ज्योतिष डेस्क: साल 2026 का जुलाई महीना चल रहा है और इस वक्त हिंदी पंचांग के हिसाब से आषाढ़ का महीना अपने पूरे रंग में है। ये महीना सिर्फ बारिश के लिए नहीं जाना जाता, बल्कि इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व भी कुछ कम नहीं है। अब इसी आषाढ़ महीने में एक ऐसा दुर्लभ मौका आया है, जो भक्तों को एक साथ कई पुण्य कमाने का अवसर दे रहा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं आषाढ़ अमावस्या की, लेकिन इस बार ये कोई साधारण अमावस्या नहीं है, बल्कि इस पर एक ऐसा महासंयोग बन रहा है, जिसमें आपको सोमवती और भौमवती अमावस्या दोनों का फल एक साथ मिलेगा। सोचिए, एक ही दिन में भोलेनाथ और बजरंगबली दोनों की कृपा पाने का चांस! ये मौका सदियों में एक बार आता है, इसलिए इसे हाथ से जाने देना बिल्कुल समझदारी नहीं होगी।
आषाढ़ अमावस्या 2026 में क्या है खास?
बता दें कि इस बार आषाढ़ अमावस्या का सबसे बड़ा ट्विस्ट यही है कि ये सिर्फ एक दिन की नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत सोमवार शाम से हो रही है और ये खत्म होगी मंगलवार दोपहर को। अब चूंकि अमावस्या तिथि सोमवार को शुरू होकर मंगलवार तक चल रही है, तो सीधा मतलब ये है कि इसमें सोमवती अमावस्या और भौमवती अमावस्या दोनों का पुण्य फल समाहित हो गया है।
यानी एक टिकट में डबल मजा! इस महासंयोग में आप एक साथ महादेव की आराधना कर सकते हैं, मंगल देव की कृपा पा सकते हैं और अपनी कुंडली के कई गंभीर दोषों को जड़ से खत्म करने के उपाय भी कर सकते हैं। ये वाकई में एक अद्भुत संयोग है, जिसका लाभ हर किसी को उठाना चाहिए।
कब से कब तक है ये शुभ मुहूर्त?
अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये पुण्यकाल कब से शुरू होगा और कब तक चलेगा, ताकि आप अपनी पूजा-पाठ और स्नान-दान का प्लान बना सकें। तो ध्यान दीजिए, पंचांग के हिसाब से अमावस्या तिथि की शुरुआत 13 जुलाई 2026, सोमवार को शाम 06:50 बजे से हो रही है।
और ये तिथि अगले दिन यानी 14 जुलाई 2026, मंगलवार को दोपहर 03:14 बजे तक रहेगी। हालांकि, स्नान-दान के लिए जो सबसे उत्तम और श्रेष्ठ समय माना गया है, वो है 14 जुलाई की सुबह 04:30 बजे से लेकर सुबह 10:43 बजे तक।
इसका कारण है उदयातिथि। ज्योतिष शास्त्र में उदयातिथि का विशेष महत्व होता है, और इसी के कारण मुख्य स्नान-दान मंगलवार को होगा।
इस दिन सोमवार का दिन, प्रदोष काल और निशिता मुहूर्त का महासंयोग शिव साधना के लिए तो समझिए सोने पर सुहागा है।
भोलेनाथ की पूजा से कौन से दोष होंगे दूर?
जब अमावस्या सोमवार के दिन पड़ती है, तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं और ये भगवान शिव की पूजा के लिए बहुत ही खास मानी जाती है। इस दिन महादेव की आराधना से कई तरह के दोषों से मुक्ति मिल सकती है।
पहला और सबसे अहम है पितृ दोष। अगर आपकी कुंडली में पितृ दोष है, तो सोमवार की शाम किसी भी शिव मंदिर में जाकर कच्चे दूध और गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करें।
इसके साथ ही 'महामृत्युंजय मंत्र' का जाप करना पितृ दोष को शांत करने में बहुत सहायक होता है। भगवान शिव को नागों का स्वामी भी कहा जाता है, तो अगर आपकी कुंडली में कालसर्प दोष है, तो आज रात शिवलिंग पर तांबे के लोटे से जल चढ़ाना और 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जप करना इस दोष के प्रभाव को कम करता है।
इसके अलावा, अमावस्या के दिन चंद्रमा अदृश्य होता है, जिसकी वजह से कई लोगों को मानसिक तनाव और बेचैनी महसूस होती है। शिव जी की पूजा से कुंडली में पीड़ित चंद्रमा मजबूत होता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है और तनाव कम होता है।
तो देखा आपने, एक ही पूजा से कितने सारे कष्ट दूर हो सकते हैं!
भौमवती अमावस्या से क्या मिलेगा फायदा?
अब बात करते हैं भौमवती अमावस्या की, जिसका लाभ भी आपको इसी महासंयोग में मिल रहा है। जब अमावस्या तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है, तो उसे 'भौमवती अमावस्या' कहते हैं।
ये दिन हनुमान जी, मंगल देव और हमारे पितरों की साधना के लिए बहुत ही कल्याणकारी माना गया है। 14 जुलाई को दोपहर के समय, यानी जब भौमवती अमावस्या का प्रभाव रहेगा, उस वक्त आप अपने पितरों का तर्पण, श्राद्ध या धूप-ध्यान कर सकते हैं।
मान्यता है कि ऐसा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। अक्षय पुण्य यानी वो पुण्य जो कभी खत्म नहीं होता और कई जन्मों तक आपके साथ रहता है।
इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने के बाद, अपनी क्षमतानुसार जरूरतमंदों को तिल, गुड़, वस्त्र या अन्न का दान करना चाहिए। ऐसा करने से परिवार को पितरों का अखंड आशीर्वाद मिलता है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।
मंगल देव भी प्रसन्न होते हैं, जिससे जीवन में भूमि, भवन और पराक्रम संबंधी बाधाएं दूर होती हैं।
पूजा करने का सही तरीका क्या है?
चलिए, अब ये भी जान लेते हैं कि इस महासंयोग का पूरा लाभ उठाने के लिए पूजा कैसे करें। सबसे पहले तो, घर में नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
इससे शरीर और मन दोनों पवित्र होते हैं। स्नान के बाद, साफ वस्त्र पहनकर हाथ में जल लेकर व्रत या पूजा का संकल्प लें।
अगर आप व्रत नहीं रख सकते, तो सिर्फ पूजा का संकल्प ही काफी है। इसके बाद, अपने पास के किसी शिव मंदिर में जाएं।
वहां शिवलिंग पर गाय का कच्चा दूध, दही, शहद और शुद्ध गंगाजल अर्पित करें। इसे रुद्राभिषेक भी कहते हैं।
महादेव को अक्षत (चावल), बेलपत्र, धतूरा और शमी पत्र भी चढ़ाएं। 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करें।
हनुमान जी की कृपा पाने के लिए हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ कर सकते हैं। पितरों के लिए तर्पण और दान का विशेष महत्व है, इसलिए इस दिन दान करना न भूलें।
कुल मिलाकर, श्रद्धा और भक्ति से की गई पूजा इस दुर्लभ संयोग में आपको अतुलनीय लाभ दिलाएगी।








































