोई आरोप नहीं था। यह सिर्फ नवजात शिशु के शव की बरामदगी से जुड़ा मामला था।
अदालत ने टिप्पणी की कि पुलिस जांच के दौरान जब पीड़िता और उसकी मां ने खुद को बच्चे की मौत के मामले में फंसता देखा, तब उन्होंने बलात्कार की एक नई कहानी गढ़ ली। अदालत ने पीड़िता के धारा 164 के तहत दिए गए बयान का भी विश्लेषण किया, जो मजिस्ट्रेट के सामने दिया जाता है और काफी विश्वसनीय माना जाता है।
इस बयान से स्पष्ट हुआ कि देव सिंह और पीड़िता के बीच संबंध सहमति से बने थे, न कि जबरदस्ती। यह बात निचली अदालत ने नजरअंदाज कर दी थी।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला: बरी किए गए आरोपी
इन सभी बिंदुओं पर विचार करने के बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष बलात्कार के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है।
पीड़िता की उम्र, सहमति की आयु और एफआईआर व बयानों में विरोधाभास ने पूरे मामले को कमजोर कर दिया। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने देव सिंह और उनके साथी नब्बू को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
इसके साथ ही, अदालत ने उनके जमानतदारों को भी उनके दायित्व से मुक्त कर दिया। इस फैसले ने दशकों पुराने एक आपराधिक मामले को एक नया अंत दिया है, जिसमें न्याय की कसौटी पर परखने के बाद आरोपियों को निर्दोष पाया गया।

