मनोरंजन डेस्क: बॉलीवुड और मराठी सिनेमा के जाने-माने फिल्ममेकर-एक्टर महेश मांजरेकर का नाम भला कौन नहीं जानता। लेकिन इस बार खबर उनसे नहीं, बल्कि उनकी पत्नी मेधा मांजरेकर से जुड़ी है, जो पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया से थोड़ी दूर थीं। अब उन्होंने एक ऐसी बात बताई है, जिसे सुनकर लोग उनके जज़्बे को सलाम कर रहे हैं। मेधा मांजरेकर ने हाल ही में अपने फैंस को बताया कि वो कैंसर जैसी भयानक बीमारी से जूझ रही हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक बेहद भावुक पोस्ट और अस्पताल की कुछ तस्वीरें शेयर कर अपनी इस लड़ाई का जिक्र किया है।
आम तौर पर लोग ऐसी बीमारियों का पता चलते ही टूट जाते हैं, लेकिन मेधा ने जो बताया, वो दिल छू लेने वाला है। उन्होंने अपनी बीमारी पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर ध्यान देने का फैसला किया, जिन्होंने इस मुश्किल सफर में उनका हाथ थामे रखा।
58 साल की इस एक्ट्रेस ने अपनी पोस्ट में जो कुछ लिखा है, वो बताता है कि हिम्मत और आस्था से इंसान बड़ी से बड़ी जंग कैसे जीत सकता है।
कैंसर से लड़ाई का सफ़र, और उसके पीछे की 'कृपा'?
मेधा मांजरेकर ने अपनी पोस्ट की शुरुआत कुछ ऐसे की थी, “ज़िंदगी में कुछ सफ़र ऐसे होते हैं जो आपको हमेशा के लिए बदल देते हैं। यह भी उनमें से एक है।
” वो बताती हैं कि जब उनके इलाज का एक दौर पूरा हो रहा था और जन्मदिन करीब आ रहा था, तो उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। लेकिन उन्होंने बीमारी का पता लगने, सर्जरी, कीमोथेरेपी या रेडिएशन पर ध्यान नहीं दिया।
फिर किस बात पर ध्यान दिया?
मेधा ने लिखा कि उन्हें वो 'कृपा' याद है, वो अदृश्य हाथ याद हैं, जिन्होंने हर दिन उन्हें संभाले रखा। वो कहती हैं कि लोग अक्सर उनसे पूछते हैं, 'आप इससे कैसे गुजरीं?' मेधा के लिए इसका जवाब बहुत सीधा है।
उन्होंने कभी भी ये मुश्किल सफ़र अकेले तय नहीं किया। जब भी उन्हें लगा कि अब वो और आगे नहीं बढ़ सकतीं, कोई न कोई उनके साथ चलने के लिए आ जाता था।
अब जब वो पीछे मुड़कर देखती हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि वो महज इत्तेफ़ाक नहीं थे। वो तो भगवान का तरीका था, उनका हाथ थामने का।
क्या आप भी नहीं मानते कि ऐसे ही छोटे-छोटे पल ही तो होते हैं, जब हमें लगने लगता है कि कोई अदृश्य शक्ति हमारे साथ है?
ईश्वर का हाथ, किस-किस रूप में साथ रहा?
मेधा ने अपनी इस जर्नी के बारे में आगे कहा कि इस अनुभव ने उनका विश्वास और भी मजबूत कर दिया है। उन्हें ये भी समझ आया कि जिंदगी की चुनौतियों के आगे खुद को सौंप देना कितना जरूरी है।
उन्होंने बताया कि इस पूरे सफर के दौरान, उन्हें एहसास हुआ कि भगवान हमेशा किसी दिव्य रूप में सामने नहीं आते। बल्कि वो उनकी ज़िंदगी में उनके गुरुओं, डॉक्टरों, नर्सों, परिवार, दोस्तों और यहां तक कि किसी अजनबी इंसान के रूप में आए, जो बाद में उनके लिए एक वरदान बन गया।
उनके गुरुओं ने उन्हें सिखाया कि समर्पण करना हार नहीं है, बल्कि ये तो आस्था का सबसे ऊंचा रूप है। एक बार जब उन्होंने खुद को समर्पित कर दिया, तो उन्होंने ये सवाल पूछना छोड़ दिया कि 'मेरे साथ ही क्यों हुआ?' और बस इस बात पर भरोसा किया कि हर चुनौती के पीछे कोई गहरा मकसद जरूर होता है।
ये बातें सिर्फ कहने भर की नहीं लगतीं, बल्कि उस इंसान के अनुभव से निकली हैं, जिसने असल में कैंसर जैसी बीमारी को करीब से देखा है और उससे लड़ा है।
बेटियों का साथ और बदलती भूमिकाएँ?
इस मुश्किल दौर में मेधा ने अपनी बेटियों, साई मांजरेकर और गौरी इंगवले के लिए भी एक बेहद प्यारा और भावुक नोट लिखा। उन्होंने अपनी बेटियों को धन्यवाद दिया कि उन्होंने इस पूरे इलाज के दौरान अपनी मां का साथ दिया।
अपनी बेटियों को संबोधित करते हुए मेधा ने लिखा, “मेरी बेटियों के लिए..
. एक मां अपनी ज़िंदगी यह सोचकर बिताती है कि हमेशा वही अपने बच्चों का हाथ थामे रहेगी।
” वो आगे कहती हैं, “इस सफ़र ने मुझे याद दिलाया कि एक दिन, बिना एहसास हुए ही, बच्चे अपनी माँ का हाथ थामने लगते हैं। मेरा हाथ थामने के लिए धन्यवाद।
” यह बात वाकई सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे समय के साथ रिश्ते में भूमिकाएं बदल जाती हैं और बच्चे भी अपने माता-पिता के सबसे बड़े सहारे बन जाते हैं। मेधा की ये कहानी सिर्फ बीमारी से लड़ने की नहीं, बल्कि रिश्तों की मजबूती और अटूट आस्था की भी कहानी है।





































