नई दिल्ली: नीट 2026 के नतीजे आए नहीं कि एक बार फिर देश के लाखों मेडिकल उम्मीदवारों के दिल की धड़कनें तेज हो गईं। हर कोई अपने स्कोर और रैंक के हिसाब से कॉलेजों की तलाश में जुट गया है। लेकिन, इस बार जो बात सामने आ रही है, वो चौंकाने वाली है। आपको पता है, नीट में एक ही स्कोर लाने पर भी दो राज्यों के बच्चों की किस्मत में जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है? एक को शानदार सरकारी कॉलेज मिल जाता है, वहीं दूसरा दाखिले से बाहर रह जाता है। आज हम इसी पहेली को सुलझाएंगे और बताएंगे कि कैसे भारत में कुछ राज्य मेडिकल शिक्षा का मक्का बन गए हैं, जबकि कुछ राज्य अपने बच्चों को सपना पूरा करने के लिए तरसा रहे हैं।
आज की हमारी कहानी कर्नाटक और बिहार के बीच की है। ये सिर्फ दो राज्यों की तुलना नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई का आईना है, जो बताता है कि स्वास्थ्य और शिक्षा के मोर्चे पर हमारा देश किस कदर असमानता से जूझ रहा है।
जहां एक राज्य में हर लाख आबादी पर एमबीबीएस की 22 से ज्यादा सीटें हैं, वहीं दूसरे में ये आंकड़ा सिर्फ 3 के आसपास सिमट जाता है। सोचिए, कंपटीशन का लेवल कितना अलग हो जाता होगा!
तो आखिर कर्नाटक में ऐसी क्या बात है जो उसे 'मक्का' बना रही है?
ताज़ा रिपोर्टों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि कर्नाटक मेडिकल सीटों के मामले में सचमुच कमाल कर रहा है। यहां सरकारी और प्राइवेट, दोनों तरह के कुल 75 मेडिकल कॉलेज हैं।
जी हां, पूरे 75 कॉलेज! इन कॉलेजों में एमबीबीएस की कुल 15,395 सीटें उपलब्ध हैं। राज्य की आबादी करीब 6.91 करोड़ है, और इस हिसाब से अगर हम देखें तो कर्नाटक में प्रति एक लाख आबादी पर 22.3 एमबीबीएस सीटें मिलती हैं।
यह आंकड़ा बताता है कि वहां के छात्रों के लिए मेडिकल की पढ़ाई करना कितना आसान है, कम से कम सीटों के लिहाज से तो काफी बेहतर स्थिति है। इतनी सीटें होने का सीधा मतलब है कि वहां के बच्चों को अपेक्षाकृत कम नंबरों पर भी सरकारी कॉलेज मिलने की संभावना रहती है।

इस साल नीट परीक्षा में देश भर में करीब 23 लाख बच्चे शामिल हुए थे। (फोटो- पीटीआई)
और बिहार का क्या हाल है, जहां बच्चों का सपना टूट जाता है?
अब बात करते हैं बिहार की। भारत के सबसे बड़े और पुराने राज्यों में से एक, लेकिन विकास के कई मानकों पर आज भी पिछड़ा हुआ।
मेडिकल सीटों के मामले में भी बिहार की कहानी कुछ खास अच्छी नहीं है। राज्य में कुल 26 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें सरकारी और प्राइवेट, दोनों शामिल हैं।
इन कॉलेजों में एमबीबीएस की कुल 4,160 सीटें ही उपलब्ध हैं। अगर हम बिहार की आबादी लगभग 12.5 करोड़ (अनुमानित) को ध्यान में रखें तो प्रति एक लाख आबादी पर यहां सिर्फ 3.1 एमबीबीएस सीटें ही आती हैं।
आप खुद देखिए, कर्नाटक के मुकाबले ये आंकड़ा करीब सात गुना कम है।
ये आंकड़े केवल नंबर नहीं हैं, बल्कि ये दोनों राज्यों की स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा नीति की प्राथमिकता को दिखाते हैं। जहां कर्नाटक ने मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया है, वहीं बिहार इस मोर्चे पर अभी भी काफी पीछे है।
इस भारी अंतर का खामियाजा सीधे-सीधे उन मेहनती बच्चों को भुगतना पड़ता है जो डॉक्टर बनने का सपना देखते हैं।
क्या है होम कोटा का खेल और इसका क्या असर होता है?
मेडिकल दाखिलों में एक बहुत अहम कॉन्सेप्ट होता है 'होम कोटा'। इसका मतलब है कि किसी भी राज्य के मेडिकल कॉलेजों की 85 फीसदी एमबीबीएस सीटें उसी राज्य के बच्चों के लिए आरक्षित होती हैं।
बाकी 15 फीसदी सीटें ऑल इंडिया कोटा के तहत आती हैं। यानी, कर्नाटक की 85 फीसदी सीटें कर्नाटक के बच्चों के लिए, और बिहार की 85 फीसदी सीटें बिहार के बच्चों के लिए।
अब आप समझ सकते हैं कि जहां सीटें पहले से ही कम हों, वहां होम कोटा भी छात्रों के लिए कितना बड़ा चैलेंज बन जाता है। कर्नाटक में चूंकि सीटें ज्यादा हैं, तो वहां के बच्चों को होम कोटे का बड़ा फायदा मिलता है।
कितने नंबर पर मिलता है सरकारी कॉलेज, यहां देखिए पूरा हिसाब-किताब!
बात सिर्फ सीटों की संख्या की नहीं है, बात कटऑफ स्कोर की भी है। एजुकेशन वेबसाइट्स और एक्सपर्ट्स के आकलन बताते हैं कि कटऑफ में भी बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है।
हमने आपके लिए दोनों राज्यों के संभावित कटऑफ स्कोर का एक तुलनात्मक विश्लेषण तैयार किया है:
वर्ग | कर्नाटक (सरकारी कॉलेज के लिए संभावित NEET स्कोर) | बिहार (सरकारी कॉलेज के लिए संभावित NEET स्कोर) |
|---|---|---|
जनरल | 540+ | 615+ |
EBC/OBC | 530+ | 590-600 |
SC/ST | 450+ | 470+ |
ये आंकड़े देखकर आप समझ गए होंगे कि अंतर कितना बड़ा है। जहां कर्नाटक का एक जनरल कैटेगरी का छात्र 540 नंबर पर सरकारी एमबीबीएस सीट हासिल कर सकता है, वहीं बिहार के छात्र को उसी सीट के लिए कम से कम 615 नंबर लाने होंगे।
यानी, करीब 75 नंबरों का फर्क! सोचिए, नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षा में जहां एक-एक नंबर पर हजारों रैंक का अंतर आता है, वहां 70-75 नंबरों का ये फासला कितना मायने रखता होगा।
"नीट परीक्षा में कर्नाटक का एक बच्चा बिहार की तुलना में 70 से 75 नंबर कम लाकर सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस सीट हासिल कर सकता है।"
कर्नाटक ने इस साल 2026 में 1300 नई सीटें जोड़ी हैं, जिससे वहां की कुल सीटों की संख्या 15,395 हो गई है (4400 सरकारी और 10,995 निजी/डीम्ड)। वहीं, बिहार में सरकारी सीटों का आंकड़ा सिर्फ 1710 है, जबकि निजी कॉलेजों में 2450 सीटें हैं।
ये बढ़ोतरी और सीटों का वितरण भी राज्यों की प्राथमिकताओं को साफ दिखाते हैं।
अब आप खुद ही फैसला कीजिए, एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए कर्नाटक को 'मक्का' कहना क्या गलत होगा? ये आंकड़े सिर्फ छात्रों की मेहनत का नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों और राज्य के विकास के एजेंडे का भी लेखा-जोखा हैं। आखिर उन बच्चों का क्या कसूर, जो दिन-रात एक करके मेहनत करते हैं, लेकिन सिर्फ इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि वे एक ऐसे राज्य से हैं जहां मेडिकल सीटों की कमी है? क्या ये उनके सपनों के साथ एक तरह का अन्याय नहीं है?








































