दिल्ली: सोचिए, एक आंदोलन, 26 दिन का अनशन और देश के सबसे ताकतवर कुर्सी पर बैठे प्रधानमंत्री का आधी रात को खुद वीडियो जारी करना। क्या ये महज इत्तेफाक था, या फिर देश के छात्रों के गुस्से ने दिल्ली की सल्तनत को सचमुच हिला दिया? जिस कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से मीम्स बनने लगे थे, वो प्रोटेस्ट अचानक इतना बड़ा कैसे हो गया कि मेदांता अस्पताल में खुद जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह जैसे बड़े मंत्री सोनम वांगचुक को मनाने पहुंच गए? जब 26 दिन के उपवास के बाद सोनम वांगचुक ने मुस्कुराते हुए अनशन तोड़ा और ऐलान किया कि सरकार ने बातें मान ली हैं – छात्रों पर FIR नहीं, मृतकों को मुआवजा मिलेगा, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनेगा, संसद में भी बात होगी – तो क्या ये मान लें कि कहानी खत्म हो गई? क्या वो युवा, जो सालों से परीक्षा की तैयारी कर रहा था और बार-बार पेपर लीक से फ्रस्ट्रेट हो रहा था, इसे अपनी जीत मानकर घर लौट जाएगा? या ये जीत अधूरी है, और अभी कई सवाल बाकी हैं?
ये वो सवाल हैं जो जंतर-मंतर से लेकर देश के हर घर में फिलहाल गूंज रहे हैं। क्या ये आंदोलन का दी एंड है, या फिर अभी इंटरवल भी नहीं हुआ? आज हम इसी कहानी के कई अनसुने पहलू खोलेंगे।
पेपर लीक के खिलाफ आखिर ये आंदोलन शुरू कैसे हुआ?
सबसे पहले बात करते हैं इस आंदोलन की बुनियाद की। पिछले कई सालों से देश में सरकारी नौकरियों के लिए होने वाली परीक्षाओं में पेपर लीक एक बड़ी बीमारी बन चुका था।
एक-दो नहीं, बल्कि पिछले सात सालों में 70 से ज्यादा पेपर लीक हुए। सोचिए, एक छात्र अपनी जवानी के कई साल किताबों में खपाता है, दिन-रात एक करता है, मां-बाप का पैसा लगाता है, और फिर पता चलता है कि पेपर पहले ही बिक चुका है।
उनका गुस्सा जायज था। इसी गुस्से ने छोटे-छोटे प्रदर्शनों को जन्म दिया, जिन्हें बाद में “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे नाम मिले, क्योंकि सरकार उन्हें बार-बार कुचलने की कोशिश करती रही, लेकिन वो फिर उठ खड़े होते थे, ठीक कॉकरोच की तरह।
इस आंदोलन को एक नया मुकाम दिया सोनम वांगचुक ने। वही सोनम वांगचुक, जिनकी कहानी पर '3 इडियट्स' फिल्म बनी थी।
उन्होंने छात्रों की आवाज में अपनी आवाज मिलाई और 26 दिनों का अन्न त्याग दिया। उनका यह अनशन सिर्फ अनशन नहीं था, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक मजबूत स्टैंड था।
देशभर से उन्हें समर्थन मिला और यह मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया।
सरकार को आधी रात को क्यों जागना पड़ा?
ये अपने आप में एक ऐतिहासिक पल था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आधी रात को खुद फोन से वीडियो रिकॉर्ड करते हैं और "मित्रों" की जगह "फ्रेंड्स" कहकर छात्रों को संबोधित करते हैं। उन्होंने कहा कि वो इस मामले को लेकर बहुत सीरियस हैं और लड़ाई आगे चलेगी, कड़ी सजा दी जाएगी।
फास्ट ट्रैक कोर्ट का ऐलान किया गया, शिक्षा विभाग के सेक्रेटरी विनीत जोशी को हटा दिया गया, और मृतकों के परिवारों को मुआवजा देने की बात भी कही गई। सवाल यह है कि 26 दिनों तक चुपचाप बैठी सरकार को अचानक बीते 24 घंटों में इतनी तेजी क्यों दिखानी पड़ी?
क्या ये जंतर-मंतर की उस भीड़ का डर था, जो सड़क से संसद की ओर कूच करने को तैयार थी, पुलिस की लाठियों से भी नहीं डर रही थी? या फिर सरकार को वाकई में ये महसूस हुआ कि बच्चों की प्रॉब्लम जेन्युइन है? प्रधानमंत्री का आधी रात को वीडियो बनाना साफ बताता है कि सरकार इस मामले को लेकर परेशान हुई है, और इसे जल्द से जल्द खत्म करना चाहती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वीडियो संदेश में कहा, "हम इस मामले को लेकर बहुत सीरियस हैं और यह लड़ाई आगे चलेगी। हम दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देंगे।
"
सोनम वांगचुक ने अनशन क्यों तोड़ा: क्या वो बेवफा हुए या ज्यादा समझदार?
26 दिन के अनशन के बाद सोनम वांगचुक का वजन करीब 11 किलो घट गया था। कल्पना कीजिए, एक हफ्ता खाना न खाने पर ही हमारी हालत खराब हो जाती है, ये शख्स 26 दिन से भूखा था, अपने लिए नहीं, हमारे-आपके बच्चों के भविष्य के लिए।
लेकिन सोनम वांगचुक ने अपनी सेहत को अनशन तोड़ने की वजह नहीं बताया।
उन्होंने खुद X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर जो सबसे बड़ी वजह बताई, वो थी देश में हिंसा भड़कने का डर। उन्होंने लिखा,
"जंतर-मंतर पर तो सब कुछ शांत है, लेकिन मंच के नीचे कुछ शरारती तत्व इस आंदोलन की आड़ में हिंसा भड़काने की फिराक में हैं।"
उनका लॉजिक साफ था: सामने वाला कुछ भी करे, हम फूल से जवाब देंगे। गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत की बात करते हुए, उन्होंने कहा कि अगर आंदोलन में पत्थर चलेंगे तो उनकी 26 दिनों की तपस्या मिट्टी में मिल जाएगी।
उन्हें लद्दाख में हुए पिछले प्रोटेस्ट की घटना याद थी, जहां चार लोगों की मौत के बाद उन्हें खुद 170 दिनों तक NSA के तहत जेल में रहना पड़ा था।
तो क्या सोनम वांगचुक को डर सता रहा था कि यहां भी कोई अनहोनी हुई तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी? और जब सरकार सामने से चलकर आई, दो-दो मंत्री मिलने आए, उन्होंने लिखित में भरोसा दिया कि बच्चों पर कोई केस नहीं होगा, मुआवजा मिलेगा, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनेगा, तो क्या ये एक विन-विन सिचुएशन थी? इस लिहाज से अनशन तोड़ना शायद कमजोरी नहीं, सोनम वांगचुक की एक चाल भी हो सकती है। आखिर, सरकार के ईगो को छेड़े बिना जितना मिल सकता था, उतना उन्होंने ले लिया।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का क्या हुआ?
अब आते हैं उस बड़े सवाल पर, जिसने इस पूरे आंदोलन में सबसे ज्यादा जोर पकड़ा था – शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। 7 साल, 70 पेपर लीक.
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ये आंकड़े थे, जो सीधे-सीधे शिक्षा मंत्री के डिपार्टमेंट पर सवाल उठाते थे। छात्रों की सबसे बड़ी मांग थी पेपर लीक का हिसाब और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा।
लेकिन जब सोनम वांगचुक ने सरकार को अपनी शर्तें रखीं, तो उसमें ये आखिरी शर्त थी और वो भी अनकंडीशनल: "हो सके तो शिक्षा मंत्री का इस्तीफा।"
बाकी सारी मांगे – केस न करना, पीड़ित परिवारों को मुआवजा देना, बातचीत करना, संसद में बहस करवाना – सरकार ने मान लीं। लेकिन इस्तीफे वाली बात डील से गायब हो गई।
क्या ये आधी जीत है, या पूरा समझौता? सोशल मीडिया पर कई छात्र अभी भी पूछ रहे हैं:
"सर थैंक यू। लेकिन इस्तीफा नहीं तो हम छोड़ेगा नहीं।
"
कुछ लोग कह रहे हैं कि इतना तो आज तक किसी आंदोलन में नहीं मिला। आप CAA-NRC का आंदोलन याद कीजिए, किसान आंदोलन याद कीजिए, जहां सालों लगे और बड़ी संख्या में लोगों की जानें गईं, तब जाकर कहीं बात मानी गई।
यहां 26 दिन में सरकार मुआवजा, फास्ट ट्रैक कोर्ट, सेक्रेटरी का तबादला जैसी बातें मानने को तैयार हो गई। तो क्या ये छात्रों के लिए एक बड़ी जीत मानी जाए? या फिर सरकार ने वो सब दिया, जो उसके लिए आसान था – तबादला, कोर्ट, मुआवजा, बहस – लेकिन कुर्सी नहीं हटाई? यह सोचने वाली बात है कि क्या इतिहास इस बार खुद को दोहरा रहा है, जहां कोई आंदोलन किसी मंत्री की कुर्सी हिला नहीं पाता? या इस बार छात्र इतिहास को नए सिरे से लिखेंगे?
इस आंदोलन की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। अब देखना होगा कि सरकार अपने वादों पर कितना खरा उतरती है और छात्र इस 'आधी जीत' को कैसे देखते हैं।
क्या यह प्रोटेस्ट सोनम वांगचुक से आगे निकल चुका है? क्योंकि सोनम के आने से पहले भी यह प्रोटेस्ट था। क्या सोनम के जाने के बाद यह रुक जाएगा, या यह संघर्ष अभी भी जारी रहेगा?




































