नई दिल्ली: देश की राजनीति में इन दिनों एक बड़े उलटफेर की खबर सामने आई है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। ये खबर उन हजारों-लाखों छात्रों और उनके माता-पिता के लिए एक बड़ी राहत या शायद एक नए मोड़ की तरह है, जो पिछले कई दिनों से नीट (NEET) परीक्षा में हुई कथित धांधली और पेपर लीक के मसले पर सरकार से जवाब मांग रहे थे। जंतर-मंतर पर 36 दिन से चला आ रहा धरना-प्रदर्शन, जिसका नेतृत्व 'कॉकरोच जनता पार्टी' कर रही थी, आखिरकार रंग ले आया है। इस समूह ने साफ कह दिया था कि उन्हें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कम कुछ भी मंजूर नहीं होगा, और अब यह मांग पूरी होती दिख रही है।
नीट परीक्षा और विवाद की जड़ क्या थी?
सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि नीट की परीक्षा इतनी अहम क्यों है। नीट यानी नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट, देश भर के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस (MBBS) और बीडीएस (BDS) जैसे प्रोफेशनल कोर्स में दाखिले के लिए एक बेहद प्रतिस्पर्धी एग्जाम है।
हर साल लाखों छात्र इस परीक्षा के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, डॉक्टर बनने का सपना देखते हैं। इस साल की परीक्षा को लेकर शुरुआत से ही विवाद गहराया हुआ था।
परीक्षा में कई अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं, जिसमें सबसे बड़ी बात पेपर लीक की थी। खबरें आईं कि परीक्षा से पहले ही कुछ सेंटर्स पर पेपर लीक हो गया, जिससे परीक्षा की शुचिता पर सवाल उठ गए।
इस कथित पेपर लीक के बाद देश भर के छात्र सड़कों पर उतर आए। सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक, हर जगह छात्रों का गुस्सा और उनकी निराशा साफ देखी जा सकती थी।
उनका आरोप था कि इस धांधली की वजह से उन मेहनती छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ गया है, जिन्होंने पूरी ईमानदारी से पढ़ाई की थी। ऐसे में, सबकी निगाहें शिक्षा मंत्रालय और खासकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर टिकी थीं कि आखिर सरकार इस गंभीर मसले पर क्या कदम उठाती है।
कॉकरोच जनता पार्टी का 36 दिनों का आंदोलन क्या था?
जब नीट विवाद गरमाया तो कई छात्र संगठन और सामाजिक समूह विरोध में उतर आए। इन्हीं में से एक था 'कॉकरोच जनता पार्टी'।
यह नाम सुनने में थोड़ा अटपटा लग सकता है, लेकिन इस आंदोलनकारी समूह ने अपनी मांगों को लेकर जबरदस्त दृढ़ता दिखाई। उन्होंने राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेरा डाल दिया और पिछले 36 दिनों से लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहे थे।
इनकी मुख्य मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा थी। उनका तर्क था कि चूंकि यह मामला शिक्षा मंत्रालय से जुड़ा है और देश के भविष्य यानी छात्रों के साथ खिलवाड़ हुआ है, तो इसकी नैतिक जिम्मेदारी शिक्षा मंत्री की बनती है।
"हम तब तक नहीं उठेंगे जब तक शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं दे देते। छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं।
" - अभिजीत दीपके
इस आंदोलन में छात्रों के साथ-साथ कई अभिभावक और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हुए। उन्होंने बार-बार सरकार से अपील की कि वे छात्रों की सुनें और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें।
उनका मानना था कि सिर्फ परीक्षा रद्द करने या दोबारा कराने से बात नहीं बनेगी, बल्कि जो लोग इस पूरे सिस्टम में खामी के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। यह धरना-प्रदर्शन सरकार पर लगातार दबाव बना रहा था और अब ऐसा लगता है कि इस दबाव ने अपना काम कर दिया है।
धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफे की जानकारी कैसे दी?


शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे की जानकारी खुद अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दी। उन्होंने एक लेटर जारी किया, जिसमें उन्होंने अपने पद से मुक्त होने की बात कही। आमतौर पर बड़े राजनीतिक पदों से इस्तीफे की खबर या तो प्रधानमंत्री कार्यालय से आती है या संबंधित मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसकी घोषणा करते हैं। लेकिन यहां धर्मेंद्र प्रधान ने खुद ही इस बात को पब्लिक किया, जिससे साफ है कि यह फैसला काफी जल्दबाजी में और सीधे तौर पर नीट विवाद से उपजे दबाव का नतीजा है।
हालांकि, उनके इस्तीफे का यह मतलब नहीं है कि नीट विवाद खत्म हो गया है। बल्कि, यह एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है।
अब सवाल यह है कि सरकार इस परीक्षा में सुधार के लिए क्या बड़े कदम उठाती है और क्या इससे छात्रों का भरोसा बहाल हो पाएगा? यह एक बड़ा चैलेंज है, जिस पर सरकार को गंभीरता से काम करना होगा। छात्रों के भविष्य का मामला है, कोई छोटी-मोटी बात नहीं।
इस इस्तीफे से उन छात्रों को क्या मैसेज मिलता है जो अब भी न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं? क्या यह कार्रवाई पूरी व्यवस्था में सुधार का संकेत है या सिर्फ एक बलि का बकरा? आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस दिशा में आगे क्या करती है। फिलहाल, इतना साफ है कि देश में छात्रों की आवाज को दबाया नहीं जा सकता और विरोध प्रदर्शनों में इतनी ताकत है कि वे सरकार को फैसले बदलने पर मजबूर कर सकते हैं।




































