लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसी खबर आई है, जिसने सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है। सोचिए, एक गरीब परिवार अपनी बीमार महिला सदस्य को लेकर एक बड़े और भरोसेमंद अस्पताल पहुँचता है, इस उम्मीद में कि वहाँ उनकी जान बच जाएगी। लेकिन फिर एक डॉक्टर की 'सलाह' पर वो एक प्राइवेट अस्पताल में जाते हैं, जहाँ एक छोटी सी गलती, या कहिए बड़ी लापरवाही, उनकी खुशियों को हमेशा के लिए छीन लेती है। मामला किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से जुड़ा है, जहाँ एक महिला मरीज की जान गलत ब्लड ग्रुप चढ़ाए जाने से चली गई। अब महीनों बीत गए, लेकिन न तो गुनहगार डॉक्टर पर कोई कार्रवाई हुई है और न ही उस निजी अस्पताल पर, जहाँ यह 'चिकित्सीय अपराध' हुआ। परिवार आज भी न्याय के लिए भटक रहा है, पर प्रशासन की तरफ से कार्रवाई के नाम पर सिर्फ चुप्पी है।
ये कहानी है अंबेडकर नगर के विनय दुबे की, जिनकी पत्नी कमलेश देवी को सांस की तकलीफ थी। विनय अपनी पत्नी को लेकर 6 जून को KGMU पहुंचे।
KGMU, जो उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित अस्पतालों में से एक है, वहाँ उन्हें कुछ राहत की उम्मीद थी। सब कुछ ठीक चल रहा था, जब तक कि एक रेजिडेंट डॉक्टर उनके पास नहीं आया।
यह डॉक्टर KGMU में बॉन्ड पर तैनात था। उसने विनय को समझाया कि उनकी पत्नी का बेहतर इलाज किसी निजी अस्पताल में हो सकता है, जहाँ तुरंत ऑपरेशन की सुविधा मिल जाएगी।
विनय और उनका परिवार, जो अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहा था, डॉक्टर की बातों में आ गया। उन्हें लगा कि डॉक्टर उनकी मदद कर रहा है, जबकि वो एक जाल में फंसते चले जा रहे थे।
एक डॉक्टर की 'मदद' या धोखा?
KGMU के रेजिडेंट डॉक्टर की 'सलाह' पर, विनय दुबे अपनी पत्नी कमलेश देवी को कृष्णानगर स्थित एक निजी अस्पताल ले गए। यहाँ ऑपरेशन के नाम पर उनसे करीब 45,000 रुपये ऐंठ लिए गए।
विनय ने बताया कि इसमें से 11,000 रुपये तो उन्होंने ऑनलाइन जमा कराए थे। परिवार ने किसी तरह पैसे का इंतजाम किया, इस उम्मीद में कि उनकी पत्नी ठीक हो जाएंगी।
ऑपरेशन हुआ और उसके बाद अस्पताल स्टाफ ने कमलेश देवी को खून चढ़ाया। लेकिन यहीं पर एक ऐसी भयावह गलती हुई, जिसने एक परिवार को तबाह कर दिया।
कमलेश देवी का ब्लड ग्रुप 'बी पॉजिटिव' था, लेकिन अस्पताल स्टाफ ने उन्हें 'ए पॉजिटिव' ब्लड ग्रुप का खून चढ़ा दिया। इस एक गलती ने उनकी हालत और बिगाड़ दी, जो पहले से ही गंभीर थी।
खून की एक गलत बूंद ने उनके शरीर में जहर घोल दिया, उनकी जिंदगी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
गलत खून ने ले ली जान
गलत ब्लड ग्रुप का खून चढ़ाने के बाद कमलेश देवी की हालत तेजी से बिगड़ती चली गई। उनकी तबीयत इतनी खराब हो गई कि परिवार के होश उड़ गए।
जब निजी अस्पताल में स्थिति संभाली नहीं जा सकी, तो उन्हें आनन-फानन में दोबारा KGMU लाया गया। यह 16 जून की बात है।
KGMU के ट्रॉमा क्रिटिकल केयर यूनिट में कमलेश देवी को भर्ती कराया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उनकी जान बचाने की पूरी कोशिश की। लेकिन गलत ब्लड ट्रांसफ्यूजन के कारण उनके शरीर में जो नुकसान हो चुका था, वह इतना गहरा था कि डॉक्टर भी कुछ खास नहीं कर पाए।
चार दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलने के बाद, 20 जून को कमलेश देवी ने KGMU में ही दम तोड़ दिया। एक छोटे से दर्द के साथ अस्पताल पहुँची महिला, एक डॉक्टर की 'सलाह' और निजी अस्पताल की लापरवाही के चलते, जिंदगी की जंग हार गई।
विनय दुबे और उनका परिवार टूट गया, उनकी दुनिया ही उजड़ गई।
जांच का दावा; कार्रवाई ठप
कमलेश देवी की मौत के बाद, जब यह पूरा मामला सामने आया, तो KGMU प्रशासन में हड़कंप मच गया। प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई कि KGMU के रेजिडेंट डॉक्टर ने ही विनय दुबे को निजी अस्पताल में शिफ्ट करने की सलाह दी थी और फिर निजी अस्पताल में गलत ब्लड ग्रुप चढ़ाने से मरीज की मौत हुई।
KGMU प्रशासन ने तुरंत दावा किया कि उन्होंने इस मामले की रिपोर्ट शासन को भेज दी है और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन असल में हुआ क्या? संबंधित रेजिडेंट डॉक्टर, जिसके खिलाफ आरोपों का पहाड़ था, उसका स्थानांतरण बॉन्ड के तहत लोहिया संस्थान में कर दिया गया।
लेकिन उसके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई, कोई एफआईआर, कोई सस्पेंशन आज तक नहीं हुआ है।
दूसरी तरफ, वह निजी अस्पताल, जहाँ गलत ब्लड ग्रुप का खून चढ़ाया गया था, उस पर भी स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई सिर्फ एक नोटिस तक ही सीमित रही। सोचिए, एक अस्पताल की लापरवाही से एक इंसान की जान चली जाती है, और उन्हें सिर्फ एक नोटिस देकर छोड़ दिया जाता है! यह दिखाता है कि कैसे सिस्टम में बैठे कुछ लोग दोषियों को बचाने में लगे हैं।
परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है, लेकिन उन्हें सिर्फ ठेंगा दिखाया जा रहा है।
न्याय की आस में परिजन
आज भी विनय दुबे और उनका परिवार कमलेश देवी की मौत के लिए न्याय का इंतजार कर रहा है। उन्होंने हर दरवाजा खटखटाया है, हर अधिकारी से गुहार लगाई है, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासन मिलते हैं।
रेजिडेंट डॉक्टर आज भी अपनी ड्यूटी पर है, निजी अस्पताल भी बिना किसी खास रोकटोक के चल रहा है, और जिसने एक महिला की जान ले ली, वह ब्लड बैंक भी अपनी जगह पर बरकरार है। यह मामला सिर्फ एक महिला की मौत का नहीं है, यह उस भरोसे की मौत का भी है, जो लोग सरकारी अस्पतालों पर करते हैं।
यह उस सिस्टम की विफलता का प्रतीक है, जहाँ लापरवाही की इतनी बड़ी कीमत चुकाने के बावजूद, दोषियों को सजा नहीं मिलती। विनय दुबे का कहना है कि वे तब तक चैन से नहीं बैठेंगे, जब तक उनकी पत्नी को इंसाफ नहीं मिल जाता।
यह देखना बाकी है कि क्या सरकार और स्वास्थ्य विभाग उनकी पुकार सुनेंगे और दोषियों के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाएंगे, या यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा।

