धर्म डेस्क: ओडिशा का वो कोना जहां समंदर की लहरों से भी ऊंची उठती है आस्था की लहर... बात हो रही है पुरी की, जहां जगन्नाथ भगवान की ऐतिहासिक रथयात्रा की तैयारियां जोरों पर हैं। आज ये भव्य और ऐतिहासिक यात्रा पूरे उल्लास के साथ निकाली जाएगी। कल्पना कीजिए, लाखों भक्तों का जनसैलाब, उनके हाथों से खिंचते विशाल रथ, 'जय जगन्नाथ' के उद्घोष से गूंजता आसमान... यह सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि एक अद्भुत अनुभव है जो हर साल देश-विदेश से श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचता है।
मंदिर समिति ने बताया है कि गुरुवार की सुबह छह बजे से पूजा-अर्चना शुरू होगी और भक्तों के लिए मंदिर के पट खोल दिए जाएंगे। इसके बाद, शाम चार बजे का समय तय किया गया है जब भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और लाड़ली बहन सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर विराजमान होंगे।
फिर शुरू होगी वो विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा, जिसमें भक्त पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ रथों की डोर खींचते हैं, मानो सीधे अपने आराध्य देव को अपने करीब खींच रहे हों। लेकिन क्या आपको पता है, इस महाउत्सव के बीच एक अनकही और बेहद दिलचस्प कहानी भी छुपी है? एक ऐसी कहानी जिसमें धन की देवी मां लक्ष्मी अपने ही पति, जगन्नाथ भगवान से नाराज हो जाती हैं।
जी हां, ये कोई मामूली किस्सा नहीं, बल्कि एक अनोखी लीला है जिसे 'हेरा पंचमी' के नाम से जाना जाता है और पुरी में आज भी इसका मंचन होता है।
आखिर क्या है हेरा पंचमी और लक्ष्मी जी की नाराजगी का राज?
यह सुनकर शायद आप थोड़ा हैरान हों कि भला मां लक्ष्मी अपने पति से क्यों नाराज होंगी, वो भी ऐसे पवित्र अवसर पर? 'हेरा पंचमी' शब्द अपने आप में ही इस पूरी कहानी को समेटे हुए है। संस्कृत में 'हेरा' का अर्थ होता है 'खोजना' या 'ढूंढना', और 'पंचमी' का मतलब है 'पांचवां दिन'।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जगन्नाथ रथयात्रा शुरू होने के पांचवें दिन इस हेरा पंचमी का विशेष पर्व मनाया जाता है। हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह खास दिन आता है।
यह वो दिन है जब धन की देवी लक्ष्मी, अपने पति भगवान जगन्नाथ से मिलने के लिए गुंडिचा मंदिर तक जाती हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि पत्नी अपने पति से मिलने जा रही है, तो इसमें नाराजगी का क्या काम? कहानी यहीं से दिलचस्प मोड़ लेती है और भक्तों को एक गहरा संदेश भी देती है।
गुंडिचा मंदिर में क्यों रुक जाते हैं भगवान जगन्नाथ, क्या है इसकी वजह?
दरअसल, जगन्नाथ भगवान जब अपनी रथयात्रा पर निकलते हैं, तो उनके साथ होते हैं उनके बड़े भाई बलभद्र और लाड़ली बहन सुभद्रा। ये तीनों ही अपनी मौसी के घर, यानी गुंडिचा मंदिर जाते हैं।
इस मंदिर को भगवान का 'जन्म स्थान' भी माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि रथयात्रा पर निकलने से पहले भगवान जगन्नाथ, अपनी प्रिय पत्नी माता लक्ष्मी से वादा करते हैं कि वे जल्दी ही वापस लौट आएंगे।
वे उन्हें आश्वासन देते हैं कि चिंता न करें, कुछ ही दिनों में मैं वापस आ जाऊंगा।
लेकिन मौसी के घर का सुख और वहां का आतिथ्य शायद भगवान को इतना भा जाता है कि वे वहां कुछ दिन रुक जाते हैं। परंपरा के अनुसार, भगवान नौ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में वास करते हैं।
वापस लौटने में तय समय से अधिक देर हो जाती है। अब जरा सोचिए, कोई आपसे वादा करके जाए कि मैं जल्दी लौटूंगा और फिर वापस आने में देरी कर दे, तो आपको चिंता और गुस्सा नहीं आएगा क्या? बिल्कुल ऐसा ही कुछ माता लक्ष्मी के साथ भी होता है।
उनकी चिंता धीरे-धीरे नाराजगी में बदलने लगती है।
जब भगवान जगन्नाथ तय समय पर नहीं लौटते, तो माता लक्ष्मी को उनकी चिंता सताने लगती है। उन्हें लगता है कि उनके पति उनसे किया वादा भूल गए हैं।
इसी नाराजगी और चिंता के साथ माता लक्ष्मी, गुंडिचा मंदिर की ओर रुख करती हैं। रथयात्रा के पांचवें दिन, यानी हेरा पंचमी पर, माता लक्ष्मी एक सुंदर पालकी में सवार होकर अपने दल-बल के साथ गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं।
उनका उद्देश्य सिर्फ भगवान जगन्नाथ से मिलना नहीं होता, बल्कि उनसे अपनी शिकायतें दर्ज कराना और अपने मन की व्यथा बताना भी होता है।
गुस्से में लक्ष्मी माता ने क्यों तोड़ दिया नंदिघोष रथ का हिस्सा?
गुंडिचा मंदिर पहुंचने पर, माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ से अपनी व्यथा सुनाती हैं। वे कहती हैं कि आपने तो जल्दी लौटने का वादा किया था, लेकिन आप तो मौसी के घर ही ठहर गए।
मेरी चिंता का क्या? आपने मुझे अकेला छोड़ दिया। इस पर भगवान जगन्नाथ उन्हें मनाने की कोशिश करते हैं और जल्दी लौटने का आश्वासन देते हैं।
वे कहते हैं कि मैं बस कुछ और दिनों में वापस आ जाऊंगा। लेकिन जैसा कि अक्सर रूठी हुई पत्नियों के साथ होता है, माता लक्ष्मी इतनी आसानी से नहीं मानतीं।
भगवान के तर्क उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाते। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अपनी इस तीव्र नाराजगी और क्रोध में माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के विशाल रथ, जिसे 'नंदिघोष' के नाम से जाना जाता है, उसके एक हिस्से को गुस्से में तोड़ देती हैं। यह लीला भक्तों को यह संदेश देती है कि प्रेम और प्रतीक्षा का सम्मान हर रिश्ते में कितना महत्वपूर्ण है, यहां तक कि भगवान और देवी के रिश्ते में भी।
यह घटना प्रतीक है उस मानवीय भावना का, जब प्रेम में किया गया वादा टूटता है तो कैसी प्रतिक्रिया होती है।
रथ का एक हिस्सा तोड़ने के बाद, माता लक्ष्मी वहां से वापस लौट जाती हैं। इसके बाद भगवान जगन्नाथ उन्हें कई तरह से मनाने का प्रयास करते हैं और अपनी गलती का एहसास करते हैं।
यह लीला आज भी पुरी में भक्तों के सामने हेरा गोहा के रूप में बड़े ही भावुक ढंग से दर्शायी जाती है। इस घटना के बाद से ही हर साल हेरा पंचमी के दिन माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
यह त्योहार हमें सिखाता है कि रिश्तों में संतुलन, सम्मान और वादों का पालन कितना जरूरी है। यह सिर्फ एक धार्मिक कहानी नहीं, बल्कि रिश्तों की बारीकियों को समझाने वाली एक सुंदर परंपरा है।
इस तरह, भव्य रथयात्रा के दौरान भक्त न केवल भगवान के दर्शन करते हैं, बल्कि इस अनोखी लीला के माध्यम से रिश्तों की पवित्रता और उसके अलग-अलग रंगों को भी समझते हैं। यह हमें बताता है कि भगवान भी मानवीय भावनाओं से अछूते नहीं हैं और वे भी रिश्तों में आने वाली चुनौतियों का सामना करते हैं।
तो अगली बार जब आप जगन्नाथ रथयात्रा के बारे में सुनें या टीवी पर देखें, तो इस हेरा पंचमी की कहानी को भी याद रखिएगा। यह सिर्फ रथों का चलना नहीं, बल्कि भावनाओं, वादों और कभी-कभी नाराजगी का भी एक अद्भुत संगम है, जो हमारी पौराणिक कथाओं को और भी जीवंत बना देता है।
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की यह यात्रा हमें जीवन के कई अनमोल पाठ पढ़ाती है।









































