दिल्ली: ऑनलाइन शॉपिंग की दुनिया में नाम कमाने वाली ई-कॉमर्स दिग्गज फ्लिपकार्ट, अब एक बड़े सौदे की तैयारी में है। खबर है कि कंपनी अपने लॉजिस्टिक्स पार्टनर शैडोफैक्स टेक्नोलॉजीज में अपनी बड़ी हिस्सेदारी बेचने जा रही है। यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं, बल्कि पूरे 700 से 750 करोड़ रुपये का खेल है। शेयर बाजार के खिलाड़ियों की नज़र इस ब्लॉक डील पर बनी हुई है, क्योंकि इसका असर कई मायनों में दिख सकता है।
शैडोफैक्स, जो आजकल भारत की तेज़ी से बढ़ती हुई लॉजिस्टिक्स कंपनियों में से एक है, फ्लिपकार्ट के लिए लास्ट-माइल डिलीवरी की रीढ़ की हड्डी बन चुकी है। सोचिए, जब सेल का मौसम आता है या त्योहारों के दौरान ऑर्डर की बाढ़ आती है, तब फ्लिपकार्ट को इस तरह के पार्टनर्स की कितनी ज़रूरत पड़ती है।
शैडोफैक्स हाइपरलोकल और ई-कॉमर्स दोनों तरह की शिपमेंट्स को संभालती है, खास करके तब जब फ्लिपकार्ट का अपना नेटवर्क दबाव में होता है। कई ऐसे कारोबार भी हैं जो पूरी तरह से थर्ड-पार्टी लॉजिस्टिक्स पर निर्भर हैं, और शैडोफैक्स उनके लिए भी एक अहम प्लेयर है।
फ्लिपकार्ट ने शैडोफैक्स में पहली बार साल 2019 में पैसा लगाया था। उसके बाद भी कंपनी ने शैडोफैक्स के कई फंडिंग राउंड्स में सपोर्ट किया।
यह एक तरह से उनका लंबा साथ रहा है, जहां एक ने दूसरे के ग्रोथ में अहम भूमिका निभाई।
आखिर फ्लिपकार्ट क्यों बेच रही है अपनी हिस्सेदारी?
बाजार में ऐसी हलचल है कि फ्लिपकार्ट जुलाई महीने के आखिर में शैडोफैक्स में अपने शेयर बेच सकती है। इसके पीछे एक बड़ी वजह है – 'लॉक-इन पीरियड' का खत्म होना।
शैडोफैक्स टेक्नोलॉजीज जनवरी 2026 में शेयर बाजारों में लिस्ट हुई थी, और अब उसके शेयरहोल्डर्स के लिए 6 महीने का लॉक-इन पीरियड जुलाई के आखिर में खत्म हो रहा है। इसका मतलब है कि जिन निवेशकों ने आईपीओ या उससे पहले कंपनी में निवेश किया था, वे अब अपने शेयर बेच सकते हैं।
फ्लिपकार्ट भी इसी श्रेणी में आती है।
शैडोफैक्स का आईपीओ करीब ₹1,907.27 करोड़ का था। तब भी, फ्लिपकार्ट ने 'ऑफर-फॉर-सेल' (OFS) के तहत कुछ शेयर बेचे थे और शैडोफैक्स में अपनी हिस्सेदारी घटाकर लगभग 8 प्रतिशत कर ली थी।
अब एक बार फिर, कंपनी अपनी होल्डिंग को कम करने की तैयारी में है।
कितने शेयर और कितने की है यह डील?
मौजूदा जानकारी के मुताबिक, फ्लिपकार्ट के पास शैडोफैक्स के लगभग 4.26 करोड़ शेयर हैं। बाजार में शैडोफैक्स का शेयर फिलहाल 230 रुपये के आसपास ट्रेड कर रहा है।
ऐसे में, फ्लिपकार्ट 700-750 करोड़ रुपये के शेयर बेचने की योजना बना रही है, जिसका मतलब है कि करीब 3.37 करोड़ शेयर बेचे जा सकते हैं। अगर यह डील फाइनल होती है, तो फ्लिपकार्ट की शैडोफैक्स में हिस्सेदारी सिर्फ लगभग 2 प्रतिशत रह जाएगी।
यह डील आने वाले हफ्तों में होने की उम्मीद है। हालांकि, यहां एक और बड़ा पेंच है जिसकी चर्चा होना ज़रूरी है।
क्या है यह 'मिनिमम प्रमोटर कॉन्ट्रिब्यूशन' का पेंच?
आप सोच रहे होंगे कि अगर फ्लिपकार्ट इतने बड़े शेयर बेच रही है, तो क्या वह पूरी तरह से शैडोफैक्स से बाहर निकल जाएगी? तो जवाब है - नहीं। फ्लिपकार्ट शैडोफैक्स में अपनी पूरी हिस्सेदारी नहीं बेच सकती।
उसके पास अभी भी जो 4.26 करोड़ शेयर हैं, उनमें से करीब 89 लाख शेयर ऐसे हैं जिन्हें कंपनी को अपने पास रखना होगा। इसकी वजह है 'मिनिमम प्रमोटर कॉन्ट्रिब्यूशन' (Minimum Promoter Contribution), जिसे शॉर्ट में MPC कहते हैं।
MPC एक तरह की न्यूनतम हिस्सेदारी है जिसे SEBI (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) आईपीओ के बाद लॉक-इन रखने के लिए अनिवार्य मानता है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रमोटर्स का कंपनी में लंबे समय तक हित बना रहे।
यह पब्लिक इनवेस्टर्स को भरोसा दिलाता है कि मुख्य शेयरधारक कंपनी लिस्ट होते ही तुरंत बाहर नहीं निकल जाएंगे। इन शेयरों पर आमतौर पर 18 महीने का अनिवार्य लॉक-इन पीरियड लागू होता है, जिस दौरान इन्हें बेचा नहीं जा सकता।
इसलिए, फ्लिपकार्ट को ये 89 लाख शेयर अपने पास रखने होंगे।
कुल मिलाकर, फ्लिपकार्ट का यह कदम एक बड़ी रणनीतिक चाल है। कंपनी अपने निवेश को भुना रही है, जबकि शैडोफैक्स के साथ उसका ऑपरेशनल रिश्ता बना रहेगा।
अब देखना होगा कि इस ब्लॉक डील पर बाजार कैसी प्रतिक्रिया देता है और शैडोफैक्स के शेयर की चाल क्या रहती है।




































